भारत में निजी क्षेत्र में काम करने वाले लाखों कर्मचारियों के लिए एक गुड न्यूज है! एम्प्लॉइज प्रोविडेंट फंड (EPF) कंट्रीब्यूशन के लिए सैलरी लिमिट को लेकर उनकी लंबे समय से चली आ रही मांग अब एक निर्णायक मोड़ पर पहुंचती दिख रही है।
जनसत्ता की सहयोगी फाइनेंशियल एक्सप्रेस के मुताबिक, कई लेबर यूनियन लंबे समय से मांग कर रहे हैं कि सरकार ईपीएफओ की सैलरी लिमिट को मौजूदा 15,000 रुपये से बढ़ाए। सुप्रीम कोर्ट ने अब केंद्र सरकार और ईपीएफओ को इस मुद्दे पर चार महीने के अंदर फैसला लेने को कहा है। इससे सैलरी लिमिट में बदलाव की उम्मीदें और मजबूत होती दिख रही हैं।
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सुप्रीम कोर्ट का यह लेटेस्ट निर्देश क्यों है महत्वपूर्ण?
एक जनहित याचिका (PIL) की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने कहा कि इस मामले पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। हालांकि कोर्ट ने इस समय याचिका स्वीकार नहीं की, लेकिन उसने याचिकाकर्ता को संबंधित अथॉरिटी के सामने अपनी बात रखने का निर्देश दिया और कहा कि कानून के अनुसार चार महीने के अंदर इस पर फैसला लिया जाए।
याचिका में तर्क दिया गया कि 15,000 रुपये की सैलरी लिमिट महंगाई, न्यूनतम मजदूरी और प्रति व्यक्ति आय में हुई बढ़ोतरी को नहीं दिखाती है, और इसके परिणामस्वरूप, बड़ी संख्या में कर्मचारी सोशल सिक्योरिटी नेट से बाहर रह जाते हैं।
क्या है सरकार का रुख?
जनसत्ता की सहयोगी फाइनेंशियल एक्सप्रेस के मुताबिक, संसद के शीतकालीन सत्र में, श्रम और रोजगार मंत्री मनसुख मंडाविया ने साफ किया कि EPFO में रजिस्टर्ड संस्थानों में 15,000 रुपये तक कमाने वाले कर्मचारियों को अनिवार्य रूप से कवर किया जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि सैलरी लिमिट में कोई भी बदलाव कर्मचारी यूनियनों और इंडस्ट्री के प्रतिनिधियों से सलाह के बाद ही किया जाता है, क्योंकि इसका असर कर्मचारियों की टेक-होम सैलरी और मालिकों की लागत दोनों पर पड़ता है।
सरकार ने यह भी माना है कि 15,000 रुपये से थोड़ा ज़्यादा कमाने वाले कई प्राइवेट सेक्टर के कर्मचारी किसी भी पेंशन योजना के तहत कवर नहीं हैं, जिससे भविष्य में उनकी वित्तीय निर्भरता का जोखिम बढ़ सकता है।
70 वर्षों में कितनी बार हुआ EPF वेतन लिमिट में बदलाव?
EPF स्कीम (1952) के बाद कई बार लिमिट में बदलाव किया गया है, लेकिन इन बदलावों के लिए कोई तय समय-सीमा नहीं रही है।
– 1952–1957: 300 रुपये
– 1957–1962: 500 रुपये
– 1962–1976: 1,000 रुपये
– 1976–1985: 1,600 रुपये
– 1985–1990: 2,500 रुपये
– 1990–1994: 3,500 रुपये
– 1994–2001: 5,000 रुपये
– 2001–2014: 6,500 रुपये
– 2014 से अब तक: 15,000 रुपये
आगे क्या करें उम्मीद?
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद, अब सभी की निगाहें केंद्र सरकार और EPFO के फैसले पर हैं। अगर वेतन लिमिट बढ़ाई जाती है, तो इससे लाखों प्राइवेट सेक्टर के कर्मचारियों को EPF के ज़रिए ऑटोमैटिक रिटायरमेंट सेविंग्स का फायदा मिलेगा।
