केंद्रीय मंत्री और राज्यसभा सांसद विजय गोयल का कहना है कि जनता राष्ट्रवाद का मुद्दा चाहती है। वह देख रही है कि कौन-सी पार्टी इस पर बात करती है। उनका दावा है कि जनता को इस बात का भरोसा है कि भारतीय जनता पार्टी के नेता देश की सुरक्षा के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। बातचीत कार्यक्रम का संचालन किया कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज ने।

दीपक रस्तोगी : भाजपा ने विकास से अपनी यात्रा शुरू की और अब वह राष्ट्रवाद पर आकर टिक गई है। ऐसा क्या हुआ कि भाजपा को अपने मुद्दे बदलने पड़ रहे हैं?
विजय गोयल : कुछ महीने पहले तक कुछ लोग हम पर आरोप लगा रहे थे कि हम राम मंदिर के मुद्दे को जिंदा करके उस पर चुनाव लड़ेंगे। उनको सोचना चाहिए कि उनके आरोप ठीक नहीं थे। इस मुद्दे पर न हमने पिछला चुनाव लड़ा, न हम इस बार लड़ रहे हैं। राष्ट्रवाद तो मुद्दा बना ही इसलिए है कि जनता इसे चाहती है। वह देख रही है कि कौन-सी पार्टी इस पर बात करती है। चाहे वह आतंकवाद है, चाहे नक्सलवाद है, चाहे उसमें पाकिस्तान है, चीन है, चाहे 370 है या 35 ए है। सारे मुद्दे समेट कर लोग सबसे पहले देश की सुरक्षा चाहते हैं, राष्ट्रवाद चाहते हैं। वाजपेयी जी का सबसे बड़ा योगदान यह था कि उनके हाथ में लोग देश को सुरक्षित समझते थे। आज भी यही हो रहा है। लोग समझते हैं कि मोदी जी देश की सुरक्षा और देश को आगे बढ़ाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं।

मनोज मिश्र : इस लोकसभा चुनाव में दिल्ली में क्या देश से अलग मुद्दे होंगे?
’लोकसभा चुनाव में लोग इसलिए वोट करते हैं कि प्रधानमंत्री कौन बनेगा और केंद्र में सरकार किसकी बनेगी। इसका बड़ा उदाहरण है कि दिल्ली में सातों लोकसभा सीटें भाजपा ने जीतीं और उसके दस महीने बाद आम आदमी पार्टी ने अपनी सरकार बनाई। अभी मैं नहीं समझता कि मोदी जी को छोड़कर कोई भी व्यक्ति उनके आसपास भी है, किसी भी पार्टी में।

अजय पांडेय : आपने वाजपेयी जी के साथ काम किया और मोदी जी के साथ भी। दोनों में किसे बेहतर प्रधानमंत्री मानते हैं?
’वाजपेयी जी का कद बहुत बड़ा था। दोनों में अंतर यह है कि मोदी जी सातों दिन चौबीसों घंटे काम करते हैं, जोखिम उठाते हैं और मोदी जी के साथ उम्र है। वाजपेयी जी के पास इन तीन चीजों की कमी थी। हालांकि उन्होंने भी परमाणु विस्फोट जैसा बड़ा फैसला लिया। विकास के मामले में देखेंगे, तो राजमार्गों के विकास का काम उन्होंने ही किया था। मोदी जी के पास प्रशासनिक अनुभव भी बहुत ज्यादा है। मोदी जी पंद्रह साल संघ के प्रचारक रहे, इस तरह उन्होंने पूरे देश को देखा, पढ़ा-लिखा, जाना-समझा। पंद्रह साल वे भाजपा के सदस्य रहे। पंद्रह साल गुजरात के मुख्यमंत्री रहे। तो इस तरह उन्हें अनुभव, प्रशासनिक समझ आई। बाकी, वाजपेयी जी के कद का कोई व्यक्ति नहीं हो सकता। एक बार मोदी जी ने मुझसे खुद कहा था कि वाजपेयी जी का कद बहुत बड़ा है। अटल जी और मोदी जी में एक बात समान है कि दोनों विकासोन्मुखी हैं। मोदी जी के समय में विकास के अनगिनत काम हुए हैं।

पंकज रोहिला : भाजपा के संकल्प पत्र में दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने का मुद्दा गायब है। ऐसा क्यों?
’घोषणापत्र में हर राज्य का हर मुद्दा नहीं हो सकता। जहां तक पूर्ण राज्य के दर्जे का सवाल है, अगर दोनों सरकारें एक ही पार्टी की होंगी, तो पूर्ण राज्य का दर्जा मिलने में कोई दिक्कत नहीं आएगी। दोनों जगह एक ही पार्टी की सरकार होगी, तो यहां विकास की गति भी बहुत आगे होगी। दूसरा, अगर आदमी अपने अधिकारों का दुरुपयोग करेगा, तो फिर जाहिर तौर पर कोई दूसरी पार्टी पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं चाहेगी।

मृणाल वल्लरी : कांगे्रस के घोषणापत्र और भाजपा के संकल्प पत्र को तुलनात्मक रूप में आप किस तरह देखते हैं?
’दोनों में बहुत बड़ा फर्क है। उनका घोषणापत्र है, हमारा संकल्प पत्र है। दूसरी बात कि हमारी सरकार चल रही है। इसलिए जितने भी पुराने काम हैं, जिन्हें आगे बढ़ाना है, उनको हम आगे बढ़ाएंगे ही। फिर हमने जिन बातों पर ज्यादा जोर दिया है, वे हैं रोटी, कपड़ा, मकान। उसमें आप देखेंगे, तो महंगाई पर किसी ने भी आंदोलन नहीं किया है। वैसे भी महंगाई इस समय तीन फीसद से कम है। जब हमारी सरकार आई थी, वह महंगाई और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर आई थी। दोनों मुद्दों पर हमने विराम लगाया है। कांग्रेस की चाहे पिछली सरकारें रही हों या अभी उसका जो मुद्दा है, उसमें वह सबसिडी बांटकर ही वोट लेना चाहती है। हमने इस मामले में लोगों को जागरूक किया है और अभी हमने किसान और मजदूरों के लिए, सबके लिए अलग तरीके से योजनाएं बनाई हैं। इस तरह हमारे संकल्प-पत्र में सबका ध्यान रखा गया है, जबकि कांग्रेस सिर्फ यह सोचती है कि देश लुटाकर हम वोट ले लें।

मुकेश भारद्वाज : अभी दिल्ली सरकार से लोगों में ज्यादा नाराजगी नजर नहीं आ रही। उन्हें बिजली मिल रही है, पानी मिल रहा है, बच्चों की फीस नहीं बढ़ रही है। ऐसे में आपको क्या लगता है कि इस बार लोकसभा चुनाव में स्थानीय मुद्दे असर डालेंगे?

‘लोकसभा चुनाव ज्यादातर राष्ट्रीय मुद्दों पर होंगे। पर आप देखेंगे, तो आम आदमी पार्टी सरकार ने दिल्ली को स्लम बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। संक्षेप में समझें, तो प्रदूषण आसमान छू रहा है। मुख्यमंत्रियों से तुलना करें, तो मोदी जी जब मुख्यमंत्री थे, तो वे गुजरात छोड़कर बाहर नहीं निकले थे। पूरे पंद्रह साल तक वे वहीं टिके रहे। इन्हें तो जल्दी थी, तो मुख्यमंत्री बन गए। फिर लोकसभा चुनावों में जगह-जगह से अपने लोगों को उतारा और सब जगह इनकी जमानत जब्त हुई। यह हार इसलिए मिली कि दिल्ली की तरफ इनका ध्यान नहीं रहा। अगर दिल्ली पर ध्यान देकर विकास कर लेते, तो जिस तरह मोदी जी को लेकर पूरे देश के अंदर संदेश गया, उसी तरह इनका भी संदेश चला जाता। यह मैं व्यक्तिगत स्तर पर महसूस करता हूं। मगर शिक्षा की हालत यह है कि आठ सौ स्कूलों में प्रधानाचार्य नहीं हैं। दसवीं में आधे बच्चे फेल हो गए। उससे ज्यादा बच्चे बारहवीं में फेल। उनसे कहिए कि वे एक श्वेत पत्र दें कि बारहवीं के बाद कितने बच्चों को कॉलेजों में दाखिला मिला। मेरे पास तो हर चीज के लिए वैकल्पिक योजना है। उसके अलावा आप केंद्र सरकार से लड़ेंगे, उपराज्यपाल से लड़ेंगे, सबसे लड़ते रहेंगे, तो फिर दिल्ली का विकास कैसे होगा। चार साल तक तो पूर्ण राज्य के दर्जे का ध्यान नहीं आया, अब आ रहा है। अगर इतने ही संजीदा थे, तो इसके लिए सर्वदलीय बैठक बुलाते, बात करते। मगर हमें ही दोष दे रहे हैं कि आप कहा करते थे। इसी तरह न तो कोई नया अस्पताल खुला, न नया स्कूल खुला। ये सब बातें हर कोई जान रहा है। इसीलिए जनता ने केजरीवाल को एक के बाद दूसरा कोई चुनाव जीतने नहीं दिया।

अजय पांडेय : अगर यह और इसके पहले की सरकारें इतनी ही खराब थीं, तो पिछले बीस साल से भाजपा दिल्ली की सत्ता से बाहर क्यों है?
’क्योंकि हमें जितना अच्छा होना चाहिए, उतने अच्छे हम नहीं हैं। हमें और काम करने की जरूरत है। खासकर झुग्गी-झोपड़ियों में और काम करने की जरूरत है। और जहां तक इस सरकार की बात है, यह तो पहली बार आई है। अब इससे लोग निराश हैं।

मृणाल वल्लरी : भाजपा पर एक आरोप यह भी है कि उसने पहले अपने घोषणापत्र में जो वादे किए थे, वे पूरे नहीं हुए। सो, इस बार के नतीजे 2014 के बजाय 2004 जैसे हो सकते हैं। इस बारे में आप क्या कहेंगे?
’यह सोनिया गांधी का बयान है। उनके बयान पर जाने की जरूरत नहीं। 2014 को ही देखने की जरूरत है।

सूर्यनाथ सिंह : भाजपा इतनी पुरानी पार्टी हो गई, पर अभी तक उसका अपना कोई एजंडा नहीं बन पा रहा है। हर बार उसे किसी न किसी चेहरे को सामने रखकर चुनाव लड़ना पड़ता है। इससे क्या यह नहीं लगता कि आपके पास मुद्दे नहीं हैं?
’वह चेहरा अब विकास का प्रतीक बन चुका है। वह चेहरा भ्रष्टाचार मिटाने का प्रतीक बन चुका है। वह चेहरा अब देश की उन्नति का प्रतीक हो चुका है। अब लोगों में इस बात का यकीन हो गया है कि वह चेहरा कुछ भी कर सकता है।

मनोज मिश्र : आप संसदीय कार्य मंत्री रह चुके हैं। संसद में बहस का स्तर नहीं सुधर पा रहा। इसके लिए सरकार कोई ठोस काम क्यों नहीं कर पा रही?
’मैं समझता हूं कि इस पर सारी पार्टियों को ध्यान देने की जरूरत है कि किस तरह के लोगों को आप ला रहे हैं। फिर लोगों की सांसदों से अपेक्षाएं इतनी ज्यादा हो गई हैं कि उनका ज्यादा ध्यान सड़क, खड़ंजा, नाली, सीवर वगैरह की ओर है, बजाय संसद में बहस के। फिर आपने जो साल के पांच करोड़ रुपए दे दिए हैं, उसने भी समय बहुत ले लिया है। इसलिए मैं देखता हूं कि लाइब्रेरी में लोग कम हो गए हैं, संसद में कम हो गए हैं।

पंकज रोहिला : नोटबंदी के बाद कारोबारी कुछ निराश हुए हैं, भाजपा से पीछे भी गए हैं। इस चुनाव में वे कितना साथ देंगे?
’प्रधानमंत्री ने एक बड़ा काम किया- व्यापारी कल्याण बोर्ड बनाने का संकल्प लेकर। इससे उनकी एक बेहतर छवि बनी है। फिर लोगों के बीच उनकी समस्याएं सुनने की छवि बनी है। जीएसटी के मामले में सब व्यापारियों ने एक स्वर में कहा था कि जीएसटी चाहिए। जब कोई भी बड़ी प्रणाली आती है, तो उसमें कठिनाइयां आती हैं। पर अब यह काफी आसान हो गई है। इसलिए अब व्यापारी को कोई शिकायत नहीं है। उसे इससे सहूलियत हुई है।

मनोज मिश्र : अभी आप दिल्ली में लोकसभा चुनाव लड़ेंगे?
’अभी तो मैं राज्यसभा सदस्य हूं। एक साल का समय बचा है। और मेरे बारे में हर बार पार्टी ही निर्णय करती है। वही निर्णय करेगी।

आर्येंद्र उपाध्याय : अभी आपकी पार्टी पर सबसे अधिक आचार संहिता के उल्लंघन के आरोप लग रहे हैं। इस तरह सवाल उठता है कि क्या आपकी पार्टी लोकतंत्र में विश्वास करती है?
’हमारी ही पार्टी है, जिसमें चुनाव होते हैं, वरना और किस पार्टी में होते हैं। हमारी ही पार्टी है, जिसमें आप प्रधानमंत्री की आलोचना भी कर सकते हैं। हां, इन दिनों भाषा को लेकर जो सवाल उठ रहे हैं, उसका पार्टी से तो नहीं, पर आचार संहिता से संबंध है। सभी पार्टियों को इस पर सावधानी बरतने की जरूरत है। ऐसा हमारे प्रधानमंत्री भी कहते रहे हैं।

मृणाल वल्लरी : ऐसा क्यों है कि मेनका गांधी को धमकी भरी भाषा बोलनी पड़ रही है?
’उनके शब्दों के चयन में थोड़ी गड़बड़ी हो गई। वरना वे यही कहना चाहती थीं कि भाई, मैं चुनाव भी जीतूंगी, तुम्हारे काम भी करूंगी।

मनोज मिश्र : क्या वजह है कि दिल्ली में जब लोकसभा चुनाव होता है, तो आपको छियालीस प्रतिशत वोट मिलता है, पर जब बाकी चुनाव होते हैं तो बत्तीस-चौंतीस प्रतिशत वोट मिलते हैं?
’लोकसभा में लोग राष्ट्रीय मुद्दों पर वोट देते हैं। अभी लोग कहते हैं कि गठबंधन से आपको नुकसान होगा। पर, पहले भी तो चुनाव होते थे, हम सातों सीटें जीतकर आए। अब भी जीत सकते हैं।

सूर्यनाथ सिंह : एक तरफ तो आपकी पार्टी विकास की बात करती है और दूसरी तरफ युद्ध की भाषा बोलती है। जबकि विकास और युद्ध दोनों साथ नहीं चल सकते।
’हम जो भी बात करें, आप उसमें से कुछ न कुछ तो निकाल ही लेंगे। पहले हम मंदिर की बात करते थे, तो आप कहते थे कि मंदिर की बात कर रहे हैं। अब नहीं कर रहे, तो कहते हैं कि क्यों नहीं कर रहे? अब पुलवामा तो हमने नहीं किया। करने वाले तो बालाकोट पर भी शंका करेंगे। अस्सी किलोमीटर अंदर चले जाना, बम गिरा देना कम है क्या। अब लोग कहते हैं कि हम कुछ भी कर सकते हैं।

दीपक रस्तोगी : बालाकोट में जो हुआ, वह निस्संदेह हमारी सेना की उपलब्धि है। पर उसे भाजपा ने अपनी उपलब्धि के तौर पर भुनाना शुरू कर दिया। सेना के इस राजनीतिकरण को कहां तक उचित मानते हैं।
’ये बातें विपक्षी दल उठा रहे हैं। हमारे राष्ट्रीय अध्यक्ष या प्रधानमंत्री ने ऐसी कोई बात की हो, तो बताएं। जब आप किसी का व्यक्तिगत रूप से उल्लेख करते हैं, तो उसमें शब्दों का चयन कई बार गलत हो जाता है। इस वजह से कई बार गलतियां हो जाती हैं।