हिंदी साहित्य का विस्तार आज कई दिशाओं में हो रहा है – कहीं मानवीय मूल्यों से भरी लघुकथाएं हैं, कहीं सोशल मीडिया के असर पर व्यंग्य है, तो कहीं प्रवासी जीवन के संघर्ष और प्रेम की कथा। ये तीनों किताबें मिलकर समकालीन समाज, परिवार और व्यक्ति के बदलते रिश्तों की एक पूरी तस्वीर पेश करती हैं।
विष्णु प्रभाकर की चुनिंदा लघुकथाएं
हिंदी साहित्य में विष्णु प्रभाकर का विशिष्ट स्थान है। उन्होंने कथा साहित्य को न केवल समृद्ध किया, बल्कि लोकप्रिय भी बनाया। उनके अनेक उपन्यास अविस्मरणीय हैं। नाटक, एकांकी और यात्रा संस्मरण भी उन्होंने लिखे, लेकिन उन्हें आज भी कालजयी रचना ‘आवारा मसीहा’ के लिए याद किया जाता है। यों उनका उपन्यास ‘अर्धनारीश्वर’ भी प्रसिद्ध हुआ। इसके अलावा कई रचनाओं से उन्हें ख्याति मिली। उन्होंने बाल साहित्य भी रचा। हर विधा में लेखन किया। मगर सबसे अधिक उन्होंने कहानियां लिखीं। दरअसल, वे स्वयं को मूल रूप से कहानीकार ही मानते थे। बड़ी बात यह कि वे अपने आसपास से ही पात्र उठाते थे। उनका कथा संसार बहुत विस्तृत है।
इनमें लघु कथाओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने अपनी सृजन यात्रा के दौरान सौ से अधिक लघु कहानियां लिखीं। इन्हें सहेजने के लिए विष्णु प्रभाकर प्रतिष्ठान ने सार्थक पहल की है। सद्य प्रकाशित ‘विष्णु प्रभाकर की चुनिंदा लघु कथाएं’ में तिरसठ लघु कहानियां हैं। इस संकलन में अधिकतर लघु कथाएं मानवीय पक्षों को उजागर करने के साथ नौतिक मूल्यों की स्थापना करती हैं। विष्णु प्रभाकर का एक लघुकथा संग्रह ‘कौन जीता और कौन हारा’ शीर्षक से आया था। जिसमें उन्होंने बताया कि अन्य विधाओं की तरह यह भी जीवन के यथार्थ को अंकित करती हैं। सबसे बड़ी बात यह कि जब अणु की शक्ति असीम है, तब लघुकथा मात्र लघु रचना कैसे रह सकती है?
विष्णु प्रभाकर के इस कथन के परिप्रेक्ष्य में सद्य प्रकाशित लघुकथा संग्रह को देखें, तो यह दो पग में ब्रह्मांड को नाप लेने जैसा लगता है। इस संग्रह में लघुकथाएं जहां तीव्रता से अपना संदेश देती हैं, वहीं वह मानवीय मूल्यों का भी संचार करती हैं। विष्णु प्रभाकर की भाषा में उलझाव नहीं है। उनकी सादगी और सहजता उनके लेखन की विशेषता है। वे कहानियां रचते हुए जटिल नहीं होते हैं, बल्कि सीधे मर्म पर चोट करते हैं। उनके कथा शिल्प की यह खूबसूरती है कि वह अपने पाठकों को अपने साथ जोड़े रखती है। उनकी चुनिंदा लघुकथाओं का यह संकलन इस लिहाज से भी महत्त्वपूर्ण है कि इसमें विष्णु प्रभाकर के दो साक्षात्कार भी सम्मिलित किए गए हैं।
विष्णु प्रभाकर की चुनिंदा लघुकथाएं, विष्णु प्रभाकर प्रतिष्ठान, ए-249, सेक्टर- 46, नोएडा; मूल्य 320 रुपये
मम्मी का फेसबुक अकाउंट
सोशल मीडिया के विस्तार बाद लोगों का जीवन बहुत बदल गया है। विचित्र बात है कि उनका सामाजिक दायरा तो बढ़ा है, लेकिन घर-परिवार से लेकर पास-पड़ोस और यहां तक कि दोस्तों-रिश्तेदारों से वे कट गए हैं। वे आभासी मित्रों के ‘लाइक’ और ‘कमेंट’ में इतने उलझ जाते हैं कि घर की भी सुध नहीं रहती। दूर कहीं बैठे मित्रों से आभासी संवाद उन्हें खुशी देती है। इस तरह परिवार से उनका संवाद टूटता जाता है। मगर तब क्या होगा जब किसी गृहिणी को ही फेसबुक की लत पड़ जाए। अशोक पुरुथी ‘मतवाला’ ने अपने लघु व्यंग्य उपन्यास ‘मम्मी का फेसबुक अकाउंट’ में इसी सामाजिक विरोधाभास को सामने रखा है।
अशोक पुरुथी ने व्यंग्य विधा को साधते हुए बताया है कि जब परिवार के सभी सदस्य फेसबुक में खोए हैं, तो कोई भी पीछे क्यों रहे। परिवार को भी लगता है कि इससे वह देश-दुनिया से जुड़ेगी। मगर क्या वास्तव में ऐसा होता है? इसी को आधार बना कर लेखक ने उपन्यास का ताना-बाना बुना है। यह उपन्यास कई उलझनों और संदेह को सामने रखते हुए पाठकों को चेहरे पर मुस्कान बिखेर देता है।
मम्मी का फेसबुक अकाउंट : अशोक पुरुथी ‘मतवाला’, मतवाली प्रेस, यूएसए
इमिग्रेंट
प्रवासी भारतीय साहित्य की समृद्ध परंपरा है। पिछले कुछ दशकों में प्रवासी हिंदी लेखकों ने सुदूर रह रहे भारतीयों के दुख-दर्द को अभिव्यक्ति दी है। प्रवासियों का अपने देश से हमेशा से लगाव रहा है। मगर अब बदलाव आया है। जिस देश में ये लोग रहते हैं, वहीं अपनी जड़ें जमा रहे हैं। यही बदलाव अब लेखकों में दिखता है। अब अमेरिका से लेकर कनाडा और अन्य देशों के प्रवासी लेखक अतीत से बाहर निकल कर उन्हीं देशों की कहानियां लिख रहे हैं, जहां वे स्वयं रह रहे हैं।
कनाडा के लेखक एवं व्यंग्यकार धर्मपाल महेंद्र जैन का सद्य प्रकाशित उपन्यास ‘इमिग्रेंट’ कनाडा के युवाओं की ही कहानी बयां करता है। उन्होंने नए दौर का प्रेम रचते हुए इसके समांतर युवाओं के संघर्ष की गाथा भी लिखी है। कनाडा में पनपे निश्छल प्रेम को उन्होंने प्राकृतिक दृश्यों के साथ बेहद खूबसूरती से पिरोया है। कालेज में दाखिला लेने की मारामारी से लेकर इसमें दलालों की चालाकियां है। नशीले पदार्थों की तस्करी की भी परतें खोली गई है। कैदियों को प्रताड़ना वैसी ही बताई गई है, जैसी दुनिया भर की जेलों में दी जाती हैं।
दूसरी ओर साजिश के शिकार नायक को न्याय दिलाने के लिए नायिका जी जान लगा देती है। इस प्रेम कथा में युवाओं के सपने हैं। उन्हीं सपनों की आवाजाही में यह उपन्यास आप्रवासी युवाओं को भारत की संस्कृति से जोड़ता भी दिखता है। इमिग्रेंट: धर्मपाल महेंद्र जैन; आइसेक्ट पब्लिकेशन, ई-7/22, एसबीआइ,अरेरा कालोनी, भोपाल, 500 रु
