पिछले कुछ समय से समाज में आसपास होती घटनाएं इस मसले पर सोचने पर मजबूर करती हैं कि जिस संवेदना की बुनियाद पर इंसानियत टिकी हुई है, उसकी जगह क्यों सिकुड़ती जा रही है। आजकल की खबरों को देखकर मन में एक ही भाव जागता है कि क्या मनुष्य अपनी संवेदना खोता जा रहा है और क्या हमारे दिलोदिमाग से संवेदनशीलता का ह्रास हो रहा है।

ऐसी कई खबरें सामने आ चुकी हैं, जिनमें यह देखा गया कि किसी दुर्घटना के बाद घायल लोगों की मदद करने की जगह घटनास्थल पर मौजूद लोग अपने-अपने मोबाइल निकाल कर घटना का वीडियो बनाना शुरू कर देते हैं। ऐसा करते हुए लोग क्या एक बार भी नहीं सोचते कि हादसे के बाद घायल व्यक्ति के लिए एक-एक पल कितना कीमती होता है। यह सोचने के बजाय वीडियो बनाना या मूकदर्शक होकर देखते रहने वालों की भीड़ में दिमागी तौर पर लोगों का अनुपस्थित होना संवेदनहीनता नहीं, तो और क्या है।

सच तो यह है कि मनुष्य का दिल या कहें कि मानव मन अनेक प्रकार की भावनाएं, एहसास, बोध, चेतना, सहानुभूति, हमदर्दी, वेदना आदि समेटे हुए होता है। इसलिए हमारी आंखों के सामने घटित होने वाली किसी भी घटना या दुर्घटना के तुरंत बाद सर्वप्रथम हमारे मन में घायल लोगों की मदद करने का भाव जागना चाहिए, मगर वर्तमान में संवेदनशीलता खोता आदमी या तो अपने मोबाइल में घटना का वीडियो बनाना शुरू कर देता है या किसी एक अनजान भय से घटनास्थल से पलायन ही कर जाता है।

वीडियो बनाने वाला व्यक्ति अपनी ही संवेदना खो चुका होता है या फिर उस पर प्रचार की भूख हावी होती है और दूसरी ओर अनजान भय से घटनास्थल से पलायन करने वाला व्यक्ति कानूनी जटिलताओं में फंसने से लेकर मदद करने के क्रम में वक्त ‘जाया होने’ के डर से ऐसा करता है। फिर कई बार किसी व्यक्ति की प्रकृति ही मदद न करने या फिर मुश्किल में मदद न करने वाले की होती है।

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हालत यह है कि अगर किसी दुर्घटना में घायल व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाने के लिए मदद करने की जरूरत होती है और कोई व्यक्ति आवाज लगा रहा होता है, तो भी पास से गुजर रहे वाहन रुकते नहीं। दस मिनट में पिज्जा पहुंचाने वाले शहरों में भी एंबुलेंस घंटे भर के इंतजार के बाद ही पहुंचती है। इतनी देर में कई बार मरीज की जान पर बन आती है या उसे बचाना मुश्किल हो जाता है। आमतौर पर दुर्घटनाग्रस्त लोगों की मदद न करने के अनेक बहाने हम अपने मन में झटपट गढ़ लेते हैं।

उदाहरण के तौर पर यह कि अब पुलिस के झंझट में कौन पड़े… या इसके बाद कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाने पड़ेंगे। कई बार तो किसी बैठक में हिस्सा न ले पाने या या हवाई जहाज के छूट जाने का बहाना हमारा मन सोच लेता है। दरअसल, इसे बहाना ही कहा जा सकता है, क्योंकि क्या किसी व्यक्ति की जान से ज्यादा कीमत किसी बैठक की या हवाई जहाज के छूट जाने से की जा सकती है?

अस्पतालों में भी संवेदनाओं का अभाव के मामले आम दिखते हैं। उदाहरण के तौर पर मरीजों के इलाज के लिए फार्म या पर्ची भरे बगैर या पैसा जमा किए बगैर या फिर पुलिस के आने से पहले मरीज का इलाज नहीं किया जाता, भले ही मरीज गंभीर अवस्था में हो और उसे आपात चिकित्सा की जरूरत है।

संवेदनहीनता तब भी दिखाई देती है जब किसी परिचित या दूर के किसी रिश्तेदार के घर में हुई गमी यानी किसी की मौत के बाद लोग दुख में शामिल होने उनके घर पहुंचने के बजाय अपने मोबाइल पर ‘रेस्ट इन पीस’ या ‘विनम्र श्रद्धांजलि’ लिख कर अपने कर्तव्य की ईतिश्री मान लेते हैं। सोच कर देखा जा सकता है कि क्या किसी गमजदा व्यक्ति के मोबाइल में आया संदेश सकी मानसिक-भावनात्मक मदद करेगा या उसके कंधे पर किसी अपने का आश्वासन देने वाले हाथ उसे ज्यादा अच्छे लगेंगे।

इसके विपरीत संवेदनहीनता के इस वर्तमान समय में भी कुछ लोग ऐसे हैं, जो मदद के लिए दौड़ पडते हैं। हम सबने सोशल मीडिया पर अनेक ऐसे समूह देखे होंगे, जो गुड मार्निंग, गुड नाइट के साथ दिनभर लतीफे तथा मीम या मनोरंजक रील एक-दूसरे को भेजते रहते हैं, लेकिन इसी सोशल मीडिया पर कुछ समूह ऐसे भी हैं, जो सिर्फ मदद करने के उद्देश्य से बने हैं। रक्त दान करने वालों का एक समूह ऐसा भी है जो देश भर के अस्पतालों में अपने नेटवर्क के जरिए जरूरतमंदों को खून देने पहुंच जाते हैं।

कुछ समय पहले एक नन्हे बालक के ह्रदय में छेद था, जिसका आपरेशन करवाना जरूरी था। साथ ही खर्च बहुत था, जिसे उसके माता-पिता उठाने में सक्षम नहीं थे। मगर सोशल मीडिया पर किसी भले मानुष ने इस संबंध में लिख कर जारी किया। इसके बाद मदद के लिए अनेक हाथ उठे और उससे नन्हे बच्चे का आपरेशन एक बड़े अस्पताल में बिना दिक्कत हो गया। बचे हुए पैसों से बैंक में एक एफडी बनवाई गई, जिससे भविष्य में उसके शिक्षण में भी मदद हो सके। एक तरफ कुछ अस्पताल सिर्फ पैसा बनाने में लगे हुए हैं, तो कुछ अस्पताल ऐसे भी हैं, जो पैसों से ज्यादा मनुष्यों के स्वास्थ्य की चिंता करते हैं, मनुष्यता की फिक्र करते हैं। इसलिए कहा जा सकता है कि अच्छे-बुरे दोनों प्रकार के लोग इस देश-दुनिया में हैं। न तो संवेदनशीलता कम हुई है, न सभी मनुष्य संवेदनहीन हो गए हैं।

(लेखक: राजेंद्र वामन काटदरे)

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