उस दिन सुबह से ही खुशनुमा हवा बह रही थी। लवि ने अंगड़ाई ली और खिड़की का परदा हटाया। रसोई में जाकर गुनगुना पानी पिया। उसके बाद चाय के लिए दूध मिला पानी उबालने रख दिया। लवि को चाय छानते हुए किसी की याद आ गई। मिशी, हां मिशी ही थी। लवि का मन अतीत में भटका। छात्रावास में उसके साथ कमरा साझा करने वाली दोस्त।मिशी को कितना सताती थी लवि। मिशी शिमला की थी। गिलास भरकर कड़क चाय पीने की शौकीन थी। मगर, लवि उसके हिस्से की चाय सुड़क कर खत्म कर देती। मिशी अब जाने कहां होगी। लवि ने आज उसे जी भरकर याद किया। रेनबो नाम था उनके हास्टल का। तब उम्र भी बीस या इक्कीस रही होगी।
लवि ने एकाध बार पूछा था कि मिशी तुम तो साहित्य पढ़ती हो। इसका मतलब प्रेम विवाह करोगी। इसके जवाब में मिशी बस मंद-मंद मुस्कान बिखेर देती थी। मिशी अच्छे कपड़े पहनती थी। इससे लवि को इतना तो अंदाजा हो गया था कि वह खाते-पीते घर की बेटी है। मगर यह भी उसका अनुमान ही था। लवि इतिहास पढ़ रही थी। मिशी अंग्रेजी साहित्य। एक दिन लवि ने इतिहास की किताब के पन्ने पलटते हुए कहा कि, ‘मिशी तुम मेरे बराबर खंडहरों की जानकारी नहीं रख सकती। बोलो।’ ‘सच, खंडहर, हमको समय की कविता सुनाते हैं ना, लवि।’ मिशी ने भावुक होकर कहा। लवि उसका चेहरा देखती रह गई थी।
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मिशी अक्सर चुप ही रहती थी। उसके दिल की जमीन से शब्द खोदकर बाहर निकालने पड़ते थे। मगर एक बार संयुक्त सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। तब मिशी ने खूब बढ़-चढ़कर भाग लिया था। गीत, संगीत, नाटक, हास्य, अभिनय, नृत्य, कविता, किस्से आदि से भरपूर यह आयोजन काफी दिनों तक सभी की जुबान पर चढ़ा रहा। तब मोबाइल फोन तो थे ही नहीं। बस, बातों से ही इसकी सराहना होती रही। लवि ने तब गौर किया कि मिशी कार्यक्रम की सामग्री कहीं से लेती थी। तब हर समय उसके पास दाहिने या बाएं हाथ में एक रजिस्टर लहराता रहता था। तमाम कविताएं, शायरी, सूक्तियां आदि भरी हुई थी उसमें।
एक दिन मौका पाकर लवि चोरी से वह रजिस्टर पढ़ने लगी। लवि उसमें मिशी का अतीत खोजना चाहती थी। मगर लवि को कुछ भी नहीं मिला। बस दो ढाई साल का यह साथ रहा। फिर दोनों अपने-अपने घर चली गईं। लवि व्याख्याता हो गई थी। उसने इसी साल स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली है, और घुमक्कड़ बनकर तमाम जगहों की यात्रा करती रहती है। लवि आभासी मंच से नहीं जुड़ी है। वह अपनी आजादी, अपने हक और अपनी मनपसंद जिंदगी की इतनी शौकीन रही कि उसने विवाह तक नहीं किया था। बड़े भाई ने कितने रिश्ते बताए। लवि पलट कर जवाब देती थी कि मेरी कमाई मेरी मर्जी। यह जीवन जरा सा तो है। केवल अपने लिए ही जीना चाहिए। और, फिर इसके आगे पूर्णविराम लग गया था। लवि खुद को काफी व्यस्त रखती थी।
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आज इस समय उसे मिशी की इतनी याद जाने क्यों आने लगी थी। मिशी और वह साथ रहते थे। तब भी मिशी अपने बारे में कुछ अधिक बताती नहीं थी। साहित्य के सागर में मिशी के मन की नाव हिचकोले खाती रहती थी। चाय खत्म हो गई थी। लवि हाथ में चाय का कप लिए फिर से मिशी के बारे में सोचने लगी थी। तभी उसे ख्याल आया कि उसने आज का अखबार नहीं देखा है। वह कप रसोई में रखकर अखबार के पन्ने पलटने लगी। अचानक उसकी नजर एक तस्वीर पर टिक गई।
आंखों से न देख पाने वाले एक गायक का आज उनके शहर में कार्यक्रम था। अखबार में प्रेस कांफ्रेंस की फोटो छपी थी। देखने में वह मिशी जैसी लग रही थी। उसने उसी समय उस कार्यक्रम में जाने का फैसला किया। पोहे का नाश्ता करके वह नहाई। कुछ देर उसने अपने पौधों की देखभाल की। उसके बाद वह जाने के लिए तैयार हुई।
अभी काफी समय था। इसलिए बाहर ही अपने पसंदीदा होटल में उसने लंच किया। ठीक तीन बजे समारोह स्थल पर पहुंच गई। यह एक संगीतमय संध्या थी। लोग आ ही रहे थे। बैठ रहे थे। तभी कुछ छायाकार आए। शायद कलाकार आ रहे थे। लवि को सब साफ-साफ दिखाई दे रहा था। कलाकार का हाथ थामे एक महिला साथ आ रही थी। लवि के मुंह से अनायास ही निकला। मिशी। मिशी। महिला आगे बढ़ गई थी। शायद उसने सुना नहीं था।
मिशी ने मंत्रमुग्ध होकर कलाकार को सुना। कितना प्यारा नाम था उनका। कमलनयन। उनकी ओर देखते हुए कोई नहीं कह सकता था कि वे नेत्रहीन थे। मिशी उनके ठीक बगल में बैठकर तानपूरा छेड़ रही थी। बहुत ही मधुर सुर था उनका। लवि का मन हो रहा था कि मिशी के पास जाकर मंच पर ही बैठ जाए। मगर लवि ऐसा किस हक से करती। उसका और मिशी का तो पिछले तीस साल से मिलना-जुलना ही नहीं हो सका था। लवि को तब भी उससे कुछ बात करने का मन था। लगभग एक घंटा हो गया था। दर्शकों की फरमाइश के कारण कार्यक्रम काफी लंबा हो रहा था।लवि को थकान होने लगी थी। वह वापस लौटकर घर आ गई थी।
घर आते ही उसे गहरी नींद आ गई। सुबह उठी तो होश आया कि मिशी से मिलना था। उसने सबसे पहले अखबार उठाया। आयोजन की लंबी चौड़ी खबर छपी थी। आज तो लिखा था कि कमलनयन और उनकी पत्नी मिशी। यानी वह उनकी पत्नी। हे, राम, यह मिशी भी ना। लवि को कुछ अजीब सा लगा। उससे रहा न गया। उसने फोन लिया। आज शायद पहली बार वह किसी का जीवन परिचय खोज रही थी। उसे आभासी मंच पर सब मिल गया। कमलनयन और मिशी पिछले पच्चीस साल से पति-पत्नी हैं। कमलनयन जन्म से अंधत्व के शिकार हैं। मिशी एक कवि हैं। दोनों दयानतदारी करते हैं। आवारा पशुओं की सेवा करते हैं वगैरह-वगैरह। अब तो दस-बारह मिनट में लवि ने उनके बारे में काफी कुछ जान लिया था।
ओह, तो मिशी इतनी मानवीय और उदार निकली। उसने तो जीवन ही सार्थक कर लिया। आज लवि को खुद पर और अपनी खुदगर्ज सोच पर काफी लज्जा महसूस हो रही थी। लवि ने तो एक-एक पाई और एक एक पल अपने आप पर ही लुटाया था। मगर आज उसने कुछ फैसला किया। उसने आभासी मंच से ही कमलनयन फाउंडेशन की सारी डिटेल ली। पचास हजार की राशि उनकी संस्था को दान कर दी। कुछ ही देर बाद संस्था के सचिव के द्वारा उसके फोन पर एक लंबा सा प्यारा संदेश आ गया था। लवि को बहुत-बहुत धन्यवाद लिखा था। लवि ने एक गहरी सांस ली। उसने तय कर लिया कि आज से वह अपना जीवन भी सेवा को ही समर्पित करेगी।
