नौ बैंक यूनियनों के समूह यूनाइटेड फ़ोरम ऑफ़ बैंक यूनियन ने सरकारी बैंकों के निजीकरण के ख़िलाफ़ 15 और 16 मार्च को राष्ट्रव्यापी बैंक हड़ताल किया। इस दौरान सरकारी बैंकों की ब्रांच में पैसे जमा करने, निकालने और चेक क्लियरेंस जैसे काम बंद रहे। इस हड़ताल में बैंकों के 10 लाख से अधिक कर्मचारी और अधिकारी शामिल रहे।कई गैर भाजपाई राजनीतिक दल बैंक कर्मियों की हड़ताल के समर्थन में दिखे। वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ने हड़ताल कर रहे बैंक कर्मियों पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि किसी बैंक कर्मी को नेहरू मुसलमान हैं वाला पोस्ट दिखा दीजिए मुमकिन है वह निजीकरण का ग़ुस्सा भूल जाएगा।
रवीश कुमार ने अपने फेसबुक पेज पर पोस्ट लिखा, जिसमें उन्होंने लिखा है कि, ‘बार बार कहा गया कि दस लाख कर्मचारी निजीकरण के ख़िलाफ़ हड़ताल कर रहे हैं। व्हाट्स एप ग्रुप की सांप्रदायिक बातों और उनके प्रति राजनीतिक निष्ठा से बड़ा इनके लिए कोई सवाल नहीं है। सांप्रदायिकता ने इनकी नागरिकता ख़त्म कर दी है। आप किसी बैंक कर्मी को नेहरू मुसलमान हैं वाला पोस्ट दिखा दीजिए मुमकिन है वह निजीकरण का ग़ुस्सा भूल जाएगा। बेशक सारे लोग इस तरह के नहीं हैं लेकिन आप दावे से नहीं कह सकते कि ऐसी सोच के ज़्यादातर लोग नहीं है।
मैंने एक सवाल किया कि बैंक अफ़सरों के व्हाट्स एप ग्रुप में किसानों के आंदोलन को क्या कहा जाता था। आतंकवादी या देशभक्त? किसी बैंक वाले को मेरी बात इतनी भी बुरी नहीं लगी कि कोई जवाब देता। तो क्या मैं मान लूं कि उनके अफ़सरों के व्हाट्स एप ग्रुप में वाक़ई किसानों को आतंकवादी कहा जाता था?
मुझे पता था कि जिस ग्रुप में हिन्दू मुसलमान कर लोग सांप्रदायिक हुए हैं वहां मेरी बात उन्हें चुभेगी। सबको चुभती है। सांप्रदायिकता नागरिकता निगल जाती है। आज अगर बैंकों के भीतर रायशुमारी कर लीजिए तो ज़्यादातर नरेंद्र मोदी के पक्ष में खड़े होंगे। जबकि वे विरोध बैंक बेचने का कर रहे हैं। ज़रूर एक बैंक अधिकारी ने लिखा है कि ऐसा करने वाले लोग हैं मगर सभी ऐसे नहीं हैं। ऐसे लोगों की संख्या एक प्रतिशत है।
फिर भी बैंक वालों को एक सलाह है। जब भी आंदोलन करें तो दस पेज का डिटेल में प्रेस नोट बनाए। उसमें सारी बातें विस्तार से लिखें। उदाहरण दें कि क्यों उनके अनुसार बैंकों को बर्बाद किया गया है। क्यों निजीकरण का फ़ैसला ग़लत है? जो प्रेस नोट मिलता है उसमें कुछ ख़ास होता नहीं है। कम से कम दस पेज का प्रेस नोट ऐसा हो जिसे पढ़ कर लगे कि बैंक के लोगों ने भीतर की बात बता दी है। कोई भी पत्रकार भले कवर न करे लेकिन कुछ जानने का तो मौक़ा मिलेगा। अब अलग अलग विषयों के लिए पत्रकार नहीं होते हैं। वो सिस्टम ख़त्म हो गया है। जो प्रेस नोट मिले वो बेकार थे। सिर्फ़ यही कहते रहें कि सरकार बैंक बेच रही है। ग़लत कर रही है। हड़ताल केवल एक तस्वीर बन कर रह जाएगी जिसका कोई अर्थ नहीं होगा।’
रवीश कुमार का यह पोस्ट वायरल हो रहा है। इस पोस्ट पर मिली जुली प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। ज्यादातर यूजर्स रवीश कुमार की बातों से सहमति जता रहे हैं तो वहीं बहुत से ऐसे भी हैं जो रवीश कुमार को उनकी इस टिप्पणी पर ट्रोल भी कर रहे हैं।

