मध्य प्रदेश में शुक्रवार को आयोजित होने वाले किसान सम्मेलनों में खरीफ 2020 में हुए फसलों के नुकसान की 1600 करोड़ रुपये की राहत राशि राज्य के लगभग 35.50 लाख किसानों के खातों में डाली जाएगी। इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एवं मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान राज्य के किसानों को संबोधित करेंगे। पीएम द्वारा किसानों के इस संबोधन पर वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ने निशाना साधा है।
रवीश कुमार ने फेलबुक पर पोस्ट लिख केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को आड़े हाथों लिया है। रवीश कुमार ने लिखा- भारत की राजनीति में ‘किसान’ शब्द का राजनीति और सामाजिक महत्व ख़त्म हो चुका है। भारत के किसान अपनी राजनीतिक समाप्ति का समापन समारोह देख रहे हैं। गांवों में सांप्रदायिकता और जेब में दो हज़ार पहुंचा कर उनकी पहचान का टैग ज़ब्त कर लिया गया है। अब सरकार चाहे तो अपना किसान पैदा कर सकती है। दिल्ली हरियाणा सीमा पर जो किसान आंदोलन चल रहा है उसे छोटा करने के लिए सरकार अपना किसान सम्मेलन कर रही है।
रवीश कुमार ने आगे लिखा- आज प्रधानमंत्री मध्य प्रदेश के किसानों की जेब में पैसे पहुंचाएंगे। किसानों को उनके ही हक के पैसे से ख़रीदने का दृश्य किसानों के वजूद के मिटने का होगा। यह कितना भयानक है कि ठंड में किसान मर रहे हैं और प्रधानमंत्री दूसरे राज्यों के किसानों के खाते में पैसा ट्रांसफ़र कर रहे हैं। बताने के लिए कि अभी भी बहुत किसानों को पांच हज़ार करोड़ पैसा ट्रांसफ़र कर क़ानून के पक्ष में सहमति ख़रीदी जा सकती है।
रवीश कुमार का मानना है कि आज आंदोलन न होता तो ख़रीदने के ये कार्यक्रम भी न होते। किसान के पास भी किसान होने का स्वाभिमान नहीं रहा जैसे जनता के पास जनता होने का स्वाभिमान कब का नहीं रहा। मेरी ही बातें सच होंगी क्योंकि यही सच है।
रवीश कुमार का यह पोस्ट वायरल हो रहा है। कुछ लोग रवीश कुमार की बातों से सहमति जताते हुए लिख रहे हैं कि ये देखना बेहद दुखद अनुभव देता है कि प्रधानमंत्री और गृहमंत्री कभी भी आगे आकर लोगो से संवाद नहीं करते। किसान आंदोलन के वक्त भी ये बेदर्द बनकर घूम रहे है । क्या ऐसे होते है जनसेवक ?
वहीं कुछ लोग ये भी लिख रहे हैं कि किसानों को भी आंदोलन के दैरान अपनी मांगों को लेकर थोड़ा लचीला व्यवहार दिखाना होगा। कुछ यूजर्स रवीश कुमार के इस पोस्ट के लिए उन्हें ट्रोल भी कर रहे हैं।
बता दें कि नए कृषि कानूनों के विरोध में बड़ी संख्या में किसान औऱ किसान संगठन आंदोलन कर रहे हैं। पिछले 3 सप्ताह से ज्यादा समय से आंदोलनकारी किसान दिल्ली के बॉर्डर पर अपनी मांगों को लेकर डटे हुए हैं। कई नतीजों की बैठक के बाद भी कोई बीच का रास्ता नहीं निकल पाया है।

