भारत में 2011 की जनगणना के मुताबिक महिलाओं की संख्या 58 करोड़ 64 लाख है, जिनमें से 65 फीसद से ज्यादा महिलाएं शिक्षित हैं। जबकि कामकाजी महिलाओं की संख्या 60 लाख है, जिनकी औसत आय 9,000 रुपए प्रतिमाह है। विभिन्न कार्यक्षेत्रों में अपनी मेहनत, क्षमता और समर्पण के बल पर कामयाबी का परचम लहराने के बावजूद महिलाओं की स्थिति अपेक्षानुरूप बेहतर नहीं हो सकी है। सुरक्षा, सम्मान और बराबरी के हक की उनकी लड़ाई आज भी जारी है। चुनौतियां कदम-कदम पर उनका रास्ता रोककर खड़ी हो जाती हैं। पहली चुनौती है सुरक्षा। महिलाएं घर में हों या बाहर, वे कहीं भी स्वयं को सुरक्षित महसूस नहीं कर पातीं। महिलाओं के खिलाफ हिंसा एक गंभीर समस्या है, वह चाहे यौन हिंसा हो, घरेलू हिंसा हो या समाज के स्तर पर होने वाली किसी भी प्रकार की हिंसा। निर्भयाकांड के बाद बने कानून भी स्त्री के प्रति अपराधों को नहीं रोक पा रहे हैं।
महिलाओं के साथ छेड़छाड़, दुष्कर्म, सामूहिक दुष्कर्म और उनके अपहरण की घटनाएं किसी भी तरह कम नहीं हो पा रही हैं। मध्य प्रदेश हो या राजस्थान, बिहार हो या झारखंड, उत्तर प्रदेश हो या राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली, देश के किसी भी हिस्से पर नजर जाली जाए तो महिलाओं के साथ अपराधों का सिलसिला खत्म होता नहीं दिख रहा है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो 2014 में देश भर में बलात्कार के लगभग 37,000 मामले प्रकाश में आए, जिनमें से 197 घटनाएं पुलिस हिरासत में अंजाम दी गई थीं। वहीं सामूहिक दुष्कर्म के कुल मामलों की संख्या 2,300 रही। दिल्ली पुलिस के मौजूदा आंकड़े बताते हैं कि 2015 में दुष्कर्म के 2069 मामले प्रकाश में आए, जबकि 2016 की 15 फरवरी तक यानी शुरुआती 46 दिनों के अंदर दुष्कर्म के 213 मामले दर्ज हुए। यानी प्रतिदिन औसतन चार-पांच मामले। इनमें से 25 फीसद मामले शादी का झांसा देकर दुष्कर्म करने के थे।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष एचएल दत्तू ने पिछले दिनों एक सम्मेलन में कहा था कि महज सख्त कानून बना देने से महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा रोकना असंभव है। इसे रोकने के लिए एक समग्र प्रक्रिया विकसित करने के साथ-साथ व्यवस्थित दृष्टिकोण अपनाना होगा, क्योंकि यह केवल कानून का मसला नहीं है। उन्होंने देश भर में शौचालय निर्माण, स्ट्रीट लाइटों को दुरुस्त और युवाओं को लैंगिक अधिकारों के प्रति जागरूक करने की जरूरत पर बल दिया। निर्भया प्रकरण के बाद महिलाओं की सुरक्षा के लिए एक नया कानून बना, वह अमल में भी आया, लेकिन देश में कोई बदलाव देखने को नहीं मिला। लोगों को अब पुलिस और कानून व्यवस्था का डर नहीं सताता। धनाढ्य तबका सोचता है कि उसके पास पैसा है, ताकत है, इसलिए वह किसी न किसी तरह बच निकलेगा। व्यवस्थागत खामियां कहीं न कहीं उसके लिए रास्ता तैयार कर देंगी। जब समाज में इस तरह का माहौल हो, तो पुलिस और कानून भी आखिर क्या करे? पुलिस की भी एक सीमा होती है। वह मौके पर पहुंचने, रिपोर्ट दर्ज करने और आरोपियों को जेल भेजने के अलावा कर भी क्या सकती है? सरकार भी क्या करेगी, वह ज्यादा से ज्यादा, अगर मामला उछला, तो जाकर पीड़ित को मुआवजे का चेक थमा देगी। लेकिन, यह समस्या का समाधान हरगिज नहीं है। कानून कितना भी सख्त बना दिया जाए, उसका फायदा तब तक नहीं होने वाला, जब तक समाज खुद ऐसे अपराधों और इन्हें अंजाम देने वालों के प्रति गंभीर और सख्त नहीं होगा।
बहुत सारे लोग शहरी-शिक्षित होने का दम तो भरते हैं, लेकिन जब जिम्मेदारी निभाने की बारी आती है, तो उन्हें सांप सूंघ जाता है। घर के पुरुष सदस्य नौकरी या व्यापार के सिलसिले में बाहर निकलते हैं, दस-बारह घंटे मेहनत करते हैं, पैसा कमाते हैं, जिससे परिवार का जीवनयापन होता है। यह तर्क अक्सर पुरुषों की ओर से दिया जाता है। लेकिन, लेकिन, गृहणी उस वक्त में घर में कितना काम करती है, जिससे घर एक घर बना रहता है, यह बात बहुत कम लोग समझ पाते हैं। वह भोजन, साफ-सफाई, बच्चों की देखभाल-शिक्षा, रिश्ते-नातेदारों की आवभगत और बड़े-बुजुर्गों की सेवा जैसे अनगिनत काम दिन भर में अंजाम देती है। इस शारीरिक-मानसिक मेहनत का मोल कितने लोग लगाते हैं?
गृृहणी के श्रम के मो को हम कब समझेंगे। कामकाजी-नौकरीपेशा महिलाओं की हालत कमोबेश अच्छी है, लेकिन उन्हें भी घर में दोयम दर्जे का प्राणी समझा जाता है। अपवादों को छोड़ दें तो उन्हें नेतृत्वकर्त्ता की भूमिका में स्वीकार नहीं किया जाता। गोया आॅफिस-प्रतिष्ठान में उन्हें काम नहीं करना पड़ता और तनख्वाह मुफ्त में हाथ लग जाती है। धारणा यही है कि घर का खर्च पुरुष सदस्य की कमाई से चलता है। जबकि हकीकत यह है कि महिलाओं को अपने कार्यक्षेत्र में अपेक्षाकृत ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है, ज्यादा जिम्मेदारियां उठानी पड़ती हैं और स्वयं को साबित करना पड़ता है। महिलाएं आज हर वह कार्य बखूबी अंजाम दे रही हैं, जिन पर कभी पुरुषों का एकाधिकार था। ऐसा माना जाता है कि महिलाएं अमुक जिम्मेदारी ठीक से निभा नहीं सकतीं। लेकिन, अब साबित हो चुका है कि महिलाओं के लिए कुछ भी असंभव नहीं है।
बराबरी का अधिकार तो जैसे महिलाओं के लिए अब भी एक सपना है। पुरुष प्रधान समाज आज भी यह मानने को तैयार नहीं है कि महिलाएं भी पुरुषों के मानिंद साहस दिखा सकती हैं, सोच सकती हैं और फैसले ले सकती हैं। कुछ समय पहले देश के दो राज्यों उत्तर प्रदेश और हरियाणा में पंचायत चुनाव हुए, जिनमें बड़ी संख्या में महिलाओं ने हिस्सा लिया और जीत भी हासिल की। लेकिन, शिक्षित युवाओं को छोड़कर बाकी महिला प्रत्याशियों के पोस्टर-परचे में उनकी पहचान फलां की पत्नी, फलां की बहू के रूप में बताई गई। यही नहीं, वे जिसकी पत्नी-बहू थीं, उसका फोटो पोस्टर-परचे पर इतराता दिखा और असल प्रत्याशी का चेहरा गायब! पार्षद पति, प्रधान पति, सरपंच पति और मुखिया पति के रूप में पहचाने जाने वाले लोग किस कदर लोकतंत्र का, बराबरी के अधिकार का मजाक उड़ाते हैं, यह बात किसी से छिपी नहीं है।
यह कितना विडंबनीय है कि जीतने वाली महिलाओं को घरेलू कामों में उलझा दिया जाता है और उनके पति उनकी जगह पदाधिकारी बनकर घूमते हैं। असल पदाधिकारी सिर्फ दस्तखत करता है, बिना यह जाने कि संबंधित कागजात पर लिखा क्या है। चुनाव लड़ने का अधिकार और शासन में हिस्सेदारी जैसी बातें महज जुमले जैसी हो गई हैं। महिलाओं की सुरक्षा, उनका सम्मान और उन्हें बराबरी का हक देना-दिलाना पूरे समाज की जिम्मेदारी है। यह जिम्मेदारी सिर्फ भाषणों-व्याख्यानों में न उलझ कर रह जाए, बल्कि इसे आचरण में भी उतरना चाहिए। और तभी, हम सही मायने में महिलाओं के साथ न्याय कर सकेंगे। (महेंद्र अवधेश)

