योगिता यादव
ये महिलाओं की प्रगति की सालाना बही को पलटने का मौका है। बीते समय में हम कितना चले, कितना बढ़े, इसका कुछ हिसाब-किताब कर लें। वास्तविकता ये है कि स्त्री को चलने को सिर्फ चार कदम भर का रास्ता दिया जाता है और उसमें खड़ी कर दी जाती हैं सोलह तरह की बाधाएं। चार कदम और सोलह बाधाओं के साथ उसे जीतनी है लैंगिक समानता की ट्रॉफी। इस संघर्ष में उसके मन पर तकलीफदेह छाले पड़े हैं। कभी-कभी इन छालों को भी ‘सुख के सांह’ की जरूरत होती है।
नृत्य देह की सबसे प्यारी कविता है। गुजरात का एक सुंदर नृत्य है ‘डांडिया रास’। इसमें स्त्रियां और पुरुष मिलकर लयदार नृत्य करते हैं। लय, सुर, ताल में दोनों की देह पंक्ति दर पंक्ति लरजती है। इसी से मिलता-जुलता परिवर्तित या परिवर्धित एक और नृत्य है जो जम्मू के पहाड़ी इलाकों में किया जाता है। इसका नाम है ‘डंडारस’। इसमें डांडिया होती हैं, संगीत होता, पुरुष होते हैं पर स्त्रियां नहीं होतीं। डांडिया रास से डंडारस तक स्त्रियों के हटते ही वहां लय और ताल विगलित होने लगते हैं पराक्रम बढ़ने लगता है। डांडिया रास और डंडारस दोनों की डांडियों की खड़कती आवाज बदल जाती है। हमारी देश की प्रगति को डांडिया रास होना था, यह डंडारस सी होती जा रही है। सुंदरता गुम होती जा रही है, पराक्रम बढ़ता जा रहा है।
आशीर्वचनों की पहरेदारी
औरतों को शाम होने से पहले घर लौट आना चाहिए, उन चार दिनों में कुकिंग नहीं करनी चाहिए, समय रहते शादी कर लेनी चाहिए, शादी की है तो बच्चे होने चाहिए, बच्चे हैं तो ‘परिवार प्रथम’ प्राथमिकता होनी चाहिए और परिवार है तो आपको चुप रहना सीख लेना चाहिए। हाई कोर्ट ने जब सेना में महिलाओं को पुरुषों के समान कमीशन देने का निर्देश दिया, तो इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। इस मामले में अपना लिखित प्रतिवेदन प्रस्तुत करते हुए सरकार ने जो कहा वह पूरे समाज की प्राथमिकता को प्रतिबिंबित करता है।
सरकार ने जो आपत्तियां दर्ज कीं उनमें से एक यह थी कि ‘महिलाओं पर परिवार संभालने और बच्चों की परवरिश की महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी होती है। उन्हें अगर स्थायी कमीशन दिया जाएगा तो इससे परिवार प्रभावित होंगे।’ निश्चित रूप से एक स्त्री परिवार की धुरी है। पर क्या इस धुरी के अपने मौलिक अधिकार नहीं हैं? संविधान में बराबरी के अधिकार का उल्लेख किया गया है। इसी के आलोक में 20 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के हक में फैसला दिया। अभी तक सेना में महिलाओं की हिस्सेदारी केवल 3.89 फीसद थी जबकि जल सेना में 6.7 फीसद और वायु सेना में 13.28 फीसद थी। इस फैसले के बाद निश्चित ही सेना में उनके लिए अवसर भी बढ़ेंगे।
श्रम ज्यादा भत्ते कम
1995 में बीजिंग में हुई यूएन वुमैन समिट में इस बात पर गहन चिंता व्यक्त की गई कि महिलाएं ज्यादा श्रम करती हैं जबकि उसके बदले में उन्हें मिलता बहुत कम है। इसलिए महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता और स्वावलंबन के लिए गंभीर प्रयास करने की जरूरत है। 2020 में बीजिंग घोषणा के 25 साल पूरे हो रहे हैं। अब आप सरकारी वेज बोर्ड के आंकड़े दिखा कर यह दावा कर सकते हैं कि हमने अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लिया है। पर इन आंकड़ों की हिस्सेदारी अर्थव्यवस्था में बस उतनी ही है जितनी सब्जी में जीरे की। सरकारी नौकरी तक पहुंचने वाली महिलाओं का फीसद अब भी पुरुषों की तुलना में बहुत कम है।
जब सर्वाधिक श्रम से जुड़े क्षेत्रों यथा कृषि, डेयरी, पशुपालन, हथकरघा आदि में उनका फीसद पुरुषों से बहुत ज्यादा है। जहां सस्ते श्रम से काम चलाया जा सकता है या जहां वेतन भत्तों पर सौदेबाजी जितनी ज्यादा गुंजाइश है, वहां महिलाओं की संख्या उतनी ज्यादा है। यह श्रम और भत्ते के बाजीगरों के लिए सबसे आसान निशाना है। सॉफ्टवेयर उद्योग में 30 फीसद महिला कर्मचारी हैं। यहां वेजेस की गणना आसानी से की जा सकती है। जबकि ग्रामीण रोजगार में जहां भत्ता पारदर्शी नहीं हैं वहां महिला श्रमिकों की उपस्थिति 89.5 फीसद तक है।
कृषि उत्पादन में भी महिलाओं की औसत भागीदारी 55 फीसद से 66 फीसद के दरमियान है। अगर 1991 की विश्व बैंक की रिपोर्ट को मानें तो डेयरी उद्योग में 94 फीसद महिलाएं हैं।
एक नई प्रथा
सती, जौहर, पर्दा और देवदासी प्रथा के बाद अब एक नई प्रथा चल पड़ी है, जिसका नाम है बलात्कार। हर उम्र, हर वर्ग, हर तबके और हर धर्म-जाति की महिलाएं इसकी शिकार हो रही हैं। यह उन पर ऐसा हिंसक हमला है कि जिसके संकेत और संदेश बहुत विकराल और मर्मांतक हैं। बलात्कार एक लड़की का होता है और हजारों, लाखों, करोड़ों लड़कियों के जेहन में उसकी खरोंच महसूस होने लगती है। भारत ही नहीं दुनिया भर में बलात्कार महिलाओं की जिंदगी, प्रगति और खुशहाली की राह की एक बड़ी बाधा बन गया है।
65 देशों से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर तैयार की गई संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट में कहा गया है कि हर साल 250,000 बलात्कार के मामले दर्ज किए जाते हैं। जबकि दर्ज न हो पाने वाले मामलों का आंकड़ा और भी भयावह हो सकता है। अभी हाल के एक मामले में बलात्कार पीड़ित बच्चियों ने सरकारी वकील पर ही यह आरोप लगाया कि उसने उन पर दोषी से मिलने, समझौता करने और कोर्ट में गलत बयान देने का दबाव बनाया। बच्चियों को इस बात का अहसास मुकदमा खत्म होने के तीन साल बाद हुआ जब वे बचपन से किशोर उम्र की ओर बढ़ रहीं थीं।
निर्भया बलात्कार कांड ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। उसका असर यह हुआ कि बलात्कार पर सख्त कानून बनाए गए। अब जब कानून बन गए हैं और दोषी फांसी के तख्ते तक पहुंच गए हैं तब एक ‘विद्वान वकील’ अपनी कानूनी बाजीगरी से बलात्कार के खिलाफ लड़ी गई इतनी लंबी लड़ाई को अंगूठा दिखा रहा है। ये अंगूठा लैंगिक समानता की राह का रोड़ा बनेगा निश्चित ही। इस पर कानून का मुलम्मा चढ़ा है जिसे संविधान भी नहीं मरोड़ पाएगा।
इन चोटों का मरहम नहीं है
मामला थोड़ा पेचीदा है पर इसका संबंध स्त्रियों के आत्मविश्वास और उनकी सफलता से है। संयुक्त राष्ट्र के लिए किए जा रहे एक सर्वेक्षण में महिलाओं से बलात्कार के संबंध में सवाल पूछे गए। इस पर कुछ खास आंकड़े जमा हुए। पर यह आंकड़े तब बिल्कुल बदल गए जब इसमें एक सवाल और जोड़ा गया। इन महिलाओं से पूछा गया कि क्या कभी आपको असहमति से सेक्स के लिए विवश होना पड़ा है? इस पर अधिकतर महिलाओं ने हां में जवाब दिया। ये वे मामले हैं जिनकी कभी, कहीं शिकायत नहीं की गई और महिलाएं भीतर ही भीतर इस तकलीफ और अपमान को बर्दाश्त करती रहीं। जिसका उनके स्वास्थ्य पर भी नकारात्मक असर पड़ा।
विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार जबरन सेक्स से महिलाओं को स्त्री रोग संबंधी विकार, प्रजनन संबंधी विकार, यौन विकार, बांझपन, संक्रमण, सूजन, गर्भावस्था की जटिलताओं, गर्भपात, यौन रोग (एचआइवी/ एड्स सहित यौन संचारित संक्रमणों को प्राप्त करना), आत्महत्या का खतरा, अवसाद, मानसिक प्रताड़ना, मनोदैहिक विकार, असुरक्षित गर्भपात और मृत्यु तक के गंभीर खतरों का सामना करना पड़ता है। शरीर और मन की इन तकलीफों का अभी तक न तो कोई स्वास्थ्य बीमा होता है और न ही किसी वेज बोर्ड में इनके लिए कोई छुट्टी निर्धारित की गई है।
अधूरे मुसाफिरों की मंजिलें
सत्तर और अस्सी के दशक में भारत में महिला सशक्तिकरण की दिशा में चलाए जा रहे प्रयासों की एक बड़ी चिंता यह होती थी कि लड़कियों की शादी जल्दी कर दी जाती है, जिससे उनकी पढ़ाई अधूरी रह जाती है। समय रहते इस समस्या को दूर करने के प्रयास सभी स्तरों पर किए गए। यह तय किया गया कि अठारह साल से पहले लड़कियों की शादी न हो जिससे कम से कम उनकी बारहवीं तक की पढ़ाई पूरी हो जाए। पर केवल स्कूली पढ़ाई के बूते सामाजिक और आर्थिक प्रगति संभव नहीं थी।
इसलिए यह जरूरत महसूस की गई कि उन्हें व्यावसायिक शिक्षा की ओर भी ध्यान देना होगा। अब लड़कियों और उनके परिवारों ने यह तय किया कि वे उच्च शिक्षा प्राप्त करेंगी और करिअर भी उनकी प्राथमिकता में होगा। नब्बे के अंत तक आते भारत में उच्च शिक्षा में भी लड़कियों का फीसद बढ़ने लगा था। पर अब भी शादी एक सीमा रेखा थी, जिसके बाद कुछ न कुछ तो बदलता ही था। शादी के बाद सिर्फ सामान्य मध्य वर्गीय परिवार की लड़कियां ही नहीं, बल्कि सिल्वर स्क्रीन पर बोल्ड अभिनय करने वाली लड़कियां भी करिअर अधूरा छोड़ देती थीं। 2020 तक आते लड़कियां अब अपने करिअर से किसी भी तरह का समझौता नहीं करना चाहतीं। वे इसके लिए सात समंदर पार के प्रस्ताव भी स्वीकार रही हैं और ‘परिवार पहले’ के आग्रह को भी छोड़ा है।

