भरत तिवारी
वहीदा रहमान क्या हैं?’ पूछने पर वे कहती हैं – ‘मैं एक अच्छा इंसान बनने की कोशिश कर रही हूं। मैं बहुत खुश हूं। बहुत संतुष्ट हूं। मैं हर दिन सीखती हूं। मैं खुद को बेहतर बनाना चाहती हूं। बस इतना ही। यही हैं वहीदा।’दिल्ली के ली मेरिडियन होटल की ग्यारहवीं मंजिल पर अपने कमरे में तने हुए कंधों पर स्थित सुडौल सीधी गर्दन को जरा-सा हिलाते हुए सामने खिड़की से आती रोशनी में सूरज की तरह चमकती वहीदा रहमान ने मुस्कुराते हुए मुझे जवाब दिया। सोफे पर वे उस इंसान की मूरत दीख रही थीं, जो अपने बारे में पूर्णतया निश्चित और निश्चिंत है। आंखों की तरह ही गहरा चेहरा, चेहरे से टपकती हुई गरिमा और इस उम्र में भी जीवन के प्रति युवाओं-सा उत्साह। वहीदा रहमान का नाम सुनने पर हमारे जेहन में जो सम्मानित छवि अनायास बन जाती है वह भारतीय फिल्म जगत की अभिनेत्रियों को जल्दी नहीं नसीब होती। इक्यासी वर्ष की वहीदा रहमान के चाहने वालों की संख्या में कोई कमी आई हो, ऐसा नहीं है। खुशी की बात यह है कि जब मैंने अपनी किशोर पुत्री से उनके बारे में पूछा, तो उसने ‘रंग दे बसंती’ का नाम बड़े सम्मान से लिया। जब यह बात मैंने उन्हें बताई, तो वे बोलीं कि करैक्टर रोल करते समय वे रोल के इम्पैक्ट को देखती हैं न कि उसकी लंबाई।
हमारे समय की एक नए और बोल्ड विषय को परदे पर दिखाने वाली फिल्म ‘लम्हे’ की कहानी सुनाने के बाद निर्देशक यश चोपड़ा ने उनसे दो दफा पूछा ‘आपको इसका अंत कैसा लगा?’ ऐसा उन्होंने इसलिए पूछा, क्योंकि कुछ लोगों का उनसे कहना था कि अनिल कपूर (फिल्म के हीरो) कैसे भला अपने से इतनी छोटी नायिका (श्रीदेवी) से शादी कर सकते हैं, वह भी तब जबकि वह उनके (एकतरफा) प्यार… इंटरवल के पहले की श्रीदेवी की बेटी है। जिसका लालन-पालन दाईजा यानी वहीदा रहमान करती हैं। फिल्म की कहानी से खुश वहीदा ने उम्र के बड़े फर्क को शादी की असफलता का कारण नहीं माना और यशजी से कहा कि मैंने ऐसी ‘सफल’ शादियां देखी हैं, जिनमें उम्र का अंतर पंद्रह-बीस वर्ष का रहा हो। भले ही फिल्म उस समय बहुत हिट नहीं हुई, लेकिन लम्हे और उसकी दाईजा को पसंद करने वाले तब भी और अब भी बहुत हैं।
अमेरिका की पूर्व प्रथम महिला मिशेल ओबामा की संस्मरणात्मक किताब ‘बीइंग’ पढ़ रही वहीदा टीवी पर किताब को तवज्जो देती हैं। हर वक्त मोबाइल पर लगे होने को त्रासदी मानती हैं और हाल ही में उनका मितरां हेलन और आशा भोंसले के साथ कपिल शर्मा के टीवी शो के लिए जाना हुआ। वह अपने मोबाइल को वैन में ही छोड़ के सेट पर गर्इं। विद्या बालन की छवि और फिल्मों के चयन में वहीदा अपने को देख पाती हैं। दो फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मनित वहीदा रहमान का दिल्ली आगमन अपनी गुरु बहन पद्मविभूषण नृत्यांगना सोनल मानसिंह के पचहत्तरवें जन्मोत्सव में बतौर मुख्य अतिथि था। इन दोनों विभूतियों ने एक समय नृत्यगुरु जयलक्ष्मी अल्वा से भरतनाट्यम सीखा था। शास्त्रीय नृत्य के भविष्य के सवाल पर वहीदा रहमान से तपाक से बोलीं- ‘शुक्र है कि सोनल मानसिंह जैसे लोग अभी भी हैं, जो इस कला को तवज्जो देते हैं और इसे कायम रखे हैं’। क्लासिकल और पुराने फिल्मी गीतों को पसंद करने वाली वहीदा रहमान कहती हैं कि उनके समय में फिल्म अधिकतर प्रेम कहानी होती थी, नायक-नायिका अपने प्रेम का इजहार करते और इस तरह प्रेम से जुड़े गीत फिल्म में आते। आजकल इंतजार नहीं है। ‘मॉडर्न हो गए हैं। एक, दो, तीन मुलाकात और सीधा बिस्तर में… पहले पब्लिक कहती थी, ‘अरे हाथ तो पकड़ो…’
मैंने भी पूछ ही लिया। ‘अब क्या ‘प्यार’ पहले से कम हो गया है?’ ऐसा तो नहीं है, लेकिन संयम खत्म हो गया है। तुरंत परिणाम चाहिए। आपकी उम्र कितनी भी हो, पर यह जरूरी है कि आप खुद में सुधार करते रहें, न कि आप दूसरे से सुधरने को कहते रहें। संतोष हो, कि मैं सब कुछ नहीं… इतना ही कर सकता हूं या कर सकती हूं- यह समझना ही सब समझना है।
