दस राज्यों के चौबीस ऐतिहासिक स्थल लुप्त मान लिए गए हैं। इनमें राजस्थान का बारहवीं सदी का मंदिर, असम के बादशाह शेरशाह की तोपें, हरियाणा की दो कोस मीनार और जम्मू-कश्मीर में चट्टानों पर हुई नक्काशी शामिल है। इन्हें या तो नष्ट कर दिया गया है या उनका अतिक्रमण कर उन पर नए निर्माण करा लिए गए हैं। उत्तर प्रदेश में ग्यारह संरक्षित स्मारकों का अस्तित्व नहीं है। हरियाणा, महाराष्ट्र, राजस्थान और दिल्ली में दो-दो ऐतिहासिक विरासतों का कोई अता-पता नहीं है। उत्तर प्रदेश में लखनऊ के तीन, वाराणसी के दो और मिर्जापुर, चंदौली, बलिया, बांदा, ललितपुर और हरदोई के एक एक विरासत स्थल लुप्त हो गए हैं।

सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि लूट और तस्करी का शिकार हो रही है विरासत। 2013 में छत्तीसगढ़ के तरीघाट में जमीन की खुदाई करते हुए मजदूरों को एक कलश मिला, जो सोने और तांबे के सिक्कों से भरा था। जहां खुदाई हो रही थी, माना जाता है कि वहां करीब ढाई हजार पुराना शहर था। उसे संरक्षित क्षेत्र घोषित कर वहां के भग्नावशेषों से इतिहास के कुछ नए तथ्य तलाशने की कोशिश नहीं हुई। पहले भी ऐसी कई खबरें आती रही हैं कि पुरातात्त्विक महत्त्व के स्थलों की खुदाई के दौरान सोना या अन्य बहुमूल्य वस्तुएं मिलने से वहां लूट-खसोट मच गई। सबसे बड़ी और चौंका देने वाली घटना तो सन 2000 में उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर के पास मंडी में हुई। गांव के खेत में तीन महिला मजदूरों को जमीन खोदने पर सोने का प्रचुर भंडार मिला। हड़प्पा काल का यह खजाना पांच सौ किलो से ज्यादा सोना और सोने के बने आभूषण समेटे था। सारा खजाना लुट गया। पुरातात्त्विक विभाग की गफलत का यह आलम रहा कि अनुमानित पांच सौ किलो के स्वर्ण भंडार से सिर्फ दस किलो सोना बचाया जा सका। ऐतिहासिक और संरक्षित स्थलों से प्राचीन और ऐतिहासिक महत्त्व की वस्तुओं को तस्करी के जरिए बाहर भेजने का कारोबार एक अलग समस्या बना हुआ है। यह अरबों डॉलर का हो चुका है। 1970 में हुई यूनेस्को संधि के तहत व्यवस्था हुई थी कि चोरी या तस्करी से विदेश गई ऐतिहासिक स्थल की कलाकृतियों या अन्य विरासतों को वापस मांगा जा सकता है। अब तक सरकार को पुरातात्त्विक महत्त्व की अट्ठाईस वस्तुएं ही वापस मिल पाई हैं। अठारह अमेरिका ने लौटार्इं और बाकी दस अन्य देशों ने। इनमें मुर्शिदाबाद के सागरदीघी की विष्णु की कांस्य प्रतिमा और शिवपुरम की कांसे की ही नटराज की मूर्ति प्रमुख थी। जो वस्तुएं वापस मिलीं, उनमें मूर्तियां और कलाकृतियां ज्यादा थीं। उपेक्षित ऐतिहासिक स्थलों से मूर्तियां और कलाकृतियां तस्करी से इन चालीस सालों में विदेश गर्इं उसकी तुलना में उनकी वापसी आटे में नमक से भी कम रही है। धरोहरों की हिफाजत के लिए बना कानून ही उनके अवैध कारोबार की मुख्य वजह बनता जा रहा है।

प्राचीन संपदाओं की तस्करी और उसके अवैध कारोबार को रोकने के लिए 1972 में ‘द एंटीक्स एंड आर्ट ट्रेजर्स एक्ट’ बना था। इसमें एएसआई को सौ साल से पुरानी सभी कला वस्तुओं को दर्ज कर क्रमबद्ध करने का अनिवार्य काम सौंप दिया गया, जबकि उसे संसाधन मुहैया नहीं कराए गए। ऐतिहासिक महत्त्व की प्राचीन वस्तुओं की विदेशों में तस्करी की सबसे बड़ी वजह यह है कि विदेशों में इन वस्तुओं की ज्यादा मांग और उनके प्रति ज्यादा आकर्षण है। दाम तो वहां से ज्यादा मिलते ही हैं। संसाधन की कमी की समस्या एएसआई के सामने विकट है। देश भर में फैले ऐतिहासिक महत्त्व के स्थलों की गणना तक करने लायक संसाधन उसके पास नहीं हैं, उनका ठीक से रख रखाव करने की बात तो दूर रही। प्राचीन स्मारकों में अतिक्रमण को रोकने का उसे कोई वैधानिक अधिकार नहीं है। उसके लिए उसे स्थानीय पुलिस प्रशासन पर निर्भर रहना पड़ता है। एएसआई को किस तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ता है, इसकी एक मिसाल है दिल्ली के निजामुद्दीन इलाके में बना लाल महल। यह स्मारक भारत में ही नहीं, पूरे उपमहाद्वीप में सबसे पुराने इस्लामी स्मारक में से एक है। ग्यासुद्दीन बलबन के दिल्ली का सुल्तान बनने से कुछ ही पहले 1240 में इसका निर्माण हुआ था। माना जाता है कि विख्यात यात्री इब्ने बतूता चौदहवीं सदी में दिल्ली प्रवास के दौरान लाल महल में ही ठहरा था। 1947 तक के नक्शों में लाल महल को एएसआई के संरक्षण में बताया गया था। लेकिन आजादी के बाद कुछ परिवारों ने इस पर कब्जा कर लिया। 2008 में रातों रात लाल महल का बाहरी गलियारा और भीतर का कुछ हिस्सा ढहा दिया गया। एएसआई के आला अधिकारियों ने नगर निगम और विरासत संरक्षण समिति की मदद से दोषियों के खिलाफ कार्रवाई तो की, लेकिन उसके बाद उस पर पर्याप्त ध्यान न दिए जाने की वजह से वहां निर्माण होना जारी रहा। 2008 में स्मारक के चारों तरफ टीन की चादर लगा दी गई थी। अब उसकी जगह र्इंट की दीवारों ने ले ली है।

देश में तीन हजार छह सौ छियासी स्मारक पुरातात्त्विक स्थल और ऐतिहासिक अवशेष हैं। इनके संरक्षण का काम एएसआई के जिम्मे है। इनमें से पांच सौ छह कर्नाटक में, चार सौ तेरह तमिलनाडु में, दो सौ बानबे मध्यप्रदेश में, दो सौ पचासी महाराष्ट्र में, एक सौ चौहत्तर दिल्ली में, एक सौ बासठ राजस्थान में और एक सौ छत्तीस बंगाल में हैं। उनके मौलिक शिल्प को बचाए रख कर उन्हें सुरक्षित रखने के लिए 2011 में अठारह सदस्यों की समिति ने राष्ट्रीय संरक्षण नीति बनाई थी। उस पर कारगर अमल होना बाकी है। समस्या यह है कि एएसआई के पास पर्याप्त स्टाफ नहीं हैं। इससे विरासत स्थलों का ठीक से रख-रखाव और सुरक्षा नहीं हो पा रही है। संसाधन की कमी तो है। पिछले तीन साल में ताजमहल देखने आए पर्यटकों से करीब पचहत्तर करोड़ रुपए की आय हुई, लेकिन ताजमहल के संरक्षण पर ग्यारह करोड़ रुपए ही खर्च हो पाए।