नाज खान
श्रीलंका में आतंकवाद की घटना के बाद बुर्के पर लगे प्रतिबंध ने भारत में बुर्का बनाम घूंघट की एक नई बहस को हवा दे दी। मगर बुर्के पर प्रतिबंध के पक्ष और विपक्ष में उठी बहस के बीच ऑस्कर पुरस्कार विजेता संगीतकार एआर रहमान की बेटी खदीजा की नकाब पहने हुए वायरल हुई एक तस्वीर ने इस बहस के रुख को ही बदल दिया और सवाल उभरा कि क्या पर्दा प्रथा पर प्रतिबंध को महिला अधिकारों का उल्लंघन माना जाए? जैसा कि बीते वर्ष संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार समिति ने बुर्का पर प्रतिबंध को गलत बताते हुए कहा था कि यह न सिर्फ महिलाओं के अधिकारों का उल्लंघन, बल्कि उनके धार्मिक विश्वास को ठेस पहुंचाना भी है। वहीं एमनेस्टी इंटरनेशनल भी बुर्का पर प्रतिबंध के विरोध में है। संगठन का तर्क है कि महिलाओं के सशक्तिकरण का उद्देश्य उनके लिए मौजूदा विकल्पों को बढ़ाना है, न कि मौजूद विकल्पों को और सीमित कर देना।
केरल की बॉडी बिल्डर मजीजिया भानु के शब्दों में कहें तो अगर कोई महिला अपने शरीर को दिखाने के लिए स्वतंत्र है, तो उसे ढकने के लिए भी स्वतंत्र होना चाहिए। ऐसे में पर्दा प्रथा का अधिकार सिर्फ महिलाओं की अपनी मर्जी पर छोड़ देना मुनासिब नहीं होगा? आज के प्रगतिशील समाज में भले ही एक वर्ग इसे रूढ़ियों की बेड़ियों से जोड़ कर देख रहा हो, लेकिन भारत, अमेरिका सहित कई विकसित देशों में उन महिलाओं के उदाहरण भी सामने हैं, जिन्होंने इस परंपरा को अपने अधिकार बतौर निभाते हुए हिजाब पहन कर न सिर्फ मॉडलिंग की, बल्कि बॉडी बिल्डिंग चैंपियन प्रतियोगिता में भी अपना परचम बुलंद किया। कुछ समय पहले फिल्म दंगल में अभिनय कर चुकी जायरा वसीम ने यह कह कर कि हिजाब पहने हुए महिलाएं खूबसूरत और स्वतंत्र होती हैं इस ओर सोचने पर मजबूर जरूर कर दिया था कि बुर्का, घूंघट या हिजाब स्त्री की आजादी के अधिकारों में शामिल होना चाहिए या पर्दे को स्त्री आजादी की राह में पड़ी बेड़ियों की तरह देखना चाहिए। समय की मांग तो यही है कि इसे तय करने का अधिकार स्त्री पर ही छोड़ देना चाहिए। अपनी परिस्थितियों, सोच के मुताबिक वह खुद तय करे कि पर्दा उसकी संस्कृति का हिस्सा है या उसकी आजादी और उनके व्यक्तित्व को बाधित करने वाली चीज है, क्योंकि भारत में घूंघट जहां संस्कृति से जुड़ी परंपरा है, वहीं इसके कुछ मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और कुछ आर्थिक कारण भी रहे हैं, क्योंकि कुछ ऐसे उदाहरण भी मिलते हैं जब संपन्न घरों की स्त्रियां पर्दा करती थीं।
पर्दा पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने वाली एक ऐसी परंपरा है, जहां अपने से बड़ों के सामने सिर को ढकना बड़ों के सम्मान के रूप में देखा जाता रहा है। वहीं कुछ ऐसे उदाहरण भी मिलते हैं जब संपन्न घरानों की स्त्रियां अपने सौंदर्य को छुपाए और बनाए रखने के लिए पर्दे का सहारा लेती थीं। अरब आदि देशों में भी रेत और धूप से बालों, त्वचा को बचाने के लिए महिलाएं सिर और चेहरे को कपड़े से बांधे रखती थीं। आज इसका परिवर्तित रूप हमारे सामने है और हाथों, चेहरे के सुरक्षा कवच के तौर पर स्टॉल, हिजाब, स्कार्फ जैसे परिधान चलन में हैं। देखा जाए तो आज प्रगतिशील वर्ग उच्चशिक्षित महिलाएं भी खास अवसिरों पर घूंघट या ओढ़नी का इस्तेमाल करती हैं। पाकिस्तान की पूर्व विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार हों या फिल्मी पर्दे पर धूम मचाने वाली विपाशा, ऐश्वर्य, अनुष्का जैसी बिंदास अभिनेत्रियां, इन्होंने अपने विवाह आदि खास अवसिरों पर सिर पर पल्लू डाल कर समाज में सम्मान की नजरों से देखे जाने वाली इस पर्दा प्रथा का अनुकरण ही किया है। ऐसे में इसे पूरी तरह किसी दबाव या पिछडेÞपन से जोड़ कर नहीं देखा जा सकता। मगर पूरी तरह इससे इनकार भी नहीं किया जा सकता, क्योंकि आज भी मध्यवर्गीय और निम्न वर्गों में पर्दे की प्रथा स्त्रियों पर थोपी हुई अधिक लगती है। आज पर्दे के पक्ष-विपक्ष की बहस के बीच यह सवाल जरूर उठता है कि क्या महिलाओं को इसे अपनी मर्जी से अपनाने, न चाहने का विकल्प नहीं देना चाहिए।
पुराना है चेहरा ढकने का रिवाज: यह धारणा निराधार है कि पर्दा प्रथा मुगलों के शासन की देन है। मगर इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि कुछ शासकों ने इसे कड़ाई से लागू किया और इस्लाम संस्कृति के प्रभावस्वरूप पर्दा प्रथा को बल मिला। हालांकि रजिया सुल्तान जैसी शासिका का उदाहरण मौजूद है, जिसने बेपर्दा रह कर शासन करते हुए चुनौती भी पेश की। वहीं नूरजहां भी पर्दा प्रथा को नकारते हुए अपने पति के साथ खुले दरबार में हाजिर होती थीं। पहली सदी से पहले बेंजाटाइन साम्राज्य, जिसे पूर्वी रोमन साम्राज्य भी कहा जाता था, उसमें महिलाएं अपने सिर को ढक कर रखती थीं। ग्रीक दार्शनिक और इतिहासकार स्त्राबो ने भी पहली सदी में मध्य दुनिया के देशों में महिलाओं के चेहरा ढकने का जिक्र किया है। वहीं उच्च वर्ग में पर्दा प्रथा सम्मान की प्रतीक रही है। कुछ वर्गों में रक्त शुद्धता को बनाए रखने के लिए पर्दे का कठोरता से पालन किया गया। आचार्य नारायण दत्त तिवारी शास्त्री रामचरितमानस के अयोध्याकांड का जिक्र करते हुए कहते हैं कि ‘स्त्रियों के सिर ढकने का चलन पुराना है। रामायण में जब राम और सीता वनवास को जाते हैं तो रास्ते में जब अन्य स्त्रियों ने उनसे राम का परिचय पूछा, तो उन्होंने पहले अपने आंचल को कुछ नीचे किया, अपना सिर ढका और सिर को कुछ झुकाते हुए इशारे से उनके पति होने का परिचय दिया। वहां तो उनका कोई बड़ा भी उपस्थित नहीं था, लेकिन सम्मान के तौर पर परिचय देने के लिए भी उन्होंने सिर को ढका। इस तरह पर्दा प्रथा घृणास्पद नहीं है, इसे मर्यादा की दृष्टि से देखना चाहिए।’ इसके प्रचलन के साक्ष्य प्राचीन साहित्यिक महाकाव्यों में मिलते हैं। बौद्धकाल की कुछ रानियां पर्दायुक्त रथों पर यात्रा करती थीं। वहीं भास के नाटक में पर्दाप्रथा का उल्लेख मिलता है। स्वप्नवासवदत्ता में पद्मावती विवाह के बाद पर्दे में रहना पसंद करती है। भवभूति और माघ की रचनाओं से भी पर्दा के प्रचलित होने की सूचना मिलती है। वहीं वाल्मीकीय रामायण में घूंघट का उल्लेख कई बार किया गया है। ऐसे ही एक जगह कहा गया है, ‘दृष्टा न खल्वभिक्रुद्धो मामिहानवगुण्ठिताम्, निर्गतां नगरद्वारात् पद्भ्यामेवागतां प्रभु’ यानी प्रभु आज मेरे मुंह पर घूंघट नहीं है, मैं नगर द्वार से पैदल ही चल कर यहां आई हूं। इस दशा में मुझे देख कर आप क्रोध क्यों नहीं करते। घूंघट एक स्वैच्छिक क्रिया है न कि थोपी गई और यह प्राचीन काल से ही प्रचलन में थी। वहां इसे सौंदर्य के प्रतीक के तौर पर मान्यता प्राप्त थी। इसके अलावा संस्कृत के शब्द अवगुंठन का तो अर्थ ही है घूंघट। संस्कृत नाटकों और ऐतिहासिक उपन्यासों में भी अंत:पुर का जिक्र है। इसका मतलब है आंतरिक स्थान यानी एक तरह का पर्दा पहले भी था। वहीं पौराणिक कथाओं में देखें तो स्त्री हो या पुरुष सभी सिर को ढकने के लिए मुकुट पहनते थे। दरअसल, इस तरह सिर ढकने के पीछे एक वैज्ञानिक कारण यह बताया जाता है कि इससे मस्तिष्क को एकाग्र बनाए रखने में मद्द मिलती है।
घूंघट और सौंदर्य : कवियों और शायरों ने घूंघट बनाम पर्दे को स्त्री सौंदर्य से जोड़ा, तो कबीर ने इसको अध्यात्म से जोड़ कर देखा। ‘घूंघट के पट खोल रे तोको पिया मिलेंगे’ कह कर कबीर अलौकिक दुनिया की बात करते हैं। वहीं इंकलाब की बात करते हुए मजाज ने इससे बगावत की बात कही है, ‘तेरे माथे पे यह आंचल बहुत ही खूब है, लेकिन तू इस आंचल से एक परचम बना लेती तो अच्छा था।’ कहा यह भी जाता है कि महिलाओं में घूंघट सौंदर्य केलिए भी अपनाया जाता था। यही कारण है कि रूप सौंदर्य के वर्णन में घूंघट का जिक्र बार-बार कवियों ने किया है। फिर चाहे कवि हरिराम व्यास हों या कालिदास। यही कारण है कि इन कवियों के यहां घूंघट एक सौंदर्य के प्रतीक के तौर पर उभरा है। अभिज्ञान शाकुंतलम में कालिदास लिखते हैं, इन तपस्वियों के बीच वह घूंघट वाली सुंदरी कौन है, जो पीले पत्तों के बीच में नई कोंपल के समान दिखाई पड़ रही है। वहीं कामशास्त्र में कई ऐसे उदाहरण हैं, जहां घूंघट को कामुकता का प्रतीक और ललचाने वाला बताया गया है।
पर्दे के विरुद्ध जीत का परचम : बुर्का या घूंघट के रूप में जारी पर्दा प्रथा की हिमायत में जहां परंपराओं का हवाला दिया जाता रहा है, वहीं इसके विरोध में बोलने वालों के लिए घूंघट और बुर्का ऐसी जीवन शैलियां हैं, जो पुरुषों और महिलाओं में भेदभाव के लिए खींची गई और वे सवाल उठाते रहे हैं कि आखिर पर्दे के नाम पर परंपराओं को बचाने का सारा जिम्मा महिलाओं पर ही क्यों? यह सही है कि आज भी ऐसे बहुत से उदाहरण हैं, जहां सामाजिक दबाव के कारण महिलाएं पर्दा प्रथा को ढोने पर विवश हैं, मगर ऐसे उदाहरण भी मौजूद हैं, जब उन्होंने घूंघट के खिलाफ आवाज उठाई और उन्हें पर्दे की परंपरा से छुटकारा मिला। बीते वर्ष हरियाणा के सोनीपत के मलिक गोत्र की गठवाला खाप ने महिलाओं को घूंघट प्रथा से छुटकारा दिलाया। इसके अलावा तलौड़ा, चौशाला सहित कई गांवों में भी घूंघट प्रथा के विरुद्ध आंदोलन में महिलाओं को जीत मिली। यह उदाहरण उस राज्य के हैं, जहां पर्दा प्रथा का काफी प्रभाव है और कई बार सिरकारी योजनाओं के विज्ञापनों तक में महिलाओं की घूंघट वाली तस्वीरों को राज्य की शान बता कर तवज्जो दी जाती है, लेकिन इसके बावजूद महिलाओं की इच्छा शक्ति के आगे परंपराओं के तार कमजोर पड़े। इससे स्पष्ट है कि पर्दा करना न करना महिलाओं का निजी अधिकार है और इस पर उन्हीं की मर्जी को अहमियत देनी चाहिए। इन उदाहरणों से साफ है और बात जहां तक सामाजिक दबाव या भेदभाव की है, तो आज की महिलाएं परंपराओं, प्रथाओं को चुनौती देने में सक्षम हैं। ऐसे कई देशों के उदाहरण भी मौजूद हैं, जहां बुर्के पर प्रतिबंध के बावजूद महिलाओं के बुर्का, हिजाब पहनने में इजाफा हुआ, क्योंकि इसके प्रतिबंध को उन्होंने अपने अधिकार और संस्कृति पर हमले के तौर पर देखा।
हिजाब में रह कर फतह की दुनिया: प्रगतिशील समाज में महिलाएं अपने अधिकारों के प्रति सजग हैं और उन्होंने इसके लिए संघर्ष भी किया है, कभी दम घोंटती प्रथाओं से छुटकारा पाने के लिए तो कभी कुछ परंपराओं को बनाए रखने के लिए भी। आज ऐसी प्रगतिशील महिलाओं की मिसालें सामने हैं, जिन्होंने अपनी परंपरओं को वहां भी बनाए रखा, जहां इसकी कम ही उम्मीद की जाती है। पिछले वर्ष केरल की हिजाब वाली बॉडी बिल्डर मजीजिया भानु न सिर्फ हिजाब पहन कर रिंग में उतरीं, बल्कि बॉडी बिल्डिंग चैंपियनशिप प्रतियोगिता में भाग लिया और जीत भी हासिल की। वहीं ब्रिटिश सौंदर्य ब्लॉगर और मॉडल अमीना खान भी इसका अपनी परंपराओं को बनाए रखने की अलग मिसाल पेश करती नजर आर्इं। 2018 में वह फ्रांसीसी सौंदर्य प्रसाधन कंपनी लॉरियल के विज्ञापन के लिए हिजाब वाली पहली मॉडल के तौर पर चुनी गर्इं। वहीं अमेरिकी मॉडल हलीमा एडेन ने अमेरिकी पत्रिका स्पोर्ट्स इलस्ट्रेटेड के लिए हिजाब और बुर्कीनी पहनने वाली मॉडल बन कर इतिहास रच दिया। बीते वर्ष अमेरिका में मध्यावधि चुनावों में जीतने वाली इल्हान हिजाब पहन कर शपथ लेने वाली पहली मुससिम महिला बन गर्इं। बुंदेलखंड के मुस्करा क्षेत्र का लोदीपुर निवादा गांव तो घूंघट वाली महिलाओं की कुश्ती के लिए ही प्रसिद्ध है। रक्षाबंधन के एक दिन बाद होने वाली कुश्ती के आयोजन में सैकड़ों की संख्या में महिलाएं घूंघट की आड़ लेकर अखाड़े में उतरती हैं। दरअसल, ब्रिटिश शासन में इस प्रथा की शुरुआत अंग्रेज फौज के खिलाफ महिलाओं को लड़ने के लिए तैयार करने के तौर पर की गई थी। मगर यह प्रथा आज भी महिला सशक्तिकरण के अहम उदाहरण के तौर पर जारी है। वहीं भोपाल में तो बुर्के, हिजाब के साथ जिम में कसिरत करती महिलाओं के भी उदाहरण सामने है। मुससिम समाज की इन प्रगतिशील महिलाओं के खुद को फिट रखने में पर्दा बाधा नहीं है।
इस्लाम में सुरक्षा की दृष्टि से पर्दा अहम: जहां तक कुरान की बात है, इसमें पर्दे को लेकर कोई स्पष्ट निर्देश नहीं है। मगर कुरान की सूरह अहजाब में कहा गया है कि अपनी बीवियों और अपनी बेटियों और औरतों से कह दो कि वे बाहर निकलते समय अपनी चादरों का घूंघट चेहरों पर लटका लिया करें। यह उनकी पहचान के वास्ते मुनासिब है, तो उन्हें कोई छेड़गा नहीं। वे सुरक्षित रहेंगी।
