उदभानु पांडेय

मैंने आइएएस की परीक्षा खत्म की है और दिल्ली के दमघोंटू माहौल से निजात पाकर पूर्वोत्तर भारत के अपने पहाड़िया कस्बे, जिसे मैं दिल्ली में शान से अपना होम टाउन, हिल स्टेशन या हेल्थ रिजार्ट वगैरह कहा करता हूं, लौट आया हूं। आपको यह जान कर हैरत होगी कि मेरी जिंदगी में वैसे तो कई दोस्त हैं- स्त्री और पुरुष दोनों- लेकिन छुट्टी का सबसे ज्यादा समय एक ‘बूढ़े’ के साथ बिताता हूं। इस बूढ़े शब्द पर आप लोग नाक-भौं मत सिकोड़िए, क्योंकि हमारे इलाके में यह शब्द बहुत ज्यादा सम्मानपूर्ण है। और वह शख्स, जिसे मैं प्यार से फू यानी दादाजी कहता हूं, कोई घुरहू-कतवारू नहीं बल्कि एक रिटायर्ड आइएएस है, जो इसी शहर के एक कुशादाघर में रहता है। इसकी बूढ़ी अपने इकलौते बेटे के साथ अमेरिका में रहती है और जब इस शहर में वापस आती है तब दावतों का सिलसिला शुरू हो जाता है। पर अकसर वह अमेरिका में ही रहती है। मैं जिस कबीलाई समाज से ताल्लुक रखता हूं, वहां लोकगीतों और लोक कथाओं की बड़ी समृद्ध परंपरा है। मैंने अभी से तय कर लिया है कि मैं अपनी सेवा से निवृत्त होने के बाद इन लोकगीतों और लोक कथाओं को इकट्ठा करूंगा और हिंदी तथा अंग्रेजी में उनका अनुवाद करके छपाऊंगा।

आज कई दिनों की आरजू-मिन्नत के बाद मेरे फू यानी दादाजी एक कहानी सुनाने बैठे हैं। उसका नौकर शैंपेन और स्कॉच की दो बोतलें रख गया है। गरमागरम प्याजा-पकौड़ियां आई हैं और दौर शुरू हो गया है। जब बुड्ढा गुलाबी नशे के आगोश में आएगा फिर कम्बख्त फड़कते हुए शेरों की झड़ी लगा देगा। उसके बाद ही मैं कहानी की फरमाइश करूंगा। मेरा पसंदीदा चिखना यानी कि बाराह भगवान का प्रसाद तो आएगा ही, लेकिन वह खाने के साथ भी परोसा जाएगा, क्योंकि हम जनजातीय लोग पोर्क के बिना खाने का लुत्फ नहीं उठा सकते।

बात उन दिनों की है जब मैं एम-एससी के बाद इलाहाबाद में आइएएस की तैयारी कर रहा था।’ दादाजी ने शुरू किया और मैं इलाहाबादी तमीज और तमद्दुन के अनुसार झुक कर ‘इरशाद’ बोला।’ वहां के खुसरोबाग इलाके में एक शानदार बंगला था, बंगला क्या नाती राजा, एक अच्छा-खासा महल ही समझो। हम लोग उधर से निकलते, तो उसके अहाते में चमचमाती हुई कारों की फ्लीट-सी दिखती। स्थानीय लड़के उस हवेली के बारे में अजीबो गरीब लंतरानियां सुनाया करते। लोग कहते कि इस हवेली से ताल्लुक रखनेवालों में दर्जनों सेंट्रल सर्विस के अफसर हैं और आइपीएस और एलाइड सेर्विस तो मामूली चीज है, यहां तो आइसीएस तक हुए हैं। लेकिन उस हवेली में एक खास ट्रैजडी यह हुई कि यहां केवल बेटियों का वंश ही चला। अगर यह कोई वैज्ञानिक दर्शन है तो हुआ करे, मेरी दिलचस्पी इस बात में नहीं कि वहां किसी पर देवताओं का अभिशाप है या यह जींस का खेल है। एक बात और थी कि उस शानदार घर के लिए हमेशा एक से ज्यादा ऐसे डॉक्टर होते थे, जो फिजीशियन होते थे, क्योंकि उस परिवार का लगभग हर सदस्य कब्ज का मरीज हुआ करता था। पड़ोस में खानदानी मुसलिम और राजपूतों की हवेलियां थीं, जहां के लोग मजाकिया तौर पर यह कहा करते थे कि यह खानदानी मर्ज इसलिए है कि लोग पैसे को दांत से पकड़ते हैं।

हालांकि इलाहाबाद लखनऊ और गोरखपुर से कहीं ज्यादा सस्ता है। इस हवेली का सबसे प्रिय खाद्य था आलू का व्यंजन। जब मेहमान खाने बैठते, तो मेजबान लोग आलू के व्यंजनों के कसीदे पढ़ते। बड़ी नफीस उर्दू या किंग्स इंग्लिश में बहुत पुरानी बातें दुहराई जातीं कि अंग्रेज अफसर किस तरह आलूदम और आलू के भुरते पर फिदा हो जाते थे। लेकिन इसका असर यह होता कि खाने वाले परिवार के सदस्य या तो डायबिटीज के शिकार होते या मोटापे के। जो इन दो रोगों से बच जाता, वह कब्जियत का शिकार हो जाता।

‘रम लाना जरा बहादुर’, मेरे फू की घोड़े की सवारी शुरू होने वाली थी। मुझे बतरस का आनंद आने लगा था। नौकर एक ट्रे में रम की बोतल और बारीक कसे हुए प्याज का सलाद लेकर हाजिर हुआ। फू ने रम की बोतल पर एक आशिकाना नजर डाली और बोले, ‘मेरे कई गधे दोस्त सेना के बड़े अफसर हैं और उनका कहना है कि मर्दों को सूट करने वाली सबसे जबर्दस्त शराब केवल रम है और रम में भी यूपी के बाराबंकी की रम तो रानी है। लेकिन रम के साथ चिखना हो, तो केवल पोर्क, कच्चा प्याज और चार मीनार सिगरेट। वाट अ हारिबल टेस्ट! लेकिन क्या किया जाए, पसंद अपनी-अपनी खयाल अपना अपना!’

अब तक मेरे मुंहबोले दादाजी घोड़े पर सवार हो चुके थे। उनका चेहरा शैंपेन और स्कॉच के असर से अच्छा-खासा दिख रहा था। मैं अब उन्हें उकसाने वाला था। मैंने कहा, ‘फू अब आपका चेहरा एक चालीस साल के नौजवान का-सा दिख रहा है। अगर मैं विदेश सेवा में आया, तो आपको अमेरिका ले चलूंगा, लेकिन गुस्ताख मत समझिएगा मुझे। अगर आप पर कोई गोरी मेम डोरा डालने लगे तो आप हमारी फी (दादी) को धोखा मत दीजिएगा। ओनली पास टाइम। समझे न दादाजी?’ इस बात पर वे बड़े सलीके से हंसे और फिर अपने टॉपिक पर लौटे।

‘उस हवेली के बारे में ढेर सारे किस्से हैं, लेकिन लोग कहते हैं कि जो उस समय का वारिस था, उसे ईश्वर ने केवल दो लड़कियों से नवाजा था। घर के नौकर नौकरानी उन्हें बड़ी बिटिया और छोटी बिटिया कह कर बुलाते थे। लोग कहते कि अभिशाप के साथ-साथ इस खानादान को यह वरदान भी मिला था कि वहां कोई सदस्य बदसूरत नहीं था। दोनों रईसजादियां काफी कद्दावर थीं और उनके नाक-नक्श भी बला के थे। उनकी चाल को देखकर उन्हें कोई गजगामिनी तो नहीं कहता था, लेकिन लखनऊ के लड़के यह जुमला अकसर फेंकते, ‘इन हमशीराओं की चाल इत्ती लाजवाब है कि माशाअल्लाह, कदमों के नीचे अगर बताशे बिछा दिए जाएं तो शायद एक बताशा भी नहीं फूटेगा।’

यह बड़े अचरज की बात है कि दोनों या उनमें से किसी एक का भी कोई अफेयर दिखाई नहीं पड़ा। इसकी वजह यह थी को दोनों बहनों के वालिदैन बड़े हिसाबी, किताबी और जोड़-गांठ में माहिर थे। वहां अफेयर भी होता तो बुड्ढे-बुढ़िया भांप लेते।

उस हवेली के बारे में बहुत सारी किंवदंतियां थीं लेकिन सबसे जबर्दस्त किंवदंती यह थी की दोनों बहनें एक-दूसरे के खून की प्यासी थीं। तुम कहोगे कि ऐसा तो होता ही है। लेकिन दानिशमंद लोग यह नहीं समझ पाए कि दोनों बहनें एक-दूसरे को दिलो-जान से चाहती थीं, इसके बावजूद वे दो घंटे भी लड़े बिना नहीं रह सकतीं। किसी एक के मुंह से कोई जुमला निकला, तो दूसरी उसकी जुबान पकड़ लेती थी। जब दोनों तेज तर्रार बहनें सींग बझा लेतीं, तो उन्हें छुड़ाना मुश्किल क्या, कतई नामुमकिन होता। बरखुरदार, तुम्हें यह बात झूठी लग सकती है, लेकिन यह सौ फीसद सच है कि उनकी हसीन आंखें गुस्से में निहायत बदसूरत दिखतीं। तुम तो अभी छोटे बच्चे हो और शायद यह सोचते होगे कि आर्यमुखाकृति वाली सारी स्त्रियां हुस्नपरी होती हैं, लेकिन शादी के पहले हर कंवारे या विधुर को यह जान लेना चाहिए कि किसी गुस्सैल औरत को कभी भी गले न बांधा जाए, वरना सारी जिंदगी रायगां हो जाएगी। गुस्सा करने पर खाली चपटी नाकें नहीं, एकदम नुकीली नाकें भी निहायत घिनौनी लगती हैं और लोहार की उस धौंकनी की तरह दिखती हैं, जिनमें लोहा गलाया जाता है।
वैसे तो पूरा इलाहाबाद यह बात जानता था कि दोनों बहनें, जिन्हें मैं अपने ठेठ देहाती लहजे में गुलाबो और सिताबो कहता हूं, अपनी जबानी जंगों के लिए मशहूर थीं, लेकिन मैं ऐसी बातों को केवल परसंतापी हिंदुओं की एक कमीनी हरकत समझता था।

दोनों बहनों के प्रथम संग्राम का मैं आंखों देखा वृतांत सुना रहा हूं। प्लीज लेंड मे योर इयर्स। बड़की और छुटकी के वालिदैन जन्नतनशीं हो चुके थे और दोनों दामाद, जिनके साथ भारतीय विदेश सेवा का पुछल्ला जुड़ा था, लंबी छुट्टी लेकर सपरिवार इलाहाबाद वाली हवेली में आए हुए थे। कर्मकांड और भाई भोज के बाद एक शाम मुझे भी डिनर पर बुलाया गया था। फॉरेन सेर्विस तो मेरी किस्मत में नहीं थी, लेकिन मैं उन दिनों इलाहाबाद का डीएम हुआ करता था।

मुझे मेरे गुरुभाइयों ने बताया था कि इस बड़ी संपत्ति का कानूनी बंटवारा होना था। दोनों साढ़ू भाई आपस में घुले-मिले थे और उनमें किसी भी तरह की बदमजगी का कोई सवाल ही नहीं उठता था और गुलाबो, सिताबो में छोटी वाली अब तक निस्संतान थी, इसलिए किसी खास विवाद की आशंका नहीं थी। फिर भी यह बात लगभग हर इलाहाबादी जानता था कि दोनों बहनें बराबर सींग लड़ाया करती थीं। हवेली और उससे जुड़ी जमीन को तो आधा-आधा में आसानी से बांटा जा सकता था, लेकिन बहुत पुराने जमाने से ही उस खानदान की कई दुकानें दारागंज में थीं और उनको लेकर कोई आसान तरीका साफ दिखाई नहीं पड़ता था। मेजबानों ने बड़े सलीके से बताया था कि गुलाबो वे सारी दुकानें छोटी बहन को दे देना चाहती थी। उसका कहना था कि अगर एक ही घर हो तो वह घर हिंदू परंपरा के मुताबिक सबसे छोटे भाई या बहन को दे दिया जाता है। लेकिन सिताबो एक अड़ियल घोड़ी की तरह अड़ गई थी। ‘जीजी, यह असंभव है। लगता है कि हम और अखिल दो से तीन नहीं होने वाले हैं। फिर यह लालच किस लिए? आखिर बाद में तो सब आपके बच्चों का ही है। आप जीजा जी से कहिए कि तीनों दुकानों को तुड़वा कर एक मॉल बनवा लें या कोई अच्छा-सा होटल, क्योंकि ढेर सारे एनआरआइ लोग इलहाबाद आते हैं। दोनों बहनें बड़प्पन की बातें कह रही थीं, लेकिन गुलाबो को लगा कि छोटी ने उसे मात दे दी, और वह भड़क उठी, ‘तू साली गांठगोभी, तुझे बात में नारद मुनि भी नहीं हरा पाएंगे।’ गुलाबो ने ऐसी गुगली फेंकी कि सिताबो भी अपने को रोक न पाई, ‘तू काली ऊंटनी, अपने को बहुत होशियार समझती है!’

इलाहाबाद के इतिहासकार यह कहते हैं कि यूनिवर्सिटी के उन लड़कों ने इन दोनों को ऐसे बेहतरीन खिताबों से नवाजा था, जिन्हें ये कबूलसूरत रईसजादियां घास भी नहीं डालती थीं। वैसे दोनों की लंबाई अच्छी-खासी थी, लेकिन सिताबो बहन की तुलना में जरा-सी छोटी थी या मांसल होने के कारण उतनी लंबी नहीं दिखती थी। उसे एक से अधिक निराश प्रेमियों ने गांठगोभी कहना उचित समझा था। बड़की का रंग आंखों को सुकून देने वाला सांवला था और वह लगभग पांच फीट पांच इंच लंबी थी, लेकिन उसके निराश प्रशंसकों ने उसे ‘काली ऊंटनी’ कह कर चिढ़ाना शुरू किया था। फिर दोनों बहनें इन विशेषणों से परिचित हो गर्इं और आज एक-दूसरे को इन्हीं से नवाजने लगी थीं।
‘फू, क्या आप ऐसी बदतमीजी को जस्टीफाई करते हैं?’ मेरा भी मूड कुछ बदल रहा था।

‘जस्टीफाई तो नहीं कर सकता, लेकिन इतना तो जरूर कहना चाहूंगा कि किसी लड़के का दिल टूट जाए तो वह नार्मल भाषा कैसे बोलेगा।’ फू ने उत्तर दिया। कहानी आगे बढ़ी और उनकी आंखों में एक अजीब शरारत तारी हो गई। वे बोले : ‘शराब का दौर रंग ला ही रहा था कि जनानखाने से कुछ ऐसी आवाजें बरपा होने लगीं कि लगा अफ्रीका का कोई ज्वालामुखी फटा है। मैं उन मनहूस आवाजों को अनसुना कर अंगूर की बेटी को लबों से लगाए रहा। लेकिन बड़े साढ़ू ने छोटे साढ़ू को एक तरफ बुला कर धीरे से कहा, ‘भाई जान, लगता है दोनों जंगली बिल्लियों ने अपने नाखून बाहर निकाल लिए हैं। आप अंदर जाइए और चुप कराइए। फिर भी अगर वे युद्धविराम की घोषणा नहीं करतीं, तो दोनों के थुलथुल पिछवाड़ों पर लात लगाइए।’

छोटे साढ़ू ने एक खिसियानी हंसी अपने होठों पर चस्पां की और अंदर चले गए। ‘विनीताजी, घर में इतने रेस्पेक्टेबल मेहमान बैठे हैं और आप अपनी बड़ी बहन से ही सींग लड़ाने लगीं! कुछ तो शर्म करिए। इत्ते आलीशान खानदान की औलाद और यह हरकत? और दीदी, आप इस गुस्ताख के मुंह क्यों लगती हैं? वहां भाई साहब के सामने मुझे शर्मिंदा होना पड़ता है। प्लीज!’ इस बात पर गुलाबो को लगा कि उसके बहनोई सचमुच गुस्से में हैं और फिर उसने बड़ी प्यारी अदा के साथ हवा में एक एयर किस उछाल दिया। नौकरानी और नौकर छोटे जमाई को आते देख चुपचाप वहां से खिसक लिए थे। इसके बाद दोनों जंगली बिल्लियां जोर से खिलखिलार्इं और सारा नाटक हीही-ठीठी पर खत्म हो गया। छोटे जमाई बाहर आकर बोले, ‘मेहरोत्रा साहब, एक्चुअली वे दो लड़ाकी औरतों की नकल उतार रही थीं।’

मैंने इस इलाहाबादी तहजीब को अपनी आंखों से देखा और कानों से सुना। मैं इन बड़े खानदानी लोगों की इस अदा का शैदाई भी हुआ और मन में यह भी आया कि कह दूं, ‘दिल बहलाने को गालिब ये खयाल अच्छा है’, लेकिन तमीज और तमद्दुन को ध्यान में रखते हुए मैं बोला, ‘हमारी दोनों भावजों का सेंस आफ ह्यूमर काबिले तारीफ है।’
छोटे साढ़ू को आइएएस में तीसरा स्थान मिला था और वे अपनी सीमाएं और शक्ति दोनों से वाकिफ थे। उनके पिता तहसीलदार थे। वे मितभाषी, मिलनसार और और ठंडे दिमाग वाले ऐसे सुलझे इंसान थे, जिसे झगड़ना क्या ऊंची आवाज में बोलना भी गरिमा के विरुद्ध लगता था। लेकिन उनके सुंदर चेहरे पर आज गुस्सा लिखा हुआ दीख पड़ रहा था। दोनों साढ़ू भाई ऐसी पृष्ठभूमि से निकले थे, जिसे गुलाबो और सिताबो के इलाहाबादी खानदान के सामने गैरमामूली नहीं कहा जा स्कता था। इसके अलावा दोनों यह भी जानते थे कि ऐसी लक्ष्मीरूपा पत्नियों से थोड़ा डर कर रहना सेहत के लिए मुफीद है।

‘बड़ा साढ़ू एक ऐसा इंसान था, जो इलाहाबादी हिंदी और किंग्स इंग्लिश जानने के बावजूद फैजाबादी अवधी और आजमगढ़िया भोजपुरी की कामचलाऊ गालियां निकाल सकता था। यह बात मैं पूरे दावे के साथ तो नहीं कह सकता कि वह सचमुच गुस्सैल था या गुस्सैल होने की नौटंकी कर लेता था, लेकिन इतना तो तय ही था कि काली ऊंटनी उस पर उस तरह हावी नहीं हो पाई थी, जिस तरह गांठगोभी अपने खाविंद पर हावी थी। दोनों साढ़ू भाइयों ने यह तय किया था कि जब उनकी शरीके-हयात शापिंग करने निकलतीं तो वे किसी बहाने उनसे अलग हो जाते। लोगबाग तो यह भी बताते हैं कि दोनों अपनी शराफत के नाते जुड़े थे, नहीं तो किसी गोरी मेम को बाकायदा बीवी बना सकते थे। जब वे अकेले होते और गुलाबी नशे में उनकी विनोद वृत्ति जागती तो दोनों बहनों यानी एक-दूसरे की पत्नी को एलेफैंटाइन ब्यूटी (हस्तिनी सुंदरी) कहते थे। वे दोनों बहनें ऊपर से तो बहुत पागल या कम से कम एक्सेंट्रिक (खब्ती) दिखती थीं, लेकिन चालाकी में वे क्लियोपेट्रा से आगे थीं। वे विदेश में बड़ी विनीत और वेल्ब्रेड (खानदानी) मानी जाती थीं। लेकिन जब वे हिंदुस्तान में होतीं, तो लगता उनके पति जल्दी ही आगरा के पागलखाने की शोभा बढ़ाएंगे।

बड़ा वाला साढ़ू तो कभी-कभी उसे बेडरूम में बंद कर देता था और जब वह फोन पर गिड़गिड़ाती, तभी उसे खोलता था। गुलाबो को इस बात की आशंका बराबर रहती कि उसका शौहर करोड़ों की दौलत और फॉरेन सर्विस की ऐसी-तैसी कर उसे उतार फेंकेगा। इसीलिए वह अपने शौहर को गर्दानती थी। लेकिन सिताबो किसी और मिट्टी की बनी थी। उसके नाक-नक्श ज्यादा तीखे थे और ऊंचाई में गुलाबो से थोड़ा कम होने के बावजूद उसमें कशिश थी। उसे इलाहाबादी लड़के कभी कालिदास की यक्षिणी तो कभी ‘स्त्रोक्नम्रा’ कहते थे। इस कठिन शब्द की व्याख्या करने का दायित्व संस्कृत के रसिक लड़कों ने लिया था। बीती सदी के छठे दशक तक यहां के संस्कृत विद्यार्थी भी नफीस अंग्रेजी लिख और बोल लेते थे। वे कहते- वे स्त्रियां जो स्तनों के भार से थोड़ा झुक जाती हैं अपने प्रेमिकों या पतियों के लिए अत्यंत आनंदप्रदायिनी होती हैं। इन तानों, फिकरों और ईश्यार्लु जीवों के बावजूद विनीता ने एक आइएफएस पति हथिया लिया और जिंदगी अपनी पूरी रफ्तार में भागती रही।

अब नौजवान, तुम्हें यह जानने की जिज्ञासा भी होगी कि गुलाबो और सिताबो सगी बहनें होने के बावजूद आपस में इतना क्यों लड़ती थीं। उनमें संपत्ति को लेकर भी कोई कुंठा नहीं थी।
मैं आश्चर्य में था कि मेरे दादा जी अब कौन-सा रहस्य खोलने वाले हैं। वे बोले, ‘भाइयों में जिस तरह का निस्वार्थ प्रेम संभव है, बहनों में वह बात नहीं हो सकती। कभी रूप को लेकर स्पर्धा हो जाती है; कभी अपने अपने पतियों को बेहतर सिद्ध करने के लिए बहनें तलवार खींच लेती हैं। गुलाबो सिताबो से इसलिए जलती थी कि उसका बहनोई को पत्नीभीरु यानी मेहरबसा था और दूसरी तरफ सिताबो यह सोच कर जलती थी कि उसके जीजा बड़े दबंग हैं और अपनी पत्नी पर हावी रहते हैं, जबकि उसका शौहर दब्बू-सा है। योरप में रहते-रहते गुलाबो गेहुंवन यानी गंदुमी दिखने लगी थी, लेकिन सिताबो का रंग सोने जैसा निखर आया था। एक बार बड़ी ने छोटी को कंचनजंघा कह कर अजमाया भी था। उनमें प्रेम और प्रतिस्पर्धा दोनों समान मात्रा में था। सबसे बड़ा कारण था छुटकी का निस्संतान रह जाना। इसी बिना पर गुलाबो सिताबो जीवन भर लड़ती रहीं।’ फू के घर का खाना तो हमेशा लजीज होता था, लेकिन उनकी बातें भी कम लजीज नहीं थीं।