ज्ञानप्रकाश विवेक
इसमें कोई शक नहीं कि हिंदी गजल का अवतरण उर्दू गजल से हुआ है। जब यह विधा हिंदी में आई तो अपने साथ न सिर्फ गजल का मिजाज, बल्कि भाषा और खास तरह का मुहावरा भी लेकर आई। दुष्यंत कुमार की गजलों में भाषा का कोई संकट नहीं। उन्होंने जमीन अपनी चुनी, लेकिन भाषा का संस्कार हिंदुस्तानी रखा। मगर उनके बाद गजल लिखने वाले इस दुविधा में हैं कि हिंदी गजल की भाषा कैसी हो? इसलिए हिंदी गजल में हिंदी तो दिखाई देती है, गजल नजर नहीं आती। हकीकत यह है कि गजल लिखते वक्त हम भाषा नहीं लिख रहे होते। भाषा में लिख रहे होते हैं। बेहद मौजूं, बेहद सटीक शब्द किसी भी भाषा का हो, शेर में कई बार मुहावरे जैसी अनुभूति पैदा करता है। पर यह प्रश्न हमेशा तंग करता रहेगा कि गजल को हिंदी गजल कैसे बनाएं?
उर्दू रस्मुलखत में लिखी जाने वाली गजलों को पहले उर्दू गजल कहा जाता था, अब सिर्फ गजल कहा जाने लगा है। (शायद इसलिए कि गजल होती ही उर्दू में है) वहां न संशय है, न संकट! वहां न पहचान का संकट है, न संस्कार का। उर्दू में साफ-साफ कहा गया है कि गजल सिर्फ सिन्फ नहीं, महजीब भी है। यकीनन! उर्दू गजल में कालखंड और उनकी तहजीब को महसूस किया जा सकता है। गालिब जब कहते हैं कि ‘गालिबे-खस्ता के बगैर कौन-से काम बंद हैं’ तो गुलाम मुल्क के समाज की निराशा और अवसाद की ध्वनियां भी गूंजती प्रतीत होती हैं।
गजल को हिंदी गजल कैसे बनाएं से ज्यादा बड़ा प्रश्न है कि हिंदी गजल को कैसे बचाएं? प्रश्न यह भी है कि आखिर हिंदी गजल है क्या? हिंदी गजल, यानी देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली गजलें। मगर वही हिंदी गजलें जब गोष्ठियों में या किसी मंच पर सुनाई जाती हैं तो वे सिर्फ गजलें होती हैं। सुनाई जाने वाली गजलों का लिपि भेद समाप्त हो जाता है। जरा गौर से देखें तो हिंदी और उर्दू गजल की जबान- हिंदुस्तानी जबान बन चुकी है। फर्क सिर्फ अंदाजे-बयां और मिजाज का है।
गजल का अपना एक परिसर होता है। वह परिसर शेर का भी होता है। काफिया, रदीफ, बहर की सीमा में रह कर एक विचार (या कथ्य) जो सीमा में रहता है और शेर हो जाने तक रचनात्मक, भावात्मक यात्रा तय करता है। शेर की सीमा, उसका कड़ा अनुशासन होता है और यही एक शेर का सौंदर्य भी होता है। गजलकारों को गजल का अनुशासन ही आमंत्रित करता है। गजल का हर शेर किसी चुनौती की तरह होता है। क्या यह चुनौती नहीं कि बड़े से बड़े कथ्य को दो पंक्तियों में इस शऊर और संवेदना से कहा जाए कि वह लय, नाद, गूंज और ध्वनि की ताकत बन जाए।
गजल का शेर कहते हुए गजलकार संवाद (और प्रश्नाकुलता) की अवस्था में रहते हैं। कथ्य की भूमिका यों ही नहीं समाप्त हो जाती। गजलकार जिस कथ्य (या विषय) को चुनता है, वह निरंतर चेतना से टकराता है तब तक, जब तक कि वह शेर की शक्ल न अख्तियार कर ले। तब दो समांतर सत्ताएं होती हैं- गजलकार की और शेर की। दोनों में संवाद और प्रतिवाद चलता रहता है- क्योंकि शेर गजलकार के अवचेतन में ज्यादा खलबली मचाता है। और अवचेतन, हर शेर को कसौटी पर कसता है। इस तरह शेर एक बार नहीं, बार-बार लिखा जाता है और अलग तरकीबों से लिखा जाता है। यानी, गजलकार का यह ‘प्रोसेस’ बेहद जटिल होता है। लेकिन जब शेर सशक्त रूप से लिखा जाता है तो वह सृजन का सुख भी होता है। बिलकुल यहीं, गजलकार अपने शेर के जरिए अपने अंतरमन से संवाद करता है। जब शेर मुकम्मल हो जाता है तो गजलकार, समाज से संवाद करता है। गजल का प्रत्येक शेर, बेशक वह कितना ही व्यक्तिगत क्यों न हो, समाज से संवाद की भूमिका खोज लेता है।
विडंबना यह भी है कि (खराब अश्आर को जाने दीजिए) अच्छे से अच्छा शेर भी कभी मुकम्मल शेर प्रतीत नहीं होता। इसलिए (अक्सर) गजलकार (और शायर) अपनी गजलों के अश्आर बार-बार और नए-नए ढंग से लिखते रहते हैं। यह निरंतर प्रोसेस गजल का होना होता है। लिखे जा चुके शेर भी बार-बार होते रहते हैं। और इस प्रक्रिया से उर्दू और हिंदी की गजलों का गुजरना अनिवार्य होता है। इसलिए ठेठ मुहावरे में कहा जाता है कि गजल कही है… या कुछ शेर हुए हैं।
गजल ऐसी विधा है, जो सोचने से लेकर शेर के हो जाने तक, चौंकाती रहती है। वह इस लिहाज से भी चौंकाती है कि बहुत बार गजल लिखने वाले शेर का दूसरा मिसरा पहले सोच लेते हैं, लिख भी लेते हैं। और गजल का पहला मिसरा बाद में लिखते हैं। नीचे से ऊपर और ऊपर से नीचे, विचार की यात्रा, वृत के रूप में पूर्ण होती है।
गजल एक ऐसी विधा है, जिसमें विषयगत विविधता और व्यापकता की संभावना हमेशा बनी रहती है। तत्त्वज्ञान, मनोवैज्ञानिक सूक्ष्मताएं, तसव्वुफ (सूफियाना सोच), आध्यात्मिकता और जनवादी रुझान, गजल के विषय हो सकते हैं। इसके अलावा, कल्पनाशीलता और जिंदगी की कटुताएं, तल्ख हकीकत, अवसाद और खुशरंग मंजर भी गजल का कथ्य बन सकते हैं और बनते रहे हैं। गजल में विचार तत्त्व जरूरी हस्तक्षेप पैदा करता है। विचारहीन (कथ्यहीन) गजलें, दो मिसरों का बोझ ढोती प्रतीत होती हैं।
गजल एक ऐसी विधा है जिसमें कथ्य का ठोसपन और शब्दों की लय और लोच एक साथ मौजूद रहती है। यह विरोधाभास गजल की शक्ति है। चूंकि गजल के एक ही शेर में पूरी बात (विचार) कहनी होती है, इसलिए, प्रतीकों, बिंबों, और रूपकों का सहारा लिया जाता है। गजल, नज्म से इसलिए भिन्न है कि नज्म में विवरण और विश्लेषण की क्रिया अपना कार्य करती है, जबकि गजल अलंकार, प्रतीक, बिंब और कल्पनाशीलता जैसे साधनों का प्रयोग किया जाता है।
फिराक गोरखपुरी गजल को असंबद्ध कविता मानते हुए अपनी पुस्तक ‘गुफ्तगू’ में लिखते हैं, ‘अर्थ की दृष्टि से असंबद्ध शेर भी, एक ही काफिए, रदीफ में बंधे होने और एक ही बहर में होने के कारण, एक ध्वन्यात्मक वातावरण की सृष्टि करते हैं।’ संभव है, गजल के ज्ञाता और विद्वान इस बात से सहमत न हों कि गजल का प्रत्येक शेर ‘ध्यान’ की अवस्था तक ले जाता है। जितना गहरा ध्यान, उतना सशक्त शेर! क्योंकि शेर इंटेंसिटी की मांग करता है और ध्यान (यानी एकाग्रता) वही इंटेंसिटी उपलब्ध करता है। गौरतलब है कि उर्दू के बहुचर्चित और जदीद शायरी के पुरोधा- नासिर काज़मी, पाकिस्तान के ऐसे शायर थे, जिनकी रचनावली (तमाम गजलें) का नाम ही ‘ध्यान यात्रा’ था।
हम अपने जटिल समय की बात कर रहे थे। जटिल समय इस समय से पूर्व भी था। या यों कहें कि हर दौर की अपनी जटिलता होती है। शायर उसे अपने तौर-तरीकों से व्यक्त करते हैं। इसे दो उदाहरणों से समझा जा सकता है। फ़ैज़ की एक गजल का मिसरा है- ‘चले भी आओ के गुलशन का कारोबार चले।’ बहुत बाद में दुष्यंत ने एक शेर कुछ यों कहा- ‘तू किसी रेल सी गुजरती है/ मैं किसी पुल सा थरथराता हूं।’ दोनों में बेचैनी है। समय इतना जटिल और प्रेम-विरोधी है कि प्रेमिका की आमद खुशवार नहीं, वह भय जैसी है। रेल गुजरे तो डर जिसे लगता है, वह पुल होता है- कंपकपाता हुआ। दुष्यंत के शेर में प्रेम तो है। लेकिन प्रेम करने वाले दो पक्ष हो चुके हैं- रेल और पुल!
अगर फ़ैज़ का शेर बहुत बड़ा (और अमर) शेर है, तो दुष्यंत का भी यह शेर, समय के तनाव और समय की विडंबना को व्यक्त करता बड़ा शेर है। लेकिन अश्आर के लबोलहजे में जो फर्क है- वही फर्क हमारे और फ़ैज़ के समय का है। वही फर्क हिंदी और उर्दू गजल का भी है।

