विजन कुमार पांडेय

भारत निरक्षरता की बुनियादी समस्या से अभी भी जूझ रहा है। साक्षरता के मामले में शहर-गांव और स्त्री-पुरुष के बीच खाई बनी हुई है। ताजा आंकड़े साक्षरता दर में बढ़ोतरी तो दिखाते हैं लेकिन गांवों और शहरों, स्त्रियों और पुरुषों की साक्षरता की दरों में बड़ा फासला है। रोजगार की तलाश और शहरी चकाचौंध से आकर्षित होकर गांव-देहात से लोग लगातार शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं लेकिन गांव पिछड़े के पिछड़े हैं। शहरी इलाकों में भले ही शिक्षा के विस्तार में निजी क्षेत्र का योगदान ज्यादा है लेकिन गांवों में अब भी शिक्षा सरकारी क्षेत्र पर निर्भर है। डिजिटल इंडिया और डिजिटल गांव का नारा देने वाले मौजूदा नेतृत्व का यह दावा भीतर से कितना खोखला है, यह भी इसी बात से समझा जा सकता है कि ग्रामीण इलाकों में सिर्फ छह प्रतिशत लोगों के पास ही कंप्यूटर है। स्कूली इमारतों, कॉलेजों, शिक्षकों और अन्य शैक्षिक संसाधनों का अभाव भी किसी से छिपा नहीं है। हमारा देश आखिर कब तक अपनी एकतरफा रौनकों पर इतराता रहेगा?

यहां उपाय तो खूब गिना दिए जाते हैं लेकिन उस पर अमल नहीं होता। इसलिए साक्षरता की गाड़ी की रफ्तार इतनी धीमी है। शिक्षा का बाजारीकरण आज देश के समक्ष बड़ी चुनौती हैं। यह संकट देश में चालीस-पचास वर्षों में उभरकर आया है। लेकिन, वास्तव में उसकी नींव अंग्रेज मैकॉले द्वारा स्थापित शिक्षा में है। इसके पूर्व भारत में शिक्षा कभी व्यवसाय या धंधा नहीं थी। कुछ लोग ऐसा भी तर्क देते हैं कि शिक्षा का विस्तार करना है तो यह मात्र सरकार के द्वारा संभव नहीं है, निजीकरण आवश्यक है और जो व्यक्ति शिक्षा संस्थान में पैसा लगाएगा वह बिना मुनाफा क्यों विद्यालय महाविद्यालय खोलेगा? कुछ लोगों में ऐसा भी भ्रम है कि भारत में अंग्रेजों के आने के बाद शिक्षा का विस्तार और विकास हुआ। ईसा से 700 वर्ष पूर्व तक्षशिला विश्वविद्यालय जो इस समय पाकिस्तान में है, उच्च शिक्षा का महान केंद्र था। इसके अलावा, काशी, नालंदा, विक्रमशिला आदि विश्वविद्यालय थे, जिसमें विश्व भर से लोग ज्ञान प्राप्त करने आते थे। इसी प्रकार लगभग अंग्रेजों के भारत में आने के बाद 1820 में 33 प्रतिशत साक्षरता भारत में थी, जो विश्व में सबसे अधिक थी। अंग्रेजों के शासन में ये सारी व्यवस्थाएं धीरे-धीरे समाप्त कर दी गर्इं। इस कारण से देश की आर्थिक स्थिति भी बहुत खराब हो गई।

कुछ वर्षों के बाद संस्कृत के पाठशालाओं का अनुदान बंद कर दिया गया और अंग्रेजी विद्यालयों को अधिक से अधिक अनुदान दिया जाने लगा। छात्रों से शुल्क लेना, शिक्षकों का वेतन और विद्यालय चलाने के लिए अनुदान सरकार के द्वारा दिया जाने लगा। एक तरह से शिक्षा का सरकारीकरण शुरू हो गया। इसके नतीजतन, 1820 में 33 प्रतिशत साक्षरता से घटकर 1921 में 7.2 प्रतिशत रह गई। इसके लिए उस समय स्वतंत्रता के आंदोलन के साथ-साथ राष्ट्रीय शिक्षा का भी आंदोलन चला। स्वामी विवेकानंद, दयानंद सरस्वती, महर्षि अरविद, महात्मा गांधी, महामना मालवीय आदि का इसमें महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। 1947 में साक्षरता दर बढ़कर 17 प्रतिशत हो गई। स्वतंत्रता के पूर्व में इस प्रकार के प्रयासों में समर्पित भाव से आर्यसमाज, सनातन धर्म सभा, भारतीय विद्या भवन आदि संस्थाओं के द्वारा बड़ी संख्या में शैक्षिक संस्थाएं शुरू हुर्इं। जिसका लक्ष्य पैसा प्राप्त करना नहीं था। आज भी इस भाव से कुछ शैक्षिक संस्थाएं कार्यरत है जिनका लक्ष्य पैसा कमाने का नहीं है।

शिक्षा का स्तर क्यों गिरा, इसके कई कारण रहे हैं। आजादी के बाद से समग्र शिक्षा व्यवस्था का सरकारीकरण हुआ। शैक्षिक संस्थाए या तो सीधे तौर पर सरकार चलाती थी या सरकार के अनुदान से संस्थाएं चलती थीं। विद्यार्थियों का निश्चित शुल्क शिक्षकों का निश्चित वेतन और संस्था चलाने के लिए अनुदान जैसी व्यवस्थाएं बनी। कुछ समय के बाद सरकारी शैक्षिक संस्थाओं के स्तर में लगातार गिरावट आती गई। इस कारण से निजी विद्यालयों का आकर्षण बढ़ा। शुरू में अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों में वस्तुओं के रूप में दान लेना शुरू हुआ। आगे जाकर छात्र से बड़ी मात्रा में दान लेना, शिक्षकों की निुयक्ति में पैसा लेना और कम वेतन देना शुरू हुआ। विद्यालयों में शिक्षा के स्तर गिरने से फिर ट्यूशन प्रथा प्रारंभ हुई। इस तरह धीरे-धीरे शिक्षा का स्वरूप धंधे जैसा बनने लगा।

1960 के दशक में दक्षिण भारत में व्यवसायी उच्च शिक्षा के संस्थान बिना सरकारी अनुदान से खुले, जिसमें छात्रों के पास बड़ी मात्रा में शुल्क लिया जाने लगा। जिसको उस समय केपीटेशन फी कहा गया। यह एक प्रकार से अमीरों के बालकों के लिए शैक्षिक संस्थान थे। इसके विरुद्ध उन्नीकृष्णन नाम के एक व्यक्ति ने न्यायालय में याचिका दायर की थी। इस पर अदालत ने कहा कि पचास प्रतिशत सीटों अधिक शुल्क और बाकी पर पचास प्रतिशत मेरिट के आधार पर सामान्य शुल्क से प्रवेश की व्यवस्था दी। लेकिन 1990 के बाद दुनिया में वैश्वीकरण की हवा चली जिसको लिबरेलाइजेशन, प्राइवेटाइजेशन, ग्लोबलाइजेशन (एलपीजी) भी कहा गया, जिसका शिक्षा पर भी प्रभाव हुआ। सरकारें उच्च शिक्षा से अपना हाथ खींचने लगीं। व्यावसायिक महाविद्यालय सरकारों ने खोलने बंद कर दिए। नतीजतन, स्ववित्तपोषित शैक्षिक संस्थान खुलने लगे। इन पर सरकार का किसी भी प्रकार का नियंत्रण नहीं रहा।

अकेले छत्त्तीसगढ़ के रायपुर में कुछ ही दिनों में 120 निजी विश्विद्यालय खुल गए। डीम्ड विश्विद्यालय की संकल्पना बदल दी गई। पहले किसी विषय में विशेषता प्राप्त संस्थान को डीम्ड का दर्जा दिया जाता था, लेकिन बाद में किसी भी निजी शैक्षिक संस्थान को डीम्ड का दर्जा दिया जाने लगा। यह सब कार्य शासन-प्रशासन और शिक्षा माफियाओं की मिलीभगत से होने लगा। जिसका आज इस प्रकार बिगड़ा रूप सामने आ गया है कि शिक्षा की मंडी ही बन गई है।

अब तो हालात इतनी खराब हो चुकी है कि शुल्क न भर सकने के कारण छात्र आत्महत्याएं तक कर रहे है। अभिभावक महंगाई के कारण बच्चों की फीस समय से जमा नहीं कर पाते। वे इसके लिए गलत कार्य करने को मजबूर हैं। एक प्रकार से व्यावसायिक उच्च-शिक्षा उच्च वर्ग को छोड़कर अन्य किसी भी वर्ग के बस की बात नही रह गई है। इस प्रकार लगभग बीस प्रतिशत वर्ग को छोड़कर अस्सी प्रतिशत वर्ग के बच्चों की शिक्षा का कोई पुर्साहाल नहीं है। वर्तमान में शिक्षा का मात्र बजारीकरण ही नहीं हुआ है बल्कि यह एक तरह से अतिभ्रष्ट व्यापार हो गया है। इस प्रकार की शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्रों में भी केवल पैसा कमाना ही लक्ष्य रहेगा। यही छात्र जब देश के विभिन्न क्षेत्रों का नेतृत्व करेंगे तब देश का चरित्र कैसा बनेगा? यह बड़ा प्रश्न है। यही कारण है कि देश में भ्रष्टाचार, अनाचार, चरित्र-हीनता बढ़ रही है।