रामप्रसाद बिस्मिल क्रांतिकारी थे। उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ जम कर संघर्ष किया। रामप्रसाद बिस्मिल की गिनती शायर, इतिहासकार और साहित्यकार के तौर पर भी होती है। उन्होंने हिंदी और उर्दू में राम, अज्ञात और बिस्मिल के नाम से काफी कुछ लिखा था। हालांकि ‘बिस्मिल’ के नाम से उन्हें काफी प्रसिद्ध मिली।
शिक्षा और ब्रह्मचर्य
रामप्रसाद बिस्मिल का जन्म उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में हुआ था। बचपन में वे बहुत नटखट थे। पढ़ाई में उनका मन कम ही लगता था, जिसके चलते उन्हें पिताजी की मार भी खानी पड़ती थी। रामप्रसाद की शुरुआती शिक्षा घर पर ही हुई। उन्होंने घर पर अपने पिता से हिंदी सीखी, बाद में उन्हें उर्दू स्कूल में भर्ती करा दिया गया। यहीं से उन्हें उपन्यास और गजलों की पुस्तकें पढ़ने का शौक जगा। उर्दू मिडिल की परीक्षा में उत्तीर्ण न हो पाने के कारण उन्होंने अंग्रेजी पढ़ना शुरू किया। कुछ समय बाद रामप्रसाद अपने पड़ोस में रहने वाले एक पुजारी के संपर्क में आए। उनके व्यक्तित्व का उन पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा और वे ब्रह्मचर्य का पालन करने लगे।
आर्य समाज और देशप्रेम की भावना
रामप्रसाद अठारह वर्ष के रहे होंगे, जब उन्हें अपने भाई परमानंद की मृत्युदंड का समाचार मिला। उन दिनों वे रोजाना आर्य समाज मंदिर जाया करते थे। वहीं उनकी जान-पहचान स्वामी सोमदेव से हुई, जो परमानंद के मित्र थे। स्वामी सोमदेव के संपर्क में आने के बाद रामप्रसाद को स्वामी दयानंद सरस्वती की पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश पढ़ने को मिली। सत्यार्थ प्रकाश का उनके जीवन पर आश्चर्यजनक प्रभाव पड़ा। उसके बाद ही उनमें देशप्रेम की भावना जागृत हुई। रामप्रसाद बिस्मिल क्रांतिकारी संगठन हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के संस्थापक सदस्यों में थे।
किताबों के बदले हथियार
रामप्रसाद कविताएं और शायरी लिखने के काफी शौकीन थे। उन्नीस वर्ष की आयु में बिस्मिल ने क्रांति के रास्ते पर अपना पहला कदम रखा। क्रांतिकारी जीवन में उन्होंने कई पुस्तकें लिखीं और उन्हें खुद ही प्रकाशित किया। उन पुस्तकों को बेच कर जो पैसा उन्हें मिलता, उसका इस्तेमाल वे क्रांति के लिए हथियार खरीदने में किया करते थे।
मैनपुरी षड्यंत्र और काकोरी कांड
बिस्मिल मातृवेदी संस्था से भी जुड़े थे। 28 जनवरी, 1918 को उन्होंने देशवासी के नाम संध्या नामक एक पुस्तिका प्रकाशित की, जिसे उन्होंने अपनी कविता मैनपुरी की प्रतिज्ञा के साथ वितरित किया। यह तीन मौकों पर लूट से पार्टी के लिए धन इकट्ठा करने के लिए किया गया था। इस घटना के बाद पुलिस उन्हें ढूंढ़ने लगी, लेकिन हर बार बिस्मिल पुलिस को चकमा दे जाते। एक बार जब वे आगरा और दिल्ली के बीच लूटपाट की योजना बना रहे थे, तो पुलिस ने घेराबंदी करके गोलीबारी शुरू कर दी। फिर रामप्रसाद ने यमुना में छलांग लगा दी और पानी के नीचे-नीचे तैरते हुए पार हो गए। इस घटना को मैनपुरी षड्यंत्र के नाम से जाना जाता है। मैनपुरी षड्यंत्र का फैसला आने के बाद से बिस्मिल दो साल तक भूमिगत रहे। फिर 9 अगस्त, 1925 को लखनऊ के काकोरी नामक स्थान पर देशभक्तों ने रेलगाड़ी से ले जाए जा रहे खजाने को लूट लिया। इस घटना को अंजाम देने वालों में अशफाकउल्ला, चंद्रशेखर आजाद, राजेंद्र लाहिड़ी, सचींद्र सान्याल और रामप्रसाद बिस्मिल शामिल थे। इस घटना के बाद बिस्मिल को गिरफ्तार कर लिया गया, फिर उन पर मुकदमा चला और 19 दिसंबर, 1927 को गोरखपुर की जेल में उन्हें फांसी दे दी गई।
