आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक उपलब्धियों के शोर में प्राचीन और पारंपरिक ज्ञान-पद्धतियों को लगभग भुला दिया गया है। उनमें से कुछेक की याद तब आती है, जब कोई बड़ा वैज्ञानिक तथ्य किसी लोक-परंपरा से जा जुड़ता है। हमारे देश में अब भी अनेक स्थानों पर प्राचीन ज्ञान परंपराएं विद्यमान हैं, जिन्हें लोक ने सहेज रखा है। कुछ विदेशी विश्वविद्यालयों का ध्यान इन ज्ञान परंपराओं की तरफ गया है और वहां इन पर शोध हो रहे हैं। भारत की प्राचीन ज्ञान पद्धतियां अभी समाप्त नहीं हुई हैं, जरूरत है तो उन्हें आधुनिक ज्ञान पद्धतियों के साथ जोड़ कर देखने और नए सिरे से समझने की। बता रहे हैं मणींद्र नाथ ठाकुर।
अक्सर लोग कहते हैं कि भारत की ज्ञान-परंपराएं बहुत पुरानी हैं। हजारों सालों में यहां ज्ञान की महत्त्वपूर्ण शाखाओं का विकास हुआ है। पिछले कुछ दशकों से दुनिया के महत्त्वपूर्ण विश्वविद्यालयों में भारतीय ज्ञान-परंपराओं का अध्ययन-अध्यापन भी प्रारंभ हो गया है। दर्शन और स्वास्थ्य के क्षेत्र में तो इसका प्रभाव सर्वविदित है। लेकिन इन परंपराओं के अध्ययन और अध्यापन का एक आयाम अछूता रह गया है। जो लोग इन परंपराओं पर कई पुस्तकें लिख चुके हैं उन्हें भी यह मालूम नहीं है कि इनका उद्गम और विकास किन क्षेत्रों में हुआ था या इनका लौकिक स्वरूप क्या था।
अमेरिका के एक विश्वविद्यालय के कुछ छात्रों को योग दर्शन के बारे में व्याख्यान देते समय जान कर आश्चर्य हुआ कि उनमें से एक छात्र की मां योग शिक्षिका थीं, लेकिन उन्हें इस बारे में आभास भी नहीं था कि योग का कोई दर्शन भी है, जिसका विकास भारत में हुआ है। ऐसे ही न्याय दर्शन पर पुस्तक लिखने वाले कोलंबिया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जोनार्डन गनेरी को यह भी नहीं मालूम था कि बिहार के मिथिला में इसका उद्गम स्थल था और आज भी यह परंपरा वहां जीवित है। वर्षों पहले जब भारतीय दर्शन परिषद से इस विषय में शोध करने के लिए सहायता मांगी, तो जवाब मिला कि यह तो समाजशास्त्र के अध्ययन का विषय है। काश, उन्हें इस बात की समझ होती कि भारतीय ज्ञान-परंपरा जितनी शास्त्रीय है उतनी ही लौकिक भी। और शायद लौकिक स्वरूप ज्यादा समय तक समाज को प्रभावित करता रहा है। कालांतर में पहले दिल्ली विश्वविद्यालय और बाद में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय को शोध के लिए मिली आर्थिक सहायता के माध्यम से इस ओर कुछ काम आगे बढ़ा। पहले चरण में तो हाइडेलबर्ग विश्वविद्यालय के दिल्ली स्थित केंद्र के साथ मिथिला का अध्ययन प्रारंभ किया और बाद में जेएनयू के अलग-अलग विषयों के प्राध्यापकों के साथ काम करने का मौका मिला।
भारत में कई ऐसे गांव हैं, जहां हजारों वर्षों तक ज्ञान-परंपराएं फलती-फूलती रही हैं। आज तो उनमें से कुछ को ज्ञान परंपरा होने की मान्यता तक प्राप्त नहीं है। लेकिन अगर आप उस समाज के अवचेतन में गहरे उतरने की क्षमता रखते हैं, तो यह समझने में देर नहीं लगेगी कि ज्ञान परंपराएं मरती नहीं हैं। कालक्रम में उन पर धूल की परतें जरूर जम जाती हैं और उनका स्थानांतरण चेतन से अवचेतन में हो जाता है। आज भी वहां के लोग उन ज्ञान-परंपराओं से जुड़े होते हैं। उनके दैनिक जीवन, पर्व-त्योहार और शादी-ब्याह के विधि-विधानों, रीति-रिवाजों में उन ज्ञान-परंपराओं की उपस्थिति मिल जाएगी।
कोलंबिया विश्वविद्यालय में ‘डेथ ऑफ संस्कृत’ नाम से एक बड़ा प्रोजेक्ट चल रहा है। इसकी मूल स्थापना यह है कि संस्कृत ज्ञान-परंपरा के अंत की शुरुआत तो बारहवीं शताब्दी में ही हो गई थी, अब इसका अंत अंतिम सोपान पर है। इस स्थापना से सहमत नहीं हुआ जा सकता, क्योंकि संस्कृत एक ज्ञान-परंपरा की भाषा जरूर थी, और इस भाषा का प्रयोग कम जरूर हो गया है, लेकिन ऐसा कहना कि वह ज्ञान-परंपरा खत्म हो गई है, सही नहीं होगा। इस ज्ञान-परंपरा का एक लौकिक स्वरूप भी है, जिसमें शास्त्रीय परंपरा की निरंतरता को बनाए रखने की क्षमता है और किसी समय में उसे नए स्वरूप में पुन: स्थापित करने की क्षमता भी है। एशियाई समाज के लंबे इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण देखे गए हैं।
सरिसबपाही : न्याय दर्शन का गांव
बिहार के मिथिला में ऐसे कई गांव हैं, जहां न्याय और मीमांसा की परंपराएं अब भी जीवित हैं। इनकी शास्त्रीय परंपराएं तो फलती-फूलती रहीं, लेकिन लौकिक परंपराओं का कोई सटीक अध्ययन नहीं हुआ। न्याय परंपरा को पश्चिमी विद्वान इसे केवल भारतीय तर्कविज्ञान के रूप में देखते हैं। लेकिन लौकिक परंपराओं के अध्ययन से लगता है कि यह पूरी जीवन प्रणाली थी। मिथिला क्षेत्र के कई गांवों में न्याय और मीमांसा के बड़े विद्वान हुए हैं। शायद उनका होना ही इस बात का प्रमाण है कि इन गांवों के अवचेतन में इन परंपराओं का वास होगा। सरिसबपाही गांव में ही हजार वर्षों के आसपास की परंपरा रही है न्याय दर्शन के अध्ययन अध्यापन की। चौदहवीं शदाब्दी के प्रसिद्ध नैयायिक अयाची मिश्र और वीसवीं सदी के सर गंगानाथ झा का गांव है। और आज भी उस परंपरा को लेकर लोग संजीदा हैं।
हाल ही में बिहार के मुख्यमंत्री ने यहां अयाची और उनसे जुड़ी चमनिया देवी की मूर्ति का अनावरण किया। एक कहानी के अनुसार चमनिया देवी ने अयाची के पुत्र के जन्म में प्रसव सहायिका का काम किया था, जिसके बदले उसे उन्होंने अपने पुत्र की पहली कमाई देने का वादा किया था। अल्पायु में उनके पुत्र की विद्वता से खुश होकर राजा ने उसे सवा लाख का हार दिया, जिसे वादे के अनुसार उस महिला को दिया गया। उस महिला ने उसे बेच कर गांव में एक पोखर बनाया, जो आज भी चमनिया डाबर के नाम से प्रसिद्ध है। ऐसी अनेक कहानियां ज्ञान-परंपराओं की वैचारिक पृष्ठभूमि को स्पष्ट करती हैं। इसी तरह की लोककथाएं इस इलाके के अवचेतन को प्रभावित करती हैं, यहां की संस्कृति का निर्माण करती हैं। आप आसानी से इन गावों में न्याय दर्शन की उपस्थित उनके दैनिक जीवन में देख सकते हैं। संभव है कि लोगों को खुद ही पता न चले कि उनके दैनिक व्यवहार का कोई दार्शनिक आधार भी है, लेकिन अगर आप उन्हें जोड़ कर देखेंगे तो आपको उनका व्यवहार भी बेहतर समझ में आएगा और दर्शन की समझ भी बेहतर होगी।
बक्सर का पंचकोसी मेला : पांच ऋषियों का उत्सव
बिहार के बक्सर जिले में पांच ऋषियों की कहानियां प्रसिद्ध हैं। इन ऋषियों ने पांच अलग-अलग विधाओं के ग्रंथों की रचना की थी। बक्सर में विश्वामित्र, अहरौली में गौतम, नदांव में नारद, भभुआर में भृगु, उन्नुवास में उद्दयालक ऋषि का स्थान माना जाता है। कहते हैं कि ताड़का वध के बाद जब राम अत्यंत मानसिक संताप से गुजर रहे थे तो उनसे इन ऋषियों के दर्शन के लिए कहा गया। इन आश्रमों में ऋषि पत्नियों ने जो कुछ भोजन राम को करवाया उसे पवित्र माना जाने लगा। इस उपलक्ष्य को इस इलाके के लोग उत्सव के रूप में मनाते हैं और हर साल यहां मेला लगता है। ये पांचों गांव लगभग एक कोस की दूरी पर हैं, इसलिए इस मेले को पंचकोसी मेला कहा जाता है। इसकी दो विशेषताएं हैं। एक तो यह महिला प्रधान मेला होता है, जिसमें महिलाएं खाद्य सामग्री खुद लेकर जाती हैं और ऋषि पत्नियों ने जो खाना राम को खिलाया था उसे पकाती हैं और प्रसाद के रूप में बांट कर खाती हैं। अहिरौली में पुआ, नदांव में सत्तू मुली, भभुअर में चूड़ा दही, उन्नुवास में खिचड़ी और बक्सर के चरित्र वन में लिट्टी-चोखा बनाया जाता है। मेरे खयाल से यह मेला किसी समय इन ज्ञान-परंपराओं को आम लोगों से जोड़ने का उत्सव रहा होगा। यह शोध का विषय है कि अब उस ज्ञान-परंपरा का कितना लौकिक आधार बचा है।
खगौल और तारेगना : खगोलशास्त्र का गांव
ज्ञान-परंपरा से जुड़ी एक ऐसी ही जगह है पटना के पास खगौल, जो अब शहर हो गया है और उसके नजदीक का ही एक गांव तारेगना। इस जगह का यह नाम पांचवीं शताब्दी में कुसुमपुर से बदल कर खगौल उस समय हो गया जब आर्यभट्ट ने इसे अपना कार्यक्षेत्र बनाया। जिस गांव में रह कर आर्यभट्ट ने आकाश में ग्रह-नक्षत्र और तारों की स्थिति का अध्ययन किया था, उसका नाम तारेगना पड़ गया। एकाएक जुलाई, 2009 में तारेगना के बारे में दुनिया को तब पता चला, जब नासा ने घोषणा की कि इस जगह से उस बार का पूर्ण सूर्य ग्रहण को देखना संभव हो पाएगा। खास बात है कि आज भी खगौल में आर्यभट्ट का जन्मदिन मनाने की परंपरा है और उनसे जुड़ी अनेक कहानियां हैं। हालांकि कालांतर में उनमें से ज्यादातर का लोप हो गया है, फिर भी आप उसे महसूस कर सकते हैं।
संगमग्राम : गणितज्ञ माधव का गांव
आमतौर पर केरल को हम आयुर्वेद की ज्ञान-परंपरा के लिए जानते हैं। जड़ी-बूटियों का ज्ञान केरल की सामूहिक चेतना में भरा पड़ा है। शायद यह अकेला प्रदेश है, जहां आधुनिक की जगह पारंपरिक चिकित्सा ज्यादा लोकप्रिय भी है। कोच्चि शहर में अंग्रेजी दवाइयों की दुकान खोजना खासी समस्या पैदा कर सकता है। गांव के गांव अपनी खास तरह के आयुर्वेदिक ज्ञान के लिए प्रसिद्ध हैं। पर फिलहाल केरल की गणित परंपरा की बात। माधव की परंपरा को कई विद्वानों ने आगे बढ़ाया। मैनचेस्टर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जॉर्ज वर्गेस जोसेफ ने अपने शोध से यह प्रमाणित किया है कि न्यूटन और लिबनिज के पहले इस ज्ञान परंपरा को कैलकुलस का ज्ञान था। केरल सरकार ने भी गणित की इस परंपरा को ध्यान में रखते हुए एक स्कूल आॅफ मैथमेटिक्स का निर्माण किया है। सच तो यह है कि केरल में अनेक ज्ञान परंपराएं फली-फूली हैं, जिस पर अभी शोध होना बाकी है।
बारहवीं सदी के आसपास गोकर्ण से कन्याकुमारी तक लगभग चौसठ गांव बसाए गए थे। ये सभी अलग-अलग ज्ञान परंपराओं से सजे गांव थे। इनमें से अकेले केरल में ही बत्तीस गांव हैं। यहां की ज्ञान परंपराओं का केंद्र मंदिरों में हुआ करता था। अब भी ऐसे कई मंदिर हैं, जहां इनका अभ्यास होता है। जिन्होंने गणितज्ञ रामानुजन पर बनी फिल्म ‘द मैन हू न्यू इनफिनिटी’ देखी होगी, उन्हें इस बात का अंदाजा मिल सकता है कि ये मंदिर केवल भक्ति और आस्था के केंद्र नहीं थे, बल्कि इनमें ज्ञान-परंपराएं भी संवर्द्धित होती थीं। अगर इन गांवों की कोई शोध-यात्रा हो तो पता चले कि अब उनकी क्या हालत है, उन ज्ञान परंपराओं का लौकिक स्वरूप अब क्या है।
मयांग : तांत्रिक परंपरा का गांव
असम में ब्रह्मपुत्र के किनारे एक गांव है मयांग, जिसे तांत्रिक परंपरा के लिए जाना जाता है। आम भाषा में इसे काला जादू का गांव कहा जाता है। शायद नौवीं शतब्दी में यह गांव दुनिया भर के तांत्रिकों का तीर्थ स्थल रहा होगा। यहां से पुरानी असमी भाषा में लिखी लगभग तीन सौ पांडुलिपियां प्राप्त हुई हैं। शोध के दौरान पता चला कि एक समय में हजारों पांडुलिपियां नदी में बहा दी गर्इं या जला दी गर्इं। असम को प्रागज्योतिषपुर कहा जाता था, जिसका जिक्र अनेक अरबी पुस्तकों में भी मिलता है। महाभारत के पात्र नरकासुर और घटोत्कच का भी यही क्षेत्र बताया जाता है। यह एक ज्ञान-परंपरा का लौकिक स्वरूप है। संभव है कि हमें उसका शास्त्रीय स्वरूप पूरी तरह से प्राप्त न हो रहा हो और आधुनिकता के प्रभाव में हम उसे काला जादू कह दें। प्रसिद्ध कहानी है कि गोरखनाथ के गुरु मत्स्येंद्रनाथ भी इसी गांव में अपनी अस्मिता खो बैठे और विवाह कर यहां रहने लगे थे। गोरखनाथ ने उन्हें उनके नस्ली स्वरूप को याद दिलाने के लिए ‘जाग मच्छेंदर गोरख आया’ गाया था।
शायद यह हिंदू संस्कृति से पहले की किसी संस्कृति की ज्ञान-परंपरा का अवशेष है, जिसमें मनुष्य के मन, शरीर, चेतना, प्रकृति आदि का ज्ञान और मान्यताएं अन्य सभ्यताओं या संस्कृतियों से अलग हैं। एक अनुमान के अनुसार नौवीं शताब्दी के आसपास यह जगह अपने चरम पर रही होगी, जब अरब और अन्य जगहों से लोग यहां इस ज्ञान परंपरा को सीखने आया करते थे। अब उसके अवशेष के रूप में साल में एक बार मयांग का मेला लगता है और वहां के राजा की सवारी निकलती है। अगर आप उनकी बातचीत को ध्यान से सुनेंगे, तो लगेगा कि किसी ज्ञान-परंपरा के अवशेष से निकली बातें हैं। बहुत-सी प्रचलित विधियां हैं, जिससे कई तरह की बीमारियों का इलाज भी होता है। संभव है कि हम उस ज्ञान को उसकी पूर्णता में नहीं समझ सकते हों, इसलिए उसे काला जादू का नाम दे देते हैं। हाल के कुछ वर्षों में कई अमेरिकी शोधकर्ता भी इस क्षेत्र में काम में लगे हैं।
भारत भर में ऐसे सैकड़ों गांव होंगे, जहां ज्ञान परंपराएं रही हैं। हजारों पांडुलिपियां इन गांवों से मिली हैं और हजारों के मिलने की संभावना है। उनके आचार-व्यवहार के विश्लेषण से भी इन ज्ञान-परंपराओं के अध्ययन की प्रक्रिया चलनी चाहिए। इन सबको समझे बिना भारत को समझना संभव नहीं होगा। कुछ परंपराएं तो ऐसी भी हैं, जिसमें लिखने के बदले गायन महत्त्वपूर्ण हैं। ये पूरी तरह से लौकिक हैं।
बंगाल के कुछ ऐसे ही गांव हैं, जहां बाऊल गायकों का जमावड़ा हुआ करता था। रवींद्रनाथ ठाकुर ने अपने आक्सफर्ड व्याख्यान में पहली बार सार्वजनिक तौर पर इस बात की घोषणा की कि उनके दर्शन और साहित्य पर इन गायकों का बहुत बड़ा प्रभाव है। ये दार्शनिक, जो गेय कविताओं के माध्यम से अपने दर्शन को लोगों तक पहुंचते हैं। लालन फकीर इनके आदि गुरु है और इस परंपरा का एक वार्षिक सम्मेलन बंगाल के मालदह में होता है। इनके दर्शन में जीव मात्र के लिए प्रेम का संदेश होता है, इसलिए जाति और धर्म के विभेद की घोर आलोचना होती है।
क्या इन परंपराओं का अध्ययन किए बिना भारत को समझना संभव होगा? क्या भारत की ज्ञान परंपरा को समझने के लिए शास्त्रीय परंपरा का अध्ययन पर्याप्त है? अब समय आ गया है इन सवालों को उठाने का। भारतीय समाज का निर्माण हजारों वर्षों में हुआ है। इसके चेतन और अवचेतन की कई परतें हैं और इन परतों के समझे बिना भारत की समझ बना पाना मुश्किल है। इन ज्ञान-परंपराओं को समझे बिना भारत को विश्व गुरु बनाने का सपना देखना सही नहीं होगा। लेकिन समस्या यह है कि भारतीय संस्कृति को महान बताने वाले जो लोग निर्णय की कुर्सी पर बैठते हैं उन्हें खुद ही इससे कोई मतलब नहीं है, क्योंकि संस्कृति उनके लिए सता का रास्ता है, न कि ज्ञान का।
ज्ञान और संस्कृति के समन्वय को समझ पाना और उससे ज्ञान-परंपराओं को खोज निकालना, पुन: स्थापित करना और आधुनिक समय के लिए उसके महत्त्व को परखना किसी विदेशी विश्वविद्यालय के लिए कहां तक संभव है, यह सोचने की बात है। क्योंकि उनके लिए लौकिल परंपरा को समझ पाना मुश्किल है। एक और समस्या आधुनिक ज्ञान सृजन की प्रक्रिया के साथ है कि इसमें विभागों का इतना विभाजन है कि इन परंपराओं को उनकी पूर्णता में समझ पाना मुश्किल हो जाता है। शायद भारत अपने इस विशाल ज्ञान संपदा को संजोने की कोई योजना जल्दी बना पाएगा, अन्यथा कुछ वर्षों में उनके लौकिक परंपरा पर भी इतनी धूल की परतें होंगी कि उसे हटाना मुश्किल हो जाएगा।

