राजकुमार

सिनेमा के सफर में उसके प्रचार-प्रसार के लिए बनाए जाने वाले पोस्टरों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। शुरू में फिल्मी पोस्टर हाथ से, रंगों और कूंची की मदद से, बनाए जाते थे। इसके लिए नामचीन चित्रकारों की मदद ली जाती थी। वे पोस्टरों के जरिए फिल्मी कहानी के मर्म को उभारने का प्रयास करते थे। फिल्मी पोस्टरों का सफर बहुत दिलचस्प रहा है। अब डिजिटल तकनीक से पोस्टर बनने लगे हैं, हाथ से बनाए जाने वाले पोस्टरों का चलन खत्म हो गया है, पर अनेक फिल्मों के हाथ से बने पोस्टरों की स्मृति आज भी बनी हुई है। फिल्मी पोस्टर के सफर पर नजर डाल रहे हैं राजकुमार

भारत में सिनेमा के विकास के साथ ही इसके प्रचार-प्रसार के लिए सिनेमाई पोस्टरों ने आकार लिया। फिल्मों को लोकप्रिय बनाने, आम जनमानस तक पहुंचाने और व्यावसायिक दृष्टि से सफल बनाने में पोस्टर की बड़ी भूमिका रही है। पर आज सिनेमा के वितरण और प्रसारण के तरीके में चामत्कारिक बदलाव ने हाथ से बनाए जाने वाले उस पोस्टर संस्कृति को खत्म कर दिया, जो सत्तर-अस्सी के दशक और कुछ बाद के वर्षों तक लोगों के आकर्षण का केंद्र रहा। हमारी स्मृतियों में आज भी अनेक कलाकारों की छवियां उन्हीं फिल्मी पोस्टरों की वजह से कैद हैं, जिन्हें हमने और पूर्ववर्ती पीढ़ी ने सड़कों के किनारे दीवारों, नुक्कड़ों, चौराहों या सिनेमाघरों के बाहर बड़े-बड़े पोस्टरों, होर्डिंग्स या कटआउट में लगे देखे हैं। इतिहास के किसी पन्ने में ‘अकबर द ग्रेट’ के आंसुओं का कोई जिक्र नहीं है। पहली बार के आसिफ ने जंग से पूर्व ‘मुगल-ए-आजम’ फिल्म के पोस्टर में आंसुओं से भरे, गमगीन, बेबस, लाचार अकबर के पोस्टर छाप कर इतिहास को देखने और समझने की दृष्टि ही बदल दी।

पोस्टर की शुरुआत

सिनेमा की शुरुआत के साथ ही उसके प्रचार के लिए एक ताकतवर माध्यम के रूप में पोस्टर का जन्म हुआ और फिर उसका क्षैतिजक और उर्ध्वाधरीय विस्तार होता गया। ल्युमिरे बंधुओं ने अपनी फिल्म की शुरुआत के साथ ही इसके प्रचार के लिए स्क्रीनिंग शुरू की थी। हिंदी या जिसे बॉलीवुड की फिल्म कहा जाता है, उसकी शुरुआत का श्रेय दादा साहब फाल्के को जाता है। दादा साहब ने अपनी पहली फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ के प्रचार-प्रसार के लिए हाथ से पोस्टर बनाए। तब कागज पर ब्रश से पेंट किया जाता था। फाल्के ललित कला में दक्ष थे। चित्रकारी के रास्ते ही वे फिल्मों में आए थे। जेजे स्कूल ऑफ आर्ट से प्रशिक्षण लिया था और फोटोग्राफी में भी कुशल थे। यह काम उनके लिए सहज था। फाल्के ने पोस्टर के ऊपर हाथ से निर्देशक, निर्माता, लेखक और कलाकारों के नाम लिखे। यह फिल्मी पोस्टर की शुरुआत थी। पश्चिमी देशों की तरह भारत में ऐसी चीजें संजो कर रखने की परंपरा नहीं रही, इसलिए शुरुआती पोस्टर मूल रूप में उपलब्ध नहीं हैं।

बाबूराव पेंटर ने अपने फिल्मी सफर को पोस्टर के सफर में भी तब्दील किया। हाथों से रंगे पोस्टर का सुहाना सफर उनके हाथों ही आगे बढ़ा। ‘माया बाजार’, जिसे ‘वत्सला हरण’ (1923) के रूप में भी जाना जाता है, के पोस्टर को विधिवत पहला भारतीय पोस्टर के रूप में दर्जा हासिल है। वे प्रतिभाशाली फिल्मकार तो थे ही, फिल्म के प्रचार माध्यम को भी आगे बढ़ाने में कुशल थे। अपनी बहुप्रतिभाशाली कौशल और प्रशिक्षण का भरपूर उपयोग नए माध्यम में किया। बाबूराव पेंटर ने फिल्म से संबंधित विशेष जानकारी, पोस्टर, प्रोग्राम बुकलेट आदि सभी कुछ प्रकाशित किया और फिल्म के प्रचार-प्रसार के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी। यह उनकी अनोखी देन है।

उनकी फिल्मी तकनीक भी दमदार थी। कृत्रिम लाइट के प्रयोग का भी श्रेय उन्हें जाता है। फाल्के की तरह बाबूराव पेंटर भी पेंटिग और कला की दुनिया से आए थे। उन्हें कला की तालीम घर में हासिल हुई थी। दो-तीन पीढ़ियों से चित्रकारी का काम चल रहा था। महत्त्वपूर्ण यह है कि उन्होंने अपने इस हुनर और विरासत का भरपूर इस्तेमाल फिल्म के प्रचार के लिए किया और प्रचार की एक शैली, संरचना, दृष्टि-रंगों के संयोजन से तैयार की, जो धीरे-धीरे दशकों तक फैलती गई। बाबूराव पेंटर और उनके भाई आनंदराव पेंटर ने बकायदा ‘पेंटर’ अपने नाम के साथ ही जोड़ लिया था। नाट्यमंडली से भी जुड़े थे। उसके लिए भी बैकग्राउंड पेंटिंग्स का काम करते थे।

वे अपने इस पहले प्रेम से ताउम्र जुड़े रहे और ऑयल पेंटिंग करते रहे। ‘विश्वमोहिनी’, ‘रंगपंचमी’, ‘लक्ष्मी’, ‘रूपगर्विता’ आदि प्रसिद्ध चित्रकृतियां उनकी कला की दुनिया में शामिल हैं। जब उन्होंने महाराष्ट्र फिल्म कंपनी बनाई और फिल्म बनाना शुरू किया, तो उसे पोस्टर के रूप में भी सामने लाए। नाट्यकला, चित्रकारी और फिल्म का अद्भुत संयोग उनके व्यक्तित्व में शामिल था। दामले, फतेलाल, वी. शांताराम, धायबर आदि उनके शिष्यों में थे, जिन्होंने बाद में प्रसिद्ध प्रभात फिल्म कंपनी बनाई और जिसने भारतीय फिल्म को उस दौर में अकल्पनीय ऊंचाई दी।

बदलते फिल्मी दौर के गवाह

फिल्मी पोस्टरों का अध्ययन किया जाए तो आधुनिक भारतीय कला के विस्तार और लोकप्रियता के कई मायने खुलेंगे। समांतर रूप से चल रही लोकप्रिय परंपरा और संस्कृति की भी एक झलक दिखेगी। भारतीय फिल्में परंपरा के साथ कदमताल करते हुए आधुनिक हुई हैं। अपनी जातीय स्मृतियों, क्षेत्रीय-सामाजिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक विविधताओं और भिन्नताओं को समेटे हुए। जाहिर है, पोस्टर में भी इसकी झलक दिखती है। चित्रों के हवाले से दशक-दर-दशक बदल रहे हिंदुस्तान और उसकी फिल्मी सफर की कहानी पकड़ में आती है। हमारी राजनीति, समाज और संस्कृति में आ रहे बदलाव, उठान और विस्तार को इन पोस्टरों के माध्यम से पकड़ा जा सकता है। सूचनाओं की संस्कृति से आगे कला की भीतरी विशेषताओं, जटिलताओं और सांस्कृतिक परिवर्तन को भी पोस्टर व्याख्यायित करते हैं।

वक्त के कटवट के साथ पोस्टर संस्कृति ‘इंवॉल्व’ होती गई। यह संस्कृति सड़कों, व्यस्त चौराहों, ट्रेन के डिब्बों, बस के पिछले हिस्से, टेंपो, साइकिल के पहियों के कवर से होते हुए विकसित हुई। शुरुआती पोस्टर में कल्याण खजिना (मराठी फिल्म) ही संरक्षित है। नेशनल फिल्म आर्काइव्स ऑव इंडिया (एनएफएआई) ने पुराने पोस्टरों को संरक्षित करने की दिशा में पहल की है। हाथ से बने ज्यादातर पोस्टर या तो उनके हाथ लगे, जो इसके चाहने वाले थे या जिन्हें इसके बाजार भाव का अंदाजा था। आज पुराने पोस्टर लाखों में बिक रहे हैं। जिन्होंने इसका संग्रह किया वे इसके व्यापारी बन गए हैं। कहा जाता है कि ‘मुगल-ए-आजम’ के हाथ से बने पोस्टर शाहरुख खान ने छह करोड़ रुपए से अधिक कीमत में खरीदी थी। एनएफआई ने हाल ही में भारतीय फिल्मों के ढाई हजार से अधिक पोस्टर के हासिल किया है, जिसमें ‘मुगल-ए-आजम’ का हाथ से बना जादुई पोस्टर भी शामिल है। अकबर और सलीम युद्ध के मैदान में जाने के पहले मिलते हैं। अकबर की आंखों में आंसू हैं, चेहरे पर युद्ध की छाया।

बाबूराव पेंटर ने अपने पोस्टर में अभिनेता के चेहरे का फैलाव और उभार उसके स्टारडम के साथ स्थापित किया था, जो ‘ट्रेंड सेटर’ पोस्टर बना। यह शैली आज तक बनी हुई है। डी अंबाजी, बालकृष्ण, एमएफ हुसेन, सतीश, रामचंद्रन, के चिनप्पा, दिवाकर करकरे, परवेज, एस रहमान आदि ने हस्त निर्मित पोस्टर संस्कृति को आगे बढ़ाया।

दिवाकर करकरे का करिअर लगभग तीन दशक से अधिक समय तक फैला है। अपने मास्टर स्ट्रोक ब्रश से उन्होंने लोगों का ध्यान खींचा और मनोरंजन भी किया। उन्होंने जेजे स्कूल ऑफ आर्ट्स से पढ़ाई की थी। हुसेन भी उससे जुड़े रहे। इस संस्थान ने एक से बढ़ कर एक कलाकार दिए, जिन्होंने फिल्मी पोस्टर को रंगीन किया। करकरे ने बिमल रॉय, के विश्वनाथ जैसे विख्यात फिल्मकारों के लिए पोस्टर बनाए। इनकी खासियत यह रही कि इन्होंने फिल्मी पोस्टर में क्रांतिकारी बदलाव किया। हिंदी सिनेमा के खलनायक के चेहरे को नायक से बढ़ा कर पेश किया। खलनायकी की बादशाहत को अपनी पेंटिंग्स के रास्ते उभारे और इसे प्रचार के एक ताकतवर माध्यम के रूप में स्थापित किया। इनके नाम हजारों फिल्मी पोस्टर हैं।

अमिताभ बच्चन के यंग्री यंगमैन की जो छवि फिल्मी प्रशंसकों और भारतीय दर्शकों के मन में बसी है, उसमें दिवाकर करकरे के बनाए पोस्टरों की भूमिका असंदिग्ध है। ‘दीवार’ फिल्म ने अमिताभ को ऊंचाई दी। उसके पोस्टर बेहद लोकप्रिय हुए थे। यह करकरे के हुनर का ही कमाल था। अमिताभ का सोचता हुआ दिमाग, दर्दभरा चेहरा, उदास मन, तमतमाया चेहरा जो दर्शकों के जेहन में आज भी ताजा हैं, उन छवियों को करकरे ने ही उभारा और लोगों के दिलों दिमाग में टांक दिया। वे ऐसा ब्रश चलाते थे जिससे ब्राइटनेश उभर आए। गाढ़े रंगों का मिश्रण उनके पोस्टर में होता था। राजकपूर से लेकर यशराज तक उसके मुरीद और ग्राहक रहे।
दिवाकर करकरे के कूंची की चमक और प्रतिभा का भान तब हुआ जब उन्होंने अपने दौर की हिट फिल्म ‘वक्त’ (1965) का नायाब पोस्टर बनाया। पोस्टर के केंद्र में अभिनेता राजकुमार हैं, जिनके हाथ में चाकू की चमक बिलकुल उभरी हुई है और पतली धनुषाकार मूंछों के नीचे मुंह में तिरछी फंसी सिगरेट से उठता धुंआ। एक तरफ ऊपर कोने में शशि कपूर, तो नीचे कोने में सुनील दत्त का चेहरा दूसरी तरफ ऊपर शर्मिला टैगोर और नीचे साधना। बिल्कुल जीवंत तस्वीर।

पोस्टर में कहानी

एक ही फिल्म के कई अलग-अलग पोस्टर बनते थे। ये सभी पोस्टर मिलकर फिल्म की कहानी बनाते थे। कई पोस्टर तो ऐसे भी देखने को मिलते हैं, जिनका परदे पर जिक्र नहीं है या जो दृश्य परदे पर उतारे ही नहीं गए। संभवत: इस मामले में भी ‘मुगल-ए-आजम’ बेजोड़ फिल्म मानी जाएगी। उसके कई पोस्टर देखने को मिलते हैं जो दृश्य में हैं ही नहीं। एमएफ हुसेन ने कई पोस्टर और कलात्मक चित्र उस फिल्म से प्रेरित होकर बनाए। यानी कुछ कलाकारों ने खुद ही पेंटिंग्स बनाई या कुछ ऐसे चित्र भी बना दिए गए होंगे, जिन्हें देख दर्शक फिल्मों की ओर दौड़ें।

1980 के बाद जब फिल्मी पोस्टर की दुनिया में ‘कट ऐंड पेस्ट’ शैली का इजाद हुआ तो दिवाकर ने अपने को इस लोकप्रिय विधा से अलग कर लिया। उन्हें लगने लगा कि फोटोग्राफी और पेंटिंग्स की मिक्सिंग की जा रही है। इसमें कोई रचनात्मकता नहीं है और वह दौर निकल गया, जब हाथ से बने पोस्टर की कद्र और दरकार लोगों के बीच रही। उन्हें यह शैली ‘यांत्रिक जॉब’ जैसी लगने लगी। दरअसल, वे सच्चे कलाकार थे। इसलिए मशीन और तकनीक के प्रवेश से छिटक कर अलग हो गए। यह भी कह सकते हैं कि बदलती तकनीक और मशीन के साथ उन्होंने संगति नहीं बिठाई।

हुसेन के पोस्टर

भारतीय चित्रकला की दुनिया के पिकासो कहे जाने वाले ख्यातिलब्ध एमएफ हुसेन ने अपने करिअर के शुरुआती दौर में अपनी कूंची से कई दर्जन फिल्मों के पोस्टर बनाए। वे उन विरल कलाकारों में थे, जिन्होंने लोकप्रिय चित्र और कलात्मक चित्रकला के बीच की दूरी को काफी हद तक पाटा। ऊर्जा और भावप्रवणता एक साथ उनकी चित्रकला में रही। जिंदगी जीने की जरूरत के हिसाब से उन्होंने पोस्टर बनाए। फिल्मों से उनका गहरा जुड़ाव रहा, इसलिए फिल्में भी बनाई और उसमें काम भी किया। बाबूराव पेंटर की परंपरा को आगे बढ़ाने का काम हुसेन ने किया। इन फिल्मों के पोस्टर भी खुद बनाया। पूर्व मुख्यमंत्री एम करुणानिधि से गहरे प्रभावित रहे हुसेन ने उनके फिल्मी सफर को कैनवास पर उतारा और उनके एक्टर रूप को पेंट किया। ‘मुगल-ए-आजम’ फिल्म से इतने प्रभावित रहे कि फिल्म के एक अंतरंग प्रेम दृश्य-जब वाटिका में सलीम और अनारकली प्रेम कर रहे हैं-को पेंटिंग में उतारा। बिल्कुल अलग। अनूठा। कलात्मक। अनारकली और सलीम को सिर्फ उन दृश्यों से पहचाना जा सकता है, न कि चेहरे से। ‘प्यासा’, ‘शोले’, ‘ताल’ आदि फिल्मों के पोस्टर भी उन्होंने बनाए। ‘शोले’ उनका स्वतंत्र चुनाव था। वे इस काम के लिए नियुक्त नहीं थे। इन चित्रों में व्यवसायी नहीं झांकता, बल्कि एक उत्कृष्ट कलाकार ही रमा दिखता है।

सी मोहन का जादू

सी मोहन ने राजश्री प्रोडक्शन, के ए अब्बास, सुनील दत्त, मनोज कुमार आदि के फिल्मों के लिए पोस्टर बनाए। उनकी ख्याति में ‘शोले’ फिल्म का पोस्टर जुड़ा है। गब्बर सिंह का पोस्टर पर तना और उभरा हुआ खूंखार चेहरा, जो आग की तरह कैनवास पर फैला पड़ा है, लोगों के जेहन में अब भी मौजूद है। ‘चितचोर’, ‘गीत गाता चल’, ‘अमर प्रेम’, ‘अंदाज’, ‘पूरब और पश्चिम’ जैसी चर्चित और लोकप्रिय फिल्मों के पोस्टर डिजाइन किए। अराधना फिल्म के पोस्टर में उन्होंने रोमन में लिखे ‘ध’ (डीएच) को मंदिर के स्थापत्य में उभार दिया। शब्दों के बीच यह उभरी स्थिति अराधना नाम को भी एक सार्थकता प्रदान करती है। यह एक कलाकार की दृष्टि संपन्नता की परिचायक है। उनके पोस्टर के ‘टेक्स्ट’ और ‘विजुअल’ में फिल्म के कथानक को उभारने की क्षमता तो है ही, उसके बहुत आगे अर्थ देने की संभावनाओं के द्वार भी खोलती है। मनोज कुमार की फिल्म ‘पूरब और पश्चिम’ में उन्होंने पश्चिम शब्द को पूरब से थोड़ा झुका कर नीचे लिख दिया है। यह मनोज कुमार से आगे सी मोहन का सांस्कृतिक-राष्ट्रवादी विमर्श है। पूरब का अर्थ यहां उठती हुई भारतीय संस्कृति है और पश्चिम का अर्थ नीचे गिरती हुई यूरोपीय संस्कृति है। मनोज कुमार की फिल्मी संस्कृति की संगति में बिठाएं तो उनके अर्थों का यहां विस्तार है। सी मनोज ने ‘शोले’ के सोलह पोस्टर डिजाइन किए, जिनमें हिंसा, इमोशन सभी को जगह दी। ‘शोले’ बिल्कुल ‘थ्री डी’ जैसी सघन और जटिल बनावट में उकेरी गई। चित्रकला की दृष्टि से देखें तो इसे भी उत्कृष्ट पोस्टर की श्रेणी में रखा जाएगा।

पोस्टर की सार्थकता

अच्छा पोस्टर फिल्म के पूरे व्यक्तित्व का वहन करता है। पोस्टर ही कथा को उभारता है। पोस्टर बदलते वक्त के गवाह हैं। ‘दो बीघा जमीन’, ‘मदर इंडिया’, ‘हम आपके हैं कौन’ से लेकर ‘लगान’ और बाद के पोस्टरों को देखें तो कई चीजें एक साथ उभरती हैं। आजादी और लोकतंत्र के चुनाव के बाद भी सामंती अवशेष और उसकी जकड़बंदी गांवों में मौजूद हैं। सेठ, साहूकार के चंगुल में साधारण किसान फंसा पड़ा है। वह जीने के लिए संघर्ष कर रहा है। कड़ी मेहनत के बाबजूद अपना और परिवार का पेट पालने में विफल है। हाड़तोड़ मेहनत के अक्स और उनका जीवन, उनका पहनावा उनकी शैली सब पोस्टर में दिख रहे हैं। ‘लगान’ फिल्म का किसान ‘दो बीघा जमीन’ और ‘मदर इंडिया’ से अलग है। ‘लगान’ नए राष्ट्रवाद को लेकर आता है। नए राष्ट्र के निर्माण की संकल्पना और संघर्ष पूर्ववर्ती दोनों पोस्टरों में है।

बीसवीं सदी के अंतिम दशक में जब धार्मिक कट्टरता, सांप्रदायिक दंगे, जातिवाद और क्षेत्रीय विषमता हुंकार मारने लगी तो ‘लगान’ के रास्ते फिर भारतीय को एकजुट दिखाने का प्रयास किया गया। यही दौर है, जब किसानों की आत्महत्याओं की खबरें बढ़ रही थी। ‘लगान’ फिल्म के पोस्टर अतीत और वर्तमान के संदेशों को एक साथ साधते हैं। यहां किसान को एक सांस्कृतिक लड़ाई लड़ते दिखाया गया है, इसलिए तना हुआ है। जबकि ‘दो बीघा जमीन’ या ‘मदर इंडिया’ में यथार्थ से जूझते दिखाया गया है। ये पोस्टर बदलते वक्त की कथा को कहते हैं।

बाजार का दबाव

पोस्टर बाजार के फार्मूले पर चलता है और ज्यादा लोगों का ध्यान आकृष्ट करना इसका उद्देश्य होता है, इसलिए कलाकार इसे भड़कीला, चमकीला बनाते हैं। यह इसकी आधारभूत विशेषता है। अक्सर पोस्टरों में अप्राकृतिक रंगों का संयोजन होता है। समाज के वर्गीय संरचना को ध्यान में रखकर भी पोस्टर बनाए जाते हैं। मसलन, शहरी क्षेत्रों के लिए पोस्टर अलग होते हैं और ग्रामीण क्षेत्रों के अलग। ग्रामीण और बंद समाज या अपेक्षाकृत कम खुले समाज या शहरी क्षेत्र में सेक्स अधिक लुभाता है तो वहां वैसे पोस्टर छापे और चिपकाए जाते हैं। शहरी क्षेत्रों में या संभ्रांत इलाके के पोस्टर में टैग लाइन से लेकर डिजाइन तक बदले होते हैं। उन पर भाषाई दृष्टि से अंग्रेजी का दबाव अधिक होता है। लक्षित जनसमूह तक पहुंचना और उन्हें उत्प्रेरित करना उनका उद्देश्य होता है। हिंसा और आक्रमकता भारतीय दर्शकों को पसंद है, इसलिए पोस्टर में उन्हें काफी जगह मिलती है।

बाबजूद इसके सिनेमाई पोस्टर भारतीय संस्कृति को अभिव्यक्त भी करते हैं और उसे निर्मित भी करते हैं। आजादी के दो-तीन दशक तक पोस्टर त्रिभाषिक छपते रहे। हिंदी-उर्दू-अंग्रेजी में। बाद में पोस्टर से उर्दू गायब होती गई। यह क्यों हुआ और कैसे? 1990 के बाद फिल्मों के दर्शक बदले। तकनीक और वैश्विक परिवर्तन और उपस्थिति ने फिल्मों के शीर्षक बदल दिए। अब धड़ल्ले से अंग्रेजी शीर्षक ही रख दिया जाता है। ग्राफिक्स और डिजिटल तकनीक ने पोस्टर के स्वरूप को ही बदल दिया। कृत्रिम रंगों ने पोस्टर के साथ दर्शक की दूरी बना दी। ‘नायक’ और ‘चरित्र’ में अंतर होता है। नायकत्व के क्षीण होने के साथ ही स्टारकास्ट में लिखे नाम भी छोटे हो गए। अब पोस्टर में उसी का नाम बड़ा होता है, जिसकी छवि दर्शक वर्ग में है। इसलिए कई बार निर्देशक महत्त्वपूर्ण होता है, तो कई बार निर्माता, तो कई बार अभिनेता।

चूंकि अब प्रचार की कई शैलियां और ताकतवर माध्यम-टीवी, रेडियो, ऑनलाइन, सोशल मीडिया आदि हमारे बीच उपस्थित हो गए हैं और अब पोस्टर बनाना बहुत आसान प्रविधि में शामिल हो गया है, इसलिए उन कलाकारों का रोजगार और कला दोनों छिन गए, जो इससे जुड़े थे। शहर की संरचना और नियम, कानून, कायदे भी पहले से प्रभावी और सख्त हुए, जिसकी वजह से दीवारों पर से फिल्मी चित्र गायब होते चले गए। अत्याधुनिक डिजिटल तकनीक और बाजार के दैत्याकार स्वरूप ने उस हुनर को हमसे अलग कर दिया, जो लगभग सात-आठ दशक तक हमारे बीच जिंदा आकर्षण का केंद्र रहा।