उमा भट्ट
सोलह दिसंबर, 2012 को दिल्ली में हुए निर्भया कांड ने पूरे देश को हिला कर रख दिया था। ऐसा नहीं कि यह जघन्य घटना अकेली थी। आए दिन ऐसी घटनाएं घटती रहती हैं लेकिन उस बार जो उद्वेलन हुआ, उसने एक नया नारा दिया- ‘और नहीं, अब और नहीं।’ महिलाओं के खिलाफ हिंसा को अब और सहन नहीं किया जाएगा। इसके लिए बहुत-से स्त्री-पुरुष एक साथ संघर्ष के लिए उठ खड़े हुए लेकिन चार साल बीत जाने पर भी स्थिति की भयावहता ज्यों की त्यों बरकरार है। यह समझना जरूरी है कि आखिर स्त्रियों के प्रति इतनी हिंसा होती क्यों है? इस हिंसा के पीछे मूल कारण क्या हैं? उन कारणों को दूर किए बिना क्या हम महिला के प्रति हिंसा को खत्म कर सकते हैं? यह तो हम सभी समझते हैं कि हमारे समाज में पुरुषों की तुलना में औरतों को दोयम दर्जा हासिल है। मगर इसकी वजह क्या है ? इसकी वजह समाज में गहराई से व्याप्त पितृसत्ता है। इसलिए आज की चर्चा में पितृसत्ता को समझना आवश्यक है।
पितृसत्ता एक सामाजिक व्यवस्था है, जिसके अनुसार पुरुषों को स्त्रियों से श्रेष्ठ समझा जाता है। इसमें स्त्रियों पर पुरुषों का वर्चस्व रहता है। वे सभी संसाधनों और सामाजिक संस्थाओं के नियंत्रक होते हैं। इसका अभिप्राय यह भी नहीं है कि प्रत्येक पुरुष सदा वर्चस्व की स्थिति में रहता है और प्रत्येक स्त्री सदा अधीनता की स्थिति में रहती है। लेकिन, पितृसत्ता के तहत यह विचारधारा प्रभावी रहती है कि पुरुष, स्त्रियों से श्रेष्ठ है और महिलाओं पर पुरुषों का नियंत्रण है और होना चाहिए। महिलाओं को इस विचारधारा के तहत पुरुषों की संपत्ति के रूप में देखा जाता है। इस प्रकार पितृसत्ता स्त्री और पुरुष के बीच भेद पैदा करती है। बीसवीं शताब्दी के आठवें दशक के मध्य से नारीवादी विचारकों ने पितृसत्ता शब्द का प्रयोग इस अर्थ में करना प्रारंभ किया और उसे विशेष संदर्भ में परिभाषित किया।
पितृसत्ता के तहत औरतों पर नियंत्रण रखने और उन्हें दबाने के लिए अनेक तरीकों का इस्तेमाल किया जाता है जिनमें हिंसा भी एक है। विभिन्न क्षेत्रों और विभिन्न कालों में पितृसत्ता भिन्न-भिन्न रूपों में देखी जा सकती है। यह बदलती भी रही है। इसलिए जो लोग समानता पर आधारित समाज बनाने के लिए प्रतिबद्ध हैं, वे यह भी विश्वास रखते हैं कि पितृसत्ता को भी बदला जा सकता है। पितृसत्तात्मक व्यवस्था को बदलने के लिए सबसे मुख्य बात यह है कि स्त्री-पुरुष में जो विभेद पैदा किया गया है, उसे खत्म किया जाए। स्त्री-पुरुष का स्वाभाविक विभेद प्राकृतिक है, लेकिन सामाजिक दृष्टि से स्त्री-पुरुष में जो विभेद पैदा किया जाता है, उसके लिए लैंगिक-असमानता शब्द का प्रयोग किया जाता है। यह भेद पितृसत्ता के कारण है। इस सामाजिक भेद को खत्म करके ही स्त्री को बराबरी का दर्जा मिल सकता है।
स्त्री की विशेषता उसकी प्रजनन क्षमता है। वह प्रजनन कर सकती है। पितृसत्ता के तहत पुरुषों का नियंत्रण सबसे अधिक स्त्री की प्रजनन क्षमता पर होता है। पुरुष का संपत्ति पर नियंत्रण होता है। संपत्ति का उत्तराधिकारी पुत्र होता है। इसलिए पुत्र को जन्म देने वाली स्त्री की प्रजनन क्षमता पर नियंत्रण करके पुरुष अपनी संपत्ति पर नियंत्रण करता है। शुरू-शुरू में स्त्री की प्रजनन क्षमता पर कबीले का नियंत्रण रहता था पर संपत्ति पर व्यक्तिगत अधिकार होने के साथ-साथ स्त्री भी निजी संपत्ति मानी जाने लगी और स्त्री की यौनिकता को विवाह-संबंध के भीतर सीमित कर दिया गया। यहीं से यौन शुचिता का प्रश्न स्त्री के साथ जुड़ गया जिससे समाज में अच्छी औरत और बुरी औरत की धारणाएं विकसित हुर्इं।
इसके साथ ही स्त्री की श्रमशक्ति पर भी पुरुष का नियंत्रण होता गया। पितृसत्ता के तहत घर के भीतर स्त्रियों की उत्पादकता पर भी पुरुषों का नियंत्रण होता है और यह फैसला भी पुरुषों के हाथ में रहता है कि वे घर के बाहर जाकर काम करेंगी या नहीं। स्त्रियों के श्रम पर नियंत्रण का अभिप्राय है कि पुरुष, स्त्रियों के श्रम से लाभ उठाते हैं। इस दोहरे नियंत्रण- यौनिकता और श्रम के कारण स्त्रियों की आजादी बुरी तरह बाधित हो जाती है।
इसके लिए ऐसी परंपराओं और रीति-रिवाजों का सहारा लिया जाता है जो औरत कोे घर की चारदीवारी में बांध देते हैं। इससे महिलाओं का संसाधनों पर नियंत्रण नहीं रह जाता और उन्हें पुरुषों पर निर्भर हो जाना पड़ता है। हाल के दिनों में राजनेताओं, धर्म के ठेकेदारों द्वारा महिलाओं के प्रति जो टिप्पणियां की जा रही हैं, वे इन्हीं दायरों के कारण हो रही हैं। क्योंकि वे मानते हैं कि स्त्रियों पर नियंत्रण होना चाहिए। स्त्री स्वतंत्र नहीं है। वह व्यक्ति नहीं, वस्तु है, पुरुष की संपत्ति है। जिस तरह संपत्ति की देखभाल की जाती है, उसी तरह स्त्रियों की भी देखरेख की जानी चाहिए।
यहां पर पैतृकवाद के सिद्धांत को भी समझना जरूरी है। पैतृकवाद के तहत दो प्रकार के समूह हैं- एक प्रभुत्वशाली समूह और दूसरा अधीन समूह। अधीन समूह अपनी अधीनता के बदले में प्रभुत्वशाली समूह से पितृवत् संरक्षण और अवैतनिक श्रम के बदले भरण-पोषण प्राप्त करता है। परिवार के भीतर पिता का परिवार के सभी सदस्यों पर नियंत्रण रहता है। बदले में पिता का दायित्व होता है कि वह उन्हें आर्थिक सहायता और संरक्षण दे। एक बार महिलाओं को अधिकार से वंचित कर देने से उनका सहयोग प्राप्त करना आसान हो जाता है। क्योंकि जब वे पितृसत्ता का अनुकरण करने लगती हैं तो उन्हें वे सब सुविधाएं मिलने लगती हैं जिसका उपभोग पुरुष वर्ग करता है। जो महिलाएं उनका अनुकरण नहीं करतीं, वे दोषी ठहरा दी जाती हैं। ऐसे में महिलाएं अपनी कर्तव्यपरायणता और शुचिता (पवित्रता) के मूल्यों में विश्वास करने लगती हैं।
सांस्कृतिक प्रतीकों और आचरण को अपनाकर महिलाएं समझने लगती हैं कि उनका परिष्कार हो रहा है और वे पूज्य हो रही हैं। वे अपनी पराधीनता के भाव को भूलकर त्याग, सहिष्णुता, लज्जा आदि के द्वारा स्वयं को विशिष्ट समझने लगती हैं। इस प्रकार महिलाओं के जीवन को नियंत्रित करनेवाली पितृसत्तात्मक व्यवस्था में महिलाओं का सहयोग हासिल करके पुरुषवर्ग उसे और मजबूत बनाने में सफल हो जाता है। दूसरी ओर पितृसत्ता का लाभ उठानेवाली महिलाएं अन्य वंचित महिलाओं के शोषण का जरिया बन जाती हैं। इसी कारण से समाज में यह भ्रांति फैला दी जाती है कि ‘औरत ही औरत की दुश्मन’ है।
किसी भी सत्ता के दो पक्ष होते हैं- शोषक और शोषित। शोषक वर्ग की सत्ता शोषितों के सहयोग के बिना नहीं चलती। शोषित वर्ग के कुछ लोग उसका फायदा उठाते हैं और उसमें शामिल हो जाते हैं। यह बात स्त्रियों पर भी लागू होती है। कुछ औरतें भी पितृसत्ता का फायदा उठाती हैं। वे पितृसत्ता के साथ सहयोग करती हैं, उसे आगे बढ़ाती हैं। अधिकांश औरतों ने पितृसत्ता के मूल्यों को अपने भीतर तक बसा लिया है। इसीलिए औरतें भी उसका समर्थन करती हैं। इस बात को स्पष्ट करने के लिए एक उदाहरण बार-बार दिया जाता है।
एक ग्रामीण औरत ने एक बैठक में यह बात बहुत अच्छी तरह समझाई कि – पुरुष हमारे परिवारों में सूरज की तरह हैं, उनका अपना प्रकाश है। औरतें उपग्रह की तरह हैं, जिनकी अपनी कोई रोशनी नहीं है। वे तो तभी चमकती हैं, जब सूरज की रोशनी उन पर पड़ती है। इसलिए औरतें सूरज की ज्यादा रोशनी पाने के लिए लगातार आपस में होड़ करती रहती हैं, क्योंकि उसके बिना उनके जीवन में अंधेरा रहता है।
पितृसत्ता भी कई आयामों से प्रकट होती है, जैसे धर्म, जाति, वर्ग आदि। भिन्न-भिन्न धर्म, जाति या वर्गों में औरतों की स्थिति अलग-अलग हो सकती है। एक धनी वर्ग की स्त्री एक निम्न वर्ग की स्त्री या पुरुष पर शासन कर सकती है। निम्न वर्ग की स्त्रियां धनिक वर्ग की स्त्रियों की तुलना में काम करने के लिए अधिक स्वतंत्र होती हैं। उच्च जाति की महिलाओं के लिए सामाजिक और धार्मिक पाबंदियां अधिक होती हैं। ऊंची जातियों में जाति की पवित्रता और उच्चता बनाए रखने का दबाव होता है। इसलिए पुरुष अपने वर्ग की स्त्रियों को अधिक नियंत्रित करते हैं। औरतों के पहनावे, आने-जाने पर पाबंदी लगाते हैं और उनकी यौनिकता पर भी नियंत्रण रखते हैं।
पितृसत्ता की अभिव्यक्ति का एक रूप स्त्रियों पर हिंसा करना है। हिंसा का एक रूप यौन शोषण है। यौन शोषण, मुख्यत: बलात्कार के रूप में शासक वर्ग द्वारा शोषित वर्ग को सबक सिखाने या उन्हें काबू में रखने का एक जरिया है। यह दूसरे वर्ग के पुरुषों को सजा देने का एक ढंग है। अपनी सत्ता और प्रभुता बनाये रखने का एक तरीका है। चूंकि औरतों को मर्दों की संपत्ति माना जाता है, इसलिए पुरुषों से बदला लेने के लिए उनकी औरतों से बलात्कार किया जाता है। यह भी कहा जाता है कि जो जमीन का मालिक होता है, वही औरतों का भी मालिक होता है।
वर्तमान में एक ओर कट्टरपंथी धार्मिक शक्तियां अपना वर्चस्व कायम करने में लगी हुई हैं तो दूसरी ओर उदारीकरण की अर्थव्यवस्था स्त्री को उपभोग की वस्तु के रूप में अधिक से अधिक इस्तेमाल कर रही है। विज्ञापनों और संचार माध्यमों के जरिए औरत की छवि विकृत की जा रही है। आर्थिक कठिनाइयों के कारण भी औरत के साथ भेदभाव बढ़ रहा है। मादा भ्रूण हत्या, बालिका शिशु हत्या जैसी प्रवृत्तियां पहले की अपेक्षा बढ़ रही हैं। आॅनर किलिंग पितृसत्ता का सबसे भयावह चेहरा है।
औरतों को इस तरह हक से वंचित कर दिए जाने से सिर्फ औरतों का ही नुकसान नहीं हो रहा है, बल्कि पूरे समुदाय, देश या कहना चाहिए, मानव जाति का ही नुकसान हो रहा है। क्योंकि पूरे विश्व की आधी आबादी शोषित-पीड़ित है तो विश्व का विकास कैसे स्वीकार किया जा सकता है। 1975 से इस पर निरंतर विश्व-स्तर पर प्रयास किए जा रहे हैंऔर कदम उठाये जा रहे हैं। दुनिया भर के देशों में महिलाओं के विकास का एजेंडा तय है, मगर उसकी बराबर उपेक्षा हो रही है। आज हमारी समस्या यह है कि सामाजिक क्षेत्र में स्त्री हर कहीं मौजूद है- स्कूल, कालेज, सरकारी-गैर सरकारी संस्थानों, कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका सभी जगह। वह सभी दायित्वों को बखूबी निभा रही है लेकिन उसका स्त्री होना उसके लिए तरह-तरह की समस्याएं और संघर्ष पैदा कर देता है क्योंकि पितृसत्तात्मक सोच उसे बराबरी का दर्जा देने को तैयार नहीं है।
औरतों की स्थिति को बदलने के लिए पितृसत्तात्मक ढांचों और धारणाओं को बदलना जरूरी है। औरतों के साथ-साथ पुरुषों की स्थिति, दर्जे और भूमिका में भी बदलाव लाना आवश्यक है। इस प्रकार के अनेक स्तरीय बदलावों के लिए जिस बात पर सर्वाधिक जोर दिया जाता है, वह है लैंगिक संवेदनशीलता। लैंगिक संवेदनशीलता का अर्थ है पितृसत्ता से जुड़े हुए जाति, धर्म, वर्ग आदि को समझना और उन्हें चुनौती देना। समझने और सोचने के साथ-साथ लोगों के व्यवहार में अंतर आना भी जरूरी है और अंतर लाने के लिए कार्रवाइयां करना भी जरूरी है। इसके लिए कई तरह के कार्यक्रम किए जा रहे हैं, जिन्हें और प्रभावी ढंग से तथा व्यापक स्तर पर करने की आश्यकता है। जैसे स्कूली पाठ्यक्रमों का विश्लेषण करके उन्हें महिलाओं के प्रति संवेदनशील बनाया जाए। जन-संचार माध्यमों को पितृसत्तात्मक आग्रहों से मुक्त किया जाए।
कानूनों और कानूनी प्रक्रिया की जांच-परख करके उसे महिला-संवेदी बनाया जाए। सभी तरह के कर्मचारियों, शिक्षकों, कार्यकताओं, न्यायपालिका के सदस्यों, और अन्य समूहों के लिए बार-बार कार्यशालाएं आयोजित करके उन्हें पितृसत्ता, लिंग आदि को समझने और उसके प्रति संवेदनशील बनाने में सफलता मिल सके। सरकारी नीतियों को महिलाओं को दृष्टि में रख कर बनाया जाए। लिंग-संवेदनशीलता हर स्तर पर जरूरी है – चाहे वह भाषा हो, गीत हो या खेलकूद। पुरुषों का घरेलू काम में हाथ बंटाना भी उतना ही जरूरी है जितना कि औरतों का जल, जंगल और जमीन पर अधिकार होना। औरतों को मुख्यधारा से जोड़ना ही जरूरी नहीं है, औरतों के नजरिए से मुख्यधारा को परखना और बदलना भी जरूरी है। संक्षेप में कहा जाए तो यह आवश्यक है कि महिला को वस्तु या संपत्ति न समझा जाय। संपत्ति, संसाधनों पर महिलाओं का बराबर का अधिकार हो। स्त्री-पुरुष में विभेद पैदा करनेवाली सभी व्यवस्थाएं, रीति-रिवाज खत्म किए जाएं। व्यक्तिगत ही राजनीतिक है, इस नारीवादी नारे ने सिद्ध किया कि स्त्रियों के मुद्दे भी राजनीतिक मुद्दे हैं। इसलिए इनके लिए समाज के सभी वर्गों को मिलकर संघर्ष करना होगा। केवल महिलाएं की इनके लिए संघर्ष करेंगी तो इससे समाधान होनेवाला नहीं है।

