मनीष कुमार जोशी

जहां शोरगुल ही क्रिकेट की पहचान हो, वहां बिलकुल शांत वातावरण में क्रिकेट के बारे में कोई सोच सकता है कि यह तो बोरियत पैदा करता होगा। लेकिन, इस क्रिकेट का रोमांच अलग है। भारत में 1990 से यह खेला जा रहा है। बदलते क्रिकेट के साथ इसमें भी बदलाव हो रहे है और इसे लोगों द्वारा पसंद किया जा रहा है, जिसका सुबूत टी-20 विश्वकप के फाइनल में बेंग्लुरु के स्टेडियम में मौजूद हजारों दर्शको की भीड़ थी। बेंग्लुरु के चेन्नास्वामी स्टेडियम में जब भारत ने पाकिस्तान को नौ विकेट से पराजित कर दृष्टिबाधित क्रिकेट का टी-20 विश्वकप अपने नाम किया तो स्टेडियम में बैठे हजारों लोगों को सुखद अहसास हुआ। ऐसा क्रिकेट का खेल जिसमें चौके, छक्के और गेंद दर गेंद रोमांच सब कुछ है लेकिन शोर नहीं है। गेंदबाज द्वारा गेंद फेंकने से पहले उद्घोषक स्टेडियम में बैठे हजारो दर्शको से अपील करता है कि आप शांत हो जाएं। यह अपील हर गेंद के पहले की जाती है। दरअसल, दृष्टिबाधित क्रिकेट के खेल का माध्यम ही आवाज है। शांति में ही यह क्रिकेट खेली जाता है। शांति के अभाव में बल्लेबाज को गेंद का पता नहीं चल पाता है। गेंद की आवाज पर ही बल्लेबाज अपना शॉट खेलता है और यही वजह है कि हर गेंद से पहले दर्शको से शांति की अपील की जाती है।

जहां शोरगुल ही क्रिकेट की पहचान हो, वहां बिलकुल शांत वातावरण में क्रिकेट के बारे में कोई सोच सकता है कि यह तो बोरियत पैदा करता होगा। लेकिन, इस क्रिकेट का रोमांच अलग है। भारत में 1990 से यह खेला जा रहा है। बदलते क्रिकेट के साथ इसमें भी बदलाव हो रहे है और इसे लोगों द्वारा पसंद किया जा रहा है, जिसका सुबूत टी-20 विश्वकप के फाइनल में बेंग्लुरु के स्टेडियम में मौजूद हजारों दर्शको की भीड़ थी। दृष्टिबाधित क्रिकेट के 11 खिलाड़ी अलग अलग श्रेणी में विभाजित होते हैं। टीम में चार खिलाड़ी पूर्ण दृष्टिबाधित होते हैं और इन्हें बी-1 खिलाड़ी कहा जाता है। 2/60 नजर वाले तीन खिलाड़ी होते है जिन्हे बी-2 खिलाड़ी और 6/60 नजर वाले चार खिलाड़ी जिन्हें बी-3 खिलाड़ी कहा जाता है। इस खेल के लिए विशेष प्रकार की गेंद काम में ली जाती है। यह सामान्य क्रिकेट की गेंद से आकार में बड़ी होती है और यह गेंद हाथ से छुटने के बाद आवाज करती है।

इसी आवाज के सहारे बल्लेबाज गेंद का अंदाजा लगाकर खेलता है और बल्लेबाज गेंद को फील्ड करते है। मुख्य क्रिकेट की तरह गेंद यहां उछाल नहीं लेती है क्योंकि यहां सिर्फ अंडर आर्म गेंद फेंकी जाती है लेकिन गेंद को स्पिन कराया जा सकता है। इसी कारण से गेंद फेंकने से पूर्व दर्शकों से शांत रहने की अपील की जाती है। यह ऐसा क्रिकेट है, जिसमें एक गेंद पर 8 रन, 12 रन और इससे ज्यादा रन भी बन सकते है। पूर्ण दृष्टिबाधित खिलाड़ी रन बनाता है तो वे दोगुने हो जाते है। अग पूर्ण दृष्टिबाधित खिलाड़ी एक गेंद पर 6 रन बनाता है तो उसके खाते में 12 रन लिखे जाएंगे। और अगर वह एक बाउंस कैच पकड़ता है तो बल्लेबाज को आउट दे दिया जाता है। केवल गेंद और खिलाड़ियो के लिहाज से अलग क्रिकेट नहीं है बल्कि इसके दूसरे नियम भी मुख्य क्रिकेट से अलग हैं जो इसे रोमांचक बनाते हैं। खेल के नियम इस प्रकार बनाए गए कि पूर्ण दृष्टिबाधित खिलाड़ियों का उत्साह बना रहे और खेल की रोमांचकता भी बनी रहे।

इस विश्व कप में भारत और पाकिस्तान की दोनो टीमें बेहतर खेल खेलीं। भारत ने फाइनल से पहले नौ मैचो में से आठ जीते थे। फाइनल से पहले पाकिस्तान का पलड़ा भारी दिखाई दे रहा था। पाकिस्तान ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 20 ओवर में 9 विकेट पर 197 रन बनाएं, जिसमें बदर मुनीर के शानदार 57 रनों का योगदान शामिल है। भारत ने शुरू से ही मैच पर पकड़ बनाए रखी। पहले पांच ओवर में भारत के बिना नुकसान के 54 रन और 10 ओवर के बाद बिना नुकसान के 109 रन थे। भारत ने 17.4 ओवर में 200 रन बनाकर पाकिस्तान को पराजित करते हुए टी-20 विश्वकप अपने नाम कर लिया। भारत की ओर से जे. प्रकाश ने शानदार 99 रन बनाए। इस प्रकार भारत ने बेहद रोमांचक मुकाबले में पाकिस्तान को पराजित कर दिया।

फाइनल मैच के स्कोर से यह अंदाजा नहीं लगाना चाहिए कि दृष्टिबाधित क्रिकेट में छोटे-छोटे स्कोर ही बनते है। पाकिस्तान ने टूर्नामेंट में सर्वाधिक उच्च स्कोर 373 पर 4 विकेट बनाया। नेपाल के पदम बहादुर ने व्यक्गित 211 रन बनाए। बल्लेबाज के शॉट के साथ गेंद आवाज करते हुए मैदान में लुढ़कती है तो रोमांच की एक सिहरन सी दौड़ उठती है। यह वास्तव मे रुचिकर होता है। दृष्टिबाधित क्रिकेट को रसहीन क्रिकेट माना जाता है जबकि ये कौशल और बेहद रोमांच का खेल है। इसके रोमांच को जानने के लिए आपको इसके प्रति अपना नजरिया बदलना होगा। कुछ सालो में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की कामयाबी से इस क्रिकेट को मजबूती मिली है। इसे एक संगठित खेल के तौर पर देखा जाने लगा है। देश में कई राज्यो में दृष्टिबाधित क्रिकेट संघ बन गए हैं। इसके बावजूद इसे मदद की जरूरत है। दृष्टिबाधित क्रिकेट को बीसीसीआई संचालित नहीं करती । मांग की जा रही है कि दृष्टिबाधित क्रिकेट भी उसे देखना चाहिए। दृष्टिबाधित क्रिकेट को धन से ज्यादा मनोबल की जरूरत है। जरूरत इस बात की है कि इसके प्रति जो नजरिया है उसे बदला जाए।

इंग्लैंड के क्रिकेटर हॉसेल ने एक वेबसाइट को बताया है कि दृष्टिबाधित क्रिकेट में गेंद धीमे आती है और आपके पास गेंद को मारने के लिए पर्याप्त समय होता है । अगर आपने कड़ा अभ्यास किया है तो आप आसानी के साथ रन बना सकते हैं। उसने बताया कि वह पहले सामान्य क्रिकेट खेला करता था क्योंकि वह बचपन से दृष्टिबाधित नहीं था लेकिन 13-14 साल की उम्र में उसकी नजर कमजोर हो गई। जब वह सामान्य क्रिकेट खेलने के लिए अयोग्य हो गया तो उसने दृष्टिबाधित क्रिकेट खेलने के बारे में सोचना आरंभ कर दिया था। लेकिन सफलता कड़ी मेहनत से ही मिली। न्यूजीलैंड के मार्केव्ल मैक्सकिल का पूरा परिवार दृष्टिबाधित क्रिकेट खेलता है और उसे यह क्रिकेट आसान लगता है। पूर्ण दृष्टिबाधित क्रिकेटर प्रवीण शंकर के लिए यह बहुत कठिन है और उनको कड़ी मेहनत करनी पड़ती है।

दृष्टिबाधित क्रिकेटर देश के लिए जज्बा पैदा कर सकते हैं। भारत और पाकिस्तान के फाइनल मैच के दौरान स्टेडियम में दर्शकों का उत्साह देखते ही बनता था। वे कृपादृष्टि के नहीं, गर्व के पात्र हैं। कुशलता के बिना कोई भी दृष्टिबाधित और कमजोर नजर का व्यक्ति इस खेल को नहीं खेल सकता है। सचिन तेंदुलकर भी इसे कौशल और कड़ी मेहनत का खेल मानते है और उन्होंने बताया कि वे इससे काफी कुछ सीखे हैं। दृष्टिबाधित क्रिकेट को भी ब्रांड बनाए जाने की जरूरत है। इससे ज्यादा से ज्यादा प्रचारित करने की जरूरत है। यह तभी हो सकता है जब सब लोग इसके प्रति नजरिया बदलें और इसे सामान्य क्रिकेट से अलग करके देखें। इसकी कामयाबी को ब्रांड रूप में प्रचारित करने से इस खेल को ताकत मिल सकेगी।