हेमंत कुमार पारीक

वह हमेशा मेरे पैसे से चाय पीता था। उस दिन मैंने चाय को कहा तो बोला, ‘आज चाय नहीं, कॉफी होगी।’ मैंने उसे आश्चर्य से देखा। एकाएक उसके व्यवहार में परिवर्तन! उसने कॉफी की बात क्यों कही? कोई विशेष बात तो होगी। मेरी सवालिया नजरें पढ़ कर वह धीरे से मुस्कराया, ‘जनाब, आज कॉफी मेरी तरफ से!’ ‘कोई विशेष बात?’ मैंने कहा तो वह बोला, ‘हो सकती है।… दरअसल, मैंने चाय पीना छोड़ दिया है। अब से कॉफी पीना शुरू कर दिया है।’ मैं चुप था। आगे क्या कहता! अनुमान भी नहीं लगा सकता था कि उसके चाय से कॉफी पर शिफ्ट होने की असल वजह क्या है?

स्कूटर स्टार्ट होते ही वह पिछली सीट पर जम गया। बोला, ‘आज काका (चाय वाले) के यहां नहीं चलेंगे।’ ‘तो फिर?’ ‘विंड ऐंड वेव में…!’ मेरी इच्छा हुई कि स्कूटर रोक कर उससे पूछूं, शायद कोई बड़ी वजह हो गई। कोई लाटरी निकली है या कहीं से गड़ा हुआ धन मिल गया है। उसमें ऐसा परिवर्तन पिछले बीस वर्ष में पहली बार देख रहा था। ध्यान में आया कि आज वह सूटेड-बूटेड, टाई वगैरह में आॅफिस आया है।
वह पिछली सीट पर मौन बैठा था। उसके इस अजीबोगरीब रवैए से मैं अंदर तक अपमानित-सा महसूस कर रहा था। कभी सोचता, होता है। कभी विचार आता, देख दिनन के फेर, तो कभी अपने आपको सांत्वना देता, चूहे को चिंदी मिल जाए तो बजाज बन जाता है। यह सब अपने आपको समझाने वाली बातें थीं। मगर यथार्थ तो यथार्थ होता है। वह यथार्थ की जमीन पर खड़ा था। जो कल था वह आज नहीं।

कुछ आगे बढ़े तो बोला, ‘मैंने सफारी खरीदी है।’ उसे लगा कि सुन कर मैं चौंकूंगा और इस काम के लिए उसे दाद दूंगा या अपने आपको हीन समझने लगूंगा। शायद वह मुझे हीनता का बोध कराना चाहता था। मैंने लापरवाही से जवाब दिया, ‘अच्छी बात है।’ वह फिर मौन हो गया।
रास्ते में बूंदाबांदी शुरू हो गई। मैंने स्कूटर रोका और कहा, ‘यहीं भारत भवन में पी लेते हैं कॉफी।’ उसने मुंह बनाया, कई बार पी चुका हूं जनाब! आपको बता दूं अभी, कुछ दिन पहले मैं बांबे गया था। वहां के पांच सितारा होटल में रुका था। मालूम है, वहां की एक कॉफी की कीमत?’ ‘नहीं…। कभी इतने ऊंचे होटल में रुकने का सौभाग्य ही नहीं मिला मुझे। मगर गए क्यों थे?’ ‘बड़े बेटे को नौकरी ज्वाइन कराने।’ ‘कहां लगी है उसकी नौकरी?’ ‘मर्चेंट नेवी में।’… थोड़ा फूल-सा गया वह। तभी पानी हल्का हुआ और वह बोला, ‘चलो जल्दी करो।’ ‘कहीं जाना है क्या?’ ‘हां, मेहमान आने वाले हैं।’ इसके बाद मैंने कोई सवाल नहीं पूछा। स्कूटर को तेज दौड़ा दिया।

हम दोनों बाहर सड़क पर आ गए थे। सामने विंड ऐंड वेव का बोर्ड चमक रहा था। स्कूटर पार्किंग में खड़ी कर होटल की ऊपरी मंजिल पर एक टेबल पर जा बैठे। सामने फैला तालाब था। तालाब में कश्तियां तिर रही थीं और हवा के झोंके तेज हो रहे थे। ठंडी-ठंडी हवा चेहरे से टकरा रही थी। तभी बैरा आ पहुंचा। आर्डर देने के लिए मैंने मेनू कार्ड उठाया ही था कि उसने मेरे हाथ से झपट लिया, ‘आज आर्डर मैं दूंगा।’ बैरे की तरफ देखते हुए बोला, एक कटलेट लगा दो…। और फिर मेरी तरफ मुखातिब हुआ, ‘जनाब, आप क्या लेंगे?’ मैंने कहा, ‘ज्यादा कुछ नहीं, मैं तो सिर्फ इडली खाता हूं।’ ‘मगर कभी कटलेट खाकर तो देखिए! जिंदगी में हर चीज को मजा उठाना चाहिए।’ मैंने कोई जवाब नहीं दिया तो वह बैरे से बोला, ‘दो जगह कटलेट लगा दो।’

मेनू कार्ड पन्ने पलटते हुए बोला, ‘आपने मेरी नई कार के विषय में कुछ नहीं पूछा?’ ‘क्या पूछता मेरे पास अभी तो वही पुरानी मारुति एट हंड्रेड है। खटारा हो गई है। सफारी तो मंहगी कार होती है।’ उसका सीना फूल गया था। शायद मैं उसे जर्रा नजर आ रहा था। बोला, अगली दफे आप मेरे साथ कार में आएंगे। देखिए, स्कूटर देख दरबान ने कोई तवज्जो नहीं दी, वरना तो बड़ी-बड़ी गाड़ियों से आने वालों को दो-दो दफे सैल्यूट मारता है। हर आदमी का अपना लेवल होता है। यह मैंने पांच सितारा में देखा है। एक बार वहां चाय पीने के बाद कोई दोबारा साधारण से टपरे पर चाय पीना पसंद नहीं करेगा।’

उसे लगा कि मैं पूरी तरह सरेंडर हो गया हूं। सो, विषय बदलते हुए बोला, ‘यहां तक की मेरी यात्रा बड़ी कठिन रही है। आज मेरे पास सब कुछ है। पॉस कॉलोनी में मेरा बंगला है, आपको मालूम है?’ अनभिज्ञता से मैंने सिर हिलाया। ‘मुझे नहीं मालूम। अभी तक तो यही पता है कि तुम हॉस्टल के कैंपस में दो कमरों के क्वार्टर में रह रहे हो।’ ‘हां, पर मैंने अपना बंगला किराये पर उठा दिया है। पता है, उसका किराया?’ ‘नहीं..। मुझे तो यह भी नहीं मालूम कि इस शहर में तुम्हारा भी कोई मकान है?’ वह हल्के से मुस्कुराया, ‘जनाब, अक्सर जो दिखता है वह होता नहीं और जो होता है वह दिखता नहीं। अच्छा, अंदाजा लगा कर बताइए कि कितना किराया हो सकता है?’ ‘कैसे बता सकता हूं। अभी तक मैं खुद किराए के मकान में रहता आया हूं।’ ‘फिर भी..। आप तो किरायेदार है?’ ‘मगर सरकारी मकानों का किराया नॉमिनल होता है। लेकिन उसके मार्केट रेट तय हैं।

उन्हीं के अनुसार बता सकता हूं कि जिस मकान में मैं रहता हूं उसका मार्केट रेट लगभग बारह हजार है।’ ‘बस!’ उसने जेब से बेहतरीन क्वालिटी का चश्मा निकाला और आंखों पर चढ़ाते हुए बोला, ‘मेरे मकान का किराया है तीस हजार!’ ‘फिर तुम इस सड़ियल से मकान में क्यों रह रहे हो? तुम्हें तो वहां होना चाहिए। और वह सफारी इन सफेद पीले झुग्गीनुमा मकानों में क्या शोभा देगी?’ ‘आदमी को सुविधानुसार रहना चाहिए जनाब। अब देखिए, तीन-तीन बच्चे पढ़ने वाले हैं। आसपास उनके कॉलेज हैं। इधर-उधर चारों ओर मार्केट है। बस स्टैंड और स्टेशन करीब हंै। अगर मैं वहां शिफ्ट हो जाऊंगा, तो इतने खर्चे तो और बढेंगे। इसलिए सोच रहा हूं कि रिटायरमेंट तक यही रहंू। ‘मैंने कहा, यह भी ठीक सोच है। फिर सफारी की जगह मेरी गाड़ी जैसी पुरानी गाड़ी ले लेते, तो ज्यादा बेहतर होता। गुदड़ी में लाल जैसी बात हुई न! माहौल के हिसाब से रहन-सहन हो तो ज्यादा बेहतर होता है।…

तब तक बैरा ट्रे में कटलेट ले आया। उसने प्लेट से छुरी-कांटे उठा लिए और आहिस्ता-आहिस्ता कटलेट के टुकड़े करते हुए बोला, ‘देखिए, सफारी आने से मेरी कितनी शान बढ़ गई है। जो मेरे आसपास रहते हैं वे सपने में भी नहीं सोच सकते।’ ‘मगर भाई, एक बात अभी तक मेरी समझ में नहीं आई कि इतनी जल्दी आपके रहन-सहन में परिवर्तन कैसे हुआ?’ वह हंसा। यह सब ऊपर वाले की मेहरबानी है।’ ‘तो क्या वाकई कोई लाटरी लग गई है या गड़ा हुआ धन मिल गया है?’ ‘ना-ना यह सब मेहनत और दिमाग का खेल है।’ ‘मेहनत तो हम लोग भी करते हैं, मगर हमारे साथ तो ऐसा कुछ हुआ नहीं? तुम्हारी मेहनत और हमारी मेहनत में कोई खास फर्क है?’ ‘मैने गरीबी देखी है। आपको पता नहीं, मैं ऐसे गांव से हूं, जहां सिवाय साईकिल और बैलगाड़ी के दूसरा कोई साधन नहीं है। वहां सिर्फ प्राथमिक शाला है। अब सोचिए मैंने बीए, एलएलबी कैसे किया होगा?’ ‘मैं कैसे बता सकता हूं? तुम्हारी तरह मैंने भी गरीबी झेली है। पर हां, वहां कॉलेज भी थे और आने-जाने के साधन भी…।’

उसने दूर क्षितिज में देखा कांटे और छुरी को प्लेट में रखते हुए प्लेट आगे सरका दी। आंखों में आंसुओं की एक पतली रेखा दिखी। एक ठंडी सांस लेते हुए बोला, ‘सर, मैं केवल तीसरी कक्षा तक पढ़ा हूं। एक मौन-सा छा गया। मैं लगातार उसकी टाई को देख रहा था। अंतत: मैंने ही मौन तोड़ा, ‘तो फिर तुम यहां तक कैसे पहुंचे?’ ‘सारे एक्जाम प्रायवेट पास किए हैं। घर में खाने को नहीं होता था। तीन-तीन छोटे भाई थे। ग्रेजुएट होते ही सिंचाई विभाग में नौकरी लगी थी। बस, वहीं से मेरा भाग्योदय हुआ। मैंने बहुत कमाया। तनख्वाह तो बहुत कम थी। इतनी कि दाल-रोटी चल सके।’ ‘तो फिर इतना सब कुछ?’ मैंने सवाल किया तो अचानक उसकी आंखें चमकने लगीं। ‘वहां छोटा बाबू था। सच कहूं तो मस्टर रोल मेरे पास होता था। अपने, बड़े बाबू और अफसरों के लिए मैंने उसे भरना शुरू किया। दो मजदूरों की जगह बीस भरता था। डीजल-पेट्रोल बाजार में बेच देता था। दस वर्ष मैंने यही किया और भी दीगर काम थे। इतनी सफाई से काम किए कि कोई पकड़ नहीं सकता था। दनादन लक्ष्मी की आवक होने लगी। पैसा इकट्ठा होने लगा। उसी से मैंने अपने गांव में दस एकड़ जमीन खरीद ली। और फिर मेरी गाड़ी चल निकली।’

‘लेकिन वहां से नौकरी छोड़ कर यहां क्यों आए?’ मेरा सवाल सुन उसने एक लंबी सांस ली, बड़ी कहानी है जनाब। हमारा इंजीनियर घोटाले में फंस गया। उसके घोटाले बड़े लंबे-चौड़े थे। लाखों के माल पर हाथ साफ किया था उसने। उन बड़े घोटालों में मेरे ये बहुत छोटे थे, ऊंट के मुंह में जीरे के समान। आपको पता है, उसके घर से सोने के सिक्के पकड़े गए थे। नौकर के भरोसे घर छोड़ कर तीर्थाटन को गया था। नौकर ने चोरी की। पुलिस की गिरफ्त में आया, तो उसने सब कबूल कर लिया। उस समय तक मैंने नौकरी छोड़ने में ही अपनी भलाई समझी और यहां चला आया।’ वह धीरे से हंसा, जनाब, डूबते जहाज से सबसे पहले चूहे ही भागते हैं।’ इतना कह वह इतनी जोर से हंसा कि उसका पूरा शरीर हिचकोले खाने लगा। आसपास बैठे लोग उसकी तरफ देखने लगे थे। बैरा भी चौंका। वह तेजी से हमारी तरफ आया, ‘सर क्या हुआ… और कुछ लाऊं?’ उसने बैरे को देखा और बोला, ‘कॉफी ले आओ।’ आर्डर मिलते ही बैरा चला गया।

शाम ढलने लगी थी। मैं अपनी कुर्सी पर असहज हो गया। मेरे मन में भी कुछ-कुछ चलने लगा था। सोच रहा था कि वास्तव में ईमानदारी केवल एक शब्द है, फुसफुसा-सा शायद बेईमान लोगों ने गढ़ा है, ताकि उनके हिस्से में किसी और की भागीदारी न हो। सड़क पर लड़ते कुत्ते याद आने लगे मुझे, जो एक रोटी के टुकड़े के लिए, एक-दूसरे की जान के प्यासे हो जाते हैं। वह चुप था। सारा कुछ मुझे बताकर वह खाली हो चुका था और शायद सोच रहा था कि उतावलेपन में उसने कितनी बड़ी मूर्खता कर डाली है। फिर भी उसके चेहरे पर पछतावे के भाव नहीं थे।
मैंने फिर सवाल किया, ‘मगर कल तक तो तुम चाय पीते थे। काका की दुकान के समोसे के लिए गिड़गिड़ाते थे और अब यह कॉफी और कटलेट! ये सूट-पैंट, टाई और सफारी?’

सारा कुछ खाली हो चुका था उसके अंदर का। अब बचा क्या था? बोला, ‘संस्था के पेयजल मिशन में भी मेरी वही कलाकारी काम आई। आज भी रिकार्ड उठा कर देख लें तो ढूंढ़ नहीं पाएंगे कि दाल में कहां काला है। देखिए, बिलकुल पाक-साफ हूं।’ ‘मगर सफारी का राज क्या है?’… तभी बैरा बिल ले आया था। उसने पर्स निकाला। मैंने देखा लबालब भरा था पांच सौ और दो हजार के गुलाबी नोटों से। कम से कम मेरे अनुमान से बीस-पच्चीस हजार तो होंगे। पर्स देख मैं दबने लगा था। मैंने अपनी पिछली जेब को हल्के से टटोला, लेकिन उसे आभास नहीं होने दिया। जबसे नौकरी में हूं, एक पर्स भी नहीं रखा। कुछ चिल्लर और पांच सौ के एक नोट के आगे नहीं बढ़ पाया था। पर्स रखने वाले के सामने अक्सर बौना हो जाता था। लेकिन ऐसी स्थिति कभी नहीं बनी कि सामने वाले के पर्स के आगे दब गया होऊं। उसने ट्रे में पांच सौ का नोट रखा और बैरे से बोला, ‘बाकी तुम्हारी टिप!’

पांच सौ का नोट देख मेरे होंठ सूखने लगे थे। चार सौ रुपए की टिप रख कर उसने हमेशा के लिए मुझे दबा दिया था। टिप तो मैं भी देता हूं, पर ज्यादा से ज्यादा दो या पांच रुपए की, जो चिल्लर बच जाती थी, वह टिप के काम आती थी।
वह उठने का उपक्रम करने लगा, तो मैंने आखिरी सवाल किया। सफारी का राज तो तुमने बताया नहीं भाई?’ वह फिर हंसा। बोला, जो दस एकड़ जमीन मैंने कभी ली थी, वह सत्तर एकड़ हो गई और वहां से नेशनल हाइ-वे निकल रहा है। उस जमीन में से पांच एकड़ का टुकड़ा प्राइवेट कॉलोनाईजर को बेच दिया है। वही पैसा है। यह बंगला और गाड़ी सरकार की ही देन है।’ ‘मगर यह सब तो बेईमानी हुई?’ ‘ईमानदारी एक भ्रम है जनाब!’… वह मुझे मूर्ख समझ व्यंग से मुस्कुराया, आम लोगों के लिए रचा गया शब्द है। इतने बड़े-बड़े नेता और उद्योगपति हैं, क्या ये सब ईमानदारी से इतना आगे निकले हैं? कहूं तो बेइमानी के इतने बड़े मरुस्थल से मैं रेत के दो-चार कण ही उठा के लाया हूं। और देखना, रिटायरमेंट के बाद अगर कोई आपसे पूछेगा कि इतने सालों सेवा का क्या नतीजा निकला, तो आप कहेंगे- खाली हाथ! और मेरे चेहरे पर संतोष की रेखाएं होंगी।’ इतना कह वह उठ खड़ा हुआ।

मेरा मन नहीं था। शायद उसके पर्स ने इतना दबा दिया था कि उसके भार से मैं चाह कर भी कुर्सी से नहीं हिल पा रहा था। मेरी मन:स्थिति भांप ली थी उसने। बोला, ‘जनाब, क्या रात भर यहीं बैठने का इरादा है?’ ‘नहीं तो…।’ इतना कह मैं भी उठ गया था।
वह आगे-आगे चल रहा था। चाल में ऐसी अकड़ थी, जिसे मैंने पहले कभी देखा नहीं था। सड़क पर आते ही मैं स्कूटर की तरफ बढ़ने लगा, तो उसने टोका, ‘अरे जनाब, चलिए तालाब में बोटिंग का लुत्फ उठाते हैं। मौसम कितना खुशगवार है!’ मुझे लगा कि उसके मन में अब भी कुछ बाकी है, जो वह कह देना चाहता है। मुझे पूरी तरह कुचल कर रख देने की मंशा आज वह पूरी करना चाहता है। मैं उसके पीछे-पीछे चल रहा था। ऐसा पहली बार हो रहा था। उसने लीड ले रखी थी। शायद अपने अंदर दबी हीन भावना को पूरी तरह खत्म कर देना चाहता था।

मौन तोड़ते हुए वह बोला, ‘मैंने सुना है कि आपका बेटा विदेश गया है?’ मैंने सहज भाव से कहा, ‘हां।’ ‘कितना पैसा लगा?’ ‘कुछ नहीं। वह अपने बूते गया है। उसे स्कॉलरशिप मिली है। अब मेरे पास इतना माल तो था नहीं कि विदेशी यूनिवर्सिटी में पढ़ा सकूं।’ ‘ये बात तो है जनाब। लेकिन आजकल विदेश जाना कोई बड़ी बात नहीं है। पहले बांबे जाना ही विदेश जाने जैसा था। मेरा एक रिश्तेदार घर से भाग कर बांबे गया था। कुछ सालों बाद लौटा तो उसके स्वागत के लिए पूरा गांव इकट्ठा हो गया था। मगर अब विदेश जाना बांबे जाकर लौट आने जैसा है। मेरे पहचान वालों के दोनों बच्चे विदेश में हंै। ग्रीन कार्ड भी मिल गया है उन्हें। क्या आपका बेटा वापस लौटेगा?’ ‘कह नहीं सकता कि उसकी क्या मंशा है? कैसे बता सकता हंू?’ ‘फिर भी…।’ ‘अगर जॉब मिल गया तो वहीं रुकेगा, मगर मैंने तो जिसे भी देखा वह लौट कर नहीं आया। ऐसा क्या है विदेश में कि जो जाता है वह वापस नहीं आता।’ ‘शायद वहां का रहन-सहन और मौलिक सुविधाएं, जो यहां हमें बड़ी मुश्किल से मिलती हैं।’

इसी बीच मैंने देखा एक भिखारीनुमा बच्चा हमारी बातें गौर से सुन रहा था। शायद हमारी बातें खत्म होने के इंतजार में अपनी हथेली खुजा रहा था और बारी-बारी से कभी उसे देखता तो कभी मुझे। शायद वजन टटोल रहा था कि कौन-सा शख्स वजनदार है, जिसके आगे खाली हाथ फैला कर उसे निराश नहीं होना पड़ेगा। इससे पहले कि बच्चा हथेली आगे करता, उसने जोर से डांटा, ‘चल भाग यहां से! चले आते हैं कहां-कहां से।’ बच्चे का चेहरा भावशून्य था। वह पलट कर खड़ा हो गया। वहां दो अन्य लोग बातें कर रहे थे। एक के मुंह में सिगार फंसा था। वह पुन: विषय पर आ गया। मानो मन में फंसे कांटे को निकाल कर जला देना चाहता हो। बोला, ‘मैं भी अपने बच्चों को विदेश भेजना चाहता हूं। हालांकि टैलेंट तो है नहीं। एवरेज हैं।’ ‘फिर?’ मैंने पूछा तो उसके माथे पर चिंता की रेखाएं दिखीं। मुस्कुराया, ‘मेरी कमाई का पैसा कब काम आएगा? आजकल पढ़ाई-लिखाई भी व्यापार हो गई है। मैं अपने बच्चों का हार्वड यूनिवर्सिटी में दाखिला कराऊंगा।…’ मैं उसे देख रहा था और वह जेब में हाथ डाले हल्के-हल्के मुस्कुरा रहा था।