प्रमोद द्विवेद
वह आम गिलास ही था। पर उसे हर बार साफ कर आंगन में बनी अलमारी में छिपा कर रख दिया जाता था। उसका बाकायदा नामकरण हो गया था- चचा अंसारी का गिलास। को अम्मा गिलसिया कहती थीं। इसका आकार चाय वाले गिलास से थोड़ा बड़ा और शरबत वाले गिलास से थोड़ा छोटा था। थोड़ा मोटा था। इसलिए कई साल से सलामत था। इलाहाबाद में महीने में दो-तीन बार चचा हमारे घर में आते थे। आते ही पहले उनकी रवायती खंखार बता देती थी कि चचा अंसारी तशरीफ ला रहे हैं।
इलाहाबाद में (तब प्रयागराज नहीं था) महीने में दो-तीन बार चचा हमारे घर में आते थे। आते ही पहले उनकी रवायती खंखार बता देती थी कि चचा अंसारी तशरीफ ला रहे हैं। आते ही हमारी अम्मा से उनकी एक ही फरमाइश होती- भाभी अदरक वाली चाय बना दो। फटाफट निकलना है पेमेंट लेने के लिए।
तूफानी गति से काम होता। अदरक वाली चाय बनती। पत्तल वाली प्लेट में इलाहाबादी नमकीन या प्रख्यात हरिराम के समोसे रखे जाते। और फिर निकलता वह गिलास जिसमें रखी चाय देखकर चचा मुस्कराते और कहते भाईजान सही सलामत हैं। चचा को कभी नहाते-धोते नहीं देखा। शायद उनके पास वक्त ही नहीं होता था। वैसे भी वे इतने गोरे कि बिना नहाए चमक मारते रहते थे।बहरहाल हमारी समझ में कभी नहीं आया कि यह गिलास की क्या माया है।
गिलास की चाय फटाफट सुड़क कर वे कीटगंज और जानसेन गंज की तरफ निकल जाते। फिर वहीं से कानपुर। कानपुर के चमनगंज में उनका घर था। वहां फय्याज अहमद अंसारी के नाम से हर कोई वाकिफ था। कानपुर-लखनऊ रूट पर उनकी गरीबनवाज बस सर्विस थी। साथ ही वे ठेकेदारी का काम करते थे। किस चीज का ठेका था, यह हमें कभी पता नहीं चल पाया।
पर इतना जानते थे कि उनके पायजामे की साइड जेबें नोटों से भरी रहती थी। हाथ में एक ब्रीफकेस होता जिसमें एक जोड़ी कुर्ता-पायजामा, तौलिया और साबुन होता। चचा हर मौसम में समाजवादी टोपी पहनते थे। सर्दी में वे बंद गले के कोट और ऊनी पैंट में आ जाते। दाढ़ी कभी नहीं रखी, इसलिए नाम बताने पर ही पता चल पाता कि वे अंसारी मुसलमान हैं। कद उनका लंबा था। नशे के नाम पर एक ही शौक था मैनपुरी तंबाकू का।
मयपरस्ती के लिए उन्होंने एक-दो कायस्थ दोस्त बना रखे थे। हमारे घर जब भी आते, वे अम्मा से यही कहते- भाभी अपने पास बहुत पैसा है, चिंता मत करना। ठाकुर से कह दिया है कि नौकरी से निजात पाने के बाद कानपुर में ही घर बनाना। अम्मा की एक ही रट होती- भइया, कानपुर में संगम-त्रिवेणी थोड़ो है।
इतने पैसे होने के बावजूद चचा इलाहाबाद के किसी होटल में नहीं रुकते। अटाला में उनकी रिश्तेदारी थी। वहां भी नहीं जाते। शायद उनको वहम था कि सबकी नजर उनके पैसे पर रहती है। इसीलिए उनका डेरा एक ही जगह था-हमारा घर। वजह यह भी थी कि जब भी डग्गामारी में उनकी कोई बस पकड़ी जाती, हमारे पिताजी उनका संकट दूर करते।
पिताजी विकास प्राधिकरण के आला अफसर थे। डीएम, एसपी से लेकर आरटीओ दफ्तर तक उनकी पहुंच थी। किसी भी काम के लिए एक फोन ही काफी होता था। ऐसा हर संकट पार होते ही हमारे घर में मेवा-मिठाइयों का ढेर लग जाता। चचा अंसारी का कोई कारिंदा दे जाता एक लिफाफे के साथ। उसका इस बात पर जोर होता कि तोमर साहब को चचा ने सलाम भेजा है।
पिताजी के दफ्तर से लौटते ही हमसे पहले ही अम्मा उन्हें बता देती- चचा अंसारी का सलाम धरा है लिफाफे में। मिठाई भी आई है। वे मूंछों में मुस्कान भरते हुए हल्का सा झिड़कते- अरे जाओ, अपना काम करो…। फिर वह लिफाफा उनके साथ ही ऊपर वाले कमरे में चला जाता, जहां उनका रिवाल्वर, विवेकानंद साहित्य और डिप्लोमैट की बोतलें वास करती थीं।
शाम को आधे घंटे वहीं बिताकर लौटते। लौटते तो उनकी बुंदेली भाषा अंग्रेजी में तब्दील हो जाती। अम्मा से भी कहते- हाऊ आर यू मिसेज सविता तोमर…आई एम वेटिंग फार…। और इससे पहले ही उन्हें स्त्रियोचित जवाब मिलता- बस, दुई कुल्ला में जार्ज पंचम बन गए।इसके बाद वे हमारी भाभी से थोड़ा अंग्रेजी बोलते, जो लखनऊ से पढ़कर आई थीं। और जैसे-जैसे सुरूर छंटता वे वापस हिंदी प्रेमी हो जाते।
जैसा हमने सुन रखा था- चचा अंसारी से उनकी दोस्ती बहुत पुरानी थी। दोनों कानपुर के बीएनएसडी में साथ पढ़े। एक साथ लफंगई की। वे अकबर के भक्त थे। ये राणा प्रताप के। इस बात पर दोनों अक्सर लड़ जाते कि कौन बहादुर था। कुश्ती से फैसला होता। कभी अकबर जीतता तो कभी राणा प्रताप। फिर इस बात पर भी मंथन होता कि अकबर की महारानी तो जोधा बाई थीं। अकबर तो टीका लगाता था। तुलादान करता था। मगर औरंगबेज पर आते-आते सब कबाड़ा जाता। इस झगड़े ने दोनों को छोटा-मोटा इतिहासकार बना दिया था। कई बार झगड़े का अंत तोमर साहब के इस जुमले से होता- तुम *** ने देश बरबाद कर दिया। *** सैंतालिस में पाकिस्तान चले जाते तो *** सारा टंटा खत्म हो जाता…।
इस हिंदुआने शिकवे पर अंसारी हंसता और कहता- चलो छोड़ आओ। और ठाकुर नरेंद्र सिंह तोमर माथा पीट कर रह जाता और दूसरे दिन उनकी यारी नए एजंडे के साथ शुरू होती। समय के साथ दोनों के रास्ते अलग हो गए। पिताजी पढ़ने के लिए इलाहाबाद आ गए और चचा अंसारी अपने खानादानी बस के काम के साथ काबुल से हींग लाकर बेचने से लेकर ना जाने कितने धंधे में लग गए।
पिताजी से उनकी दोस्ती का इम्तहान उस दिन हुआ जब उनका चौथे नंबर का लड़का सलमान बाराबंकी की शिया लड़की को भगा लाया। बाराबंकी और लखनऊ के शिया लड़के के खून के प्यासे थे। चमनगंज में उनके मुहल्ले के लोगों ने भी साथ नहीं दिया। काजी सलामत खान ने भी कह दिया कि अभी लखनऊ के मोहर्रम की आग ठंडी नहीं पड़ी है। तुम उनकी लौंडिया लाकर नया बवाल करना चाहते हो।
हारकर चचा दबंग अफसर बन चुके पिताजी की शरण में आए। कानपुर में रज्जन दुबे भट्टेवाला की मदद से दस राइफलों का इंतजाम हुआ और सचमुच संगीनों के साए में देवनगर की एक गली में एक पंडित जी के घर में चुनिंदा मेहमानों के बीच निकाह हुआ। लड़की के घर से सिर्फ मां-बाप आए थे। बस, यह पहला ऐसा निकाह था जिसमें सारे व्यंजन तिवारी रेस्टोरेंट से आए थे। मेहमानों से वादा किया गया था कि खुदा ने चाहा तो अगली दावत लखनऊ में होगी।
यह चचा का बहुत बड़ा संकट था। पिताजी ने इसे चुटिकयों में हल कर दिया। यही नहीं, इस प्रकरण ने दोस्ती की ऐसी बुनियाद बनाई, जिसे कोई समाजशास्त्र नहीं हिला सकता था।समय के साथ चचा का कारोबार बढ़ता गया। पिताजी कई प्रमोशन पाकर आखिरी पोस्टिंग पर इलाहाबाद में थे।
हम मेरठ, गाजियाबाद कहीं भी रहे हों, चचा बिना बताए आ धमकते। मिठाइयों का ढेर लग जाता और सबके हाथ में सौ-सौ रुपए थमाकर दो घंटे में निकल जाते। वे हमारे यहां खाना नहीं खाते थे। क्योंकि चक्कर हमेशा बर्तनों का होता था। चाय पीते थे, उसी गिलास में जो बाकायदा संभालकर रखा जाता था। पिताजी की बदलियों के साथ ही यह गिलास सफर करता था।
अब यह गिलास इलाहाबाद में था। जार्जटाउन में हमारा घर था। एलाटमेंट कोटे में होने के कारण इस घर के पांच कमरे हमारे पास आ गए थे। मकान मालिक शंकर लाल हजेला एजी आफिस से रिटायर हुआ था। उसे डर था कि उसका घर हाथ से ना निकल जाए। पिताजी के पास ठाकुर-ब्राहमण बदमाशों की हाजिरी लगती थी। मौला-भुक्खल के नाम पर पूरे इलाहाबाद में गुडंई करने वाले उनके पैर छूते थे।
एक दिन बूढ़ा हजेला पिताजी के पैर पकड़कर फरियाद करने लगा- तोमर साहब, यह घर ही मेरी कमाई है। मेरे बच्चों पर कृपा करना। पिताजी ने राजपूती अदा के साथ वादा किया कि यह घर आपको वापस मिल जाएगा। लेकिन जब तक नौकरी है, यहीं रहूंगा।
नौकरी में पिताजी का आखिरी साल था। वे गांव में खेती खरीदते जा रहे थे। हम दोनों भाई भी नौकरी में थे, इसलिए उन्हें ज्यादा चिंता नहीं थी। भाभी भी डीपी कॉलेज में लग गई थीं। आजकल चचा अंसारी के इलाहाबाद दौरे बढ़ने लगे थे। उन्होंने बताया कि बस के धंधे में अब पहले जैसी कमाई नहीं रही। लखनऊ में नई सरकार आने के बाद सख्ती बढ़ गई है। करेली के पास हमारी पहले से काफी जमीन पड़ी थी। अब वहां पर फ्लैट बनाने में जा रहे हैं। लड़के भी इस काम में लग गए हैं। अफगानिस्तान से हींग लाने में भी ज्यादा मुनाफा नहीं रहा। नकली हींग के कारोबार में ही कमाई है।
इस बार इलाहाबाद में कुंभ मेले का पूरा भार जैसे पिताजी पर ही था। रात देर से आते और सुबह ही निकल जाते। लेकिन इस मेले ने चचा की चांदी कर दी। तगड़ी कमाई हुई थी। पिताजी ने सीमेंट और मोरंग का ठेका उन्हें दिलवा दिया था। इस मेले के फौरन बाद ही पिताजी ने कानपुर में कल्याणपुर के पास एक प्लॉट खरीद लिया। शायद उन्होंने कानपुर में रहने का मन बना लिया था।
कुंभ मेला खत्म होते ही पिताजी को सरकार ने रिटायरमेंट के दिन ही एक्सटेंशन का प्रस्ताव दिया। मेले में उनकी शानदार सेवाओं के कारण उन्हें यह इनाम दिया जा रहा था। पर उन्होंने मना कर दिया। अब वे कानपुर में सुकून के दिन काटना चाहते थे। साथ ही बिठूर में और जमीन लेकर आर्गनिक खेती करने का इरादा था।
दफ्तर में आज पिताजी के रिटायरमेंट की पार्टी थी। वैसे तो सारा इंतजाम कर्मचारी यूनियन और विभाग की ओर से था। पर विशेष पार्टी का खर्चा चचा अंसारी ने उठाया। पिताजी ने पार्टी में अपने परिवार के सदस्यों के साथ जब उनका परिचय कराया तो जमकर तालिया बजीं। दफ्तर के मोदी समर्थकों ने भी इस भावना की तारीफ की और कहा राष्ट्रवादी लोग ऐसे ही होते हैं।
रात आठ बजे तक हम सब लौटे। रोशनी से भरे रास्ते में पिताजी दिखाते जा रहे थे कि कौन-कौन से पार्क उन्होंने बनवाए। एक बड़े मलबे के ढेर को दिखाकर उन्होंने बताया कि यह अतीक अहमद के आदमियों की अवैध इमारत थी। इसे चार दिन पहले ही मुख्यमंत्री के आदेश पर हमने गिराया।
वे अपनी उपलिब्धयां बताने के साथ ही महमूद बट और भूरेलाल जैसे अफसरों को याद करते जा रहे थे। थोड़ा-सा गमगीन होकर उन्होंने कहा कि सरकार और अफसर चाहें तो दुनिया को बदल दें। पर सिस्टम इतना चौपट है कि सब एक ही धारा में बह जाते हैं। सचमुच हमें लग रहा था कि पहली बार वे बिना पैग लिए इतना भावुक हो रहे हैं। चचा अंसारी भी उनकी हां में हां मिला रहे थे। उन्होंने हम दोनों भाइयों की तरफ देखकर कहा- तुम लोग खुशनसीब हो जो ऐसा बाप मिला।
ऐसे भावुक माहौल में, मुमकिन ही नहीं था कि बोतल ना खुलती। पिताजी ने एलान कर दिया कि आज ड्राइंग रूम में ही बैठक जमेगी। इससे पहले उन्होंने संक्षिप्त प्रवचन दिया कि जीवन में दो पैग से ज्यादा लेना सेहत के लिए ठीक नहीं। अंग्रेज यही करते हैं। यह बात उन्होंने ऐसे कही, जैसे अंग्रेजों के जमाने के अफसर रहे हों।
फिर हमारी तरफ मुखातिब हुए- तुम सब अपने पैरों पर खड़े हो गए हो। अगर चाहो तो इस पार्टी को ज्वाइन कर सकते हैं…। लेकिन अम्मा ने निषेधाज्ञा लगा दी और यह भी कह दिया कि ज्यादा बौराओ नहीं, थोड़ा शरम-लिहाज तो रखो।
पहला प्रस्ताव फेल। दूसरे प्रस्ताव के तहत भाभी को आदेश मिला कि जरा सलाद और अंडे की भुर्जी ले आना। पनीर हो तो नमक डाल कर ले आना, हां खीरा भी। फिर अम्मा की कुड़कुड़ाती आवाज आई- विस्की वाले गिलास कहां धरे हैं। इस पुरअसर आवाज पर चचा अंसारी ने बिना पैग लिए ही जुमला दागा- भाभी हमारा वाला गिलास भी लेते आना। पिताजी मुस्कराए- नहीं, नहीं आज तो हमारा ही गिलास चलेगा। वो भी चांदी वाला, जो महारानी दतिया ने दिया था हमें…।
अरे जाओ, हमारे कमरे की अलमारी से निकालकर लाओ। बड़ा भाई सत्येंद्र दो चमकदार सफेद गिलास लेकर आ गया। बड़े गिलास, जिन पर शानदार नक्काशी थी। पिताजी चचा फय्याज अहमद अंसारी के बेशकीमती गिलास में जानीवाकर की पतली धार छोड़ते हुए बिना नशे के गुनगुना रहे थे- फय्याज तू नया है अभी बात मान ले, कड़वी बहुत शराब है, पानी मिलाके पी।
