मिथिलेश सिंह

आइए पटना चलें। 1977 का पटना। बिहार की राजधानी पटना। जयप्रकाश नारायण का शहर पटना। इसी शहर में गुजरात के रास्ते 1974 में पहुंची थी एक आंधी और उसकी लपटों ने वह किया, जिसकी किसी को कोई उम्मीद नहीं थी। उसने मरकजी हुकूमत की चूलें हिला डालीं। यह वही 1974 था, जिसने समूचे देश में वह आग बोई और चातुर्दिक भ्रष्टाचार के खिलाफ वह माहौल बनाया कि सरकार को इमरजेंसी के सिवा और कोई राह नहीं सूझी और 25 जून, 1975 को आखिर लग ही गई इमरजेंसी। जेलों के दहाने खोल दिए गए, जगहें कम पड़ीं तो शिविर डाले गए, तब भी मुश्किल पेश आई तो गोदामों और बागानों में ठूंस दिए गए लोग।

जेल ले जाए जाते समय जेपी दूर की सोच रहे थे। वे सोच रहे थे कि इंदिरा गांधी का यह फैसला एक तानाशाही मंसूबे की मिट्टी कूटे बगैर नहीं मानेगा कि इस स्याह अंधेरी रात के बाद कांग्रेस का समूल नाश तय है। जेपी सोच रहे थे और दुखी हो रहे थे। समाजवादी होने के पहले आखिर वे भी तो कांग्रेसी ही थे। कांग्रेस को और आजादी की लड़ाई को उन्होंने अपनी जवानी दी थी। पंडित जवाहरलाल नेहरू उन्हें ऐसे ही अपना छोटा भाई थोड़े न मानते थे? नेहरू खानदान से उनकी आशनाई जगजाहिर थी।

जेपी सोच रहे थे- अब यह रिश्ता टूट रहा है। इस रिश्ते में पड़ गई है वह गांठ जिसकी सर्जरी नहीं हो सकती। दोस्त की बिटिया ने मेरा मान नहीं रखा…वगैरह-वगैरह।

असह्य पीड़ा में रेणु
1977 के मार्च महीने में आम चुनाव हुए और वही हुआ जो होना था। कांग्रेस का सात राज्यों में सूपड़ा साफ। यह किसी पार्टी की नहीं, जेपी के बहाने लोकतंत्र की जीत थी। उसके बाद क्या हुआ और क्या-क्या हुआ, यह समूचे देश को पता है। उसी साल के अप्रैल महीने में पटना के बड़ा अस्पताल यानी पीएमसीएच में एक मरीज लाया जाता है। नेपाल के विराट नगर से। विराट नगर में वह बीपी कोइराला का मेहमान रहा। कोइराला परिवार से उसके रिश्ते बिल्कुल घर जैसे थे। वह फरार था इमरजेंसी के दिनों में और पुलिस ढूंढ रही थी, सो भाग आया था नेपाल। अब लौटा है जब तबीयत बेहद खराब है, इमरजेंसी हट चुकी है और चुनाव नतीजे सामने हैं। उसे पेप्टिक अल्सर है। वह मुंह से खून फेंक रहा है। वह लगभग मरणासन्न है।

तय होता है कि आपरेशन करना पड़ेगा। उसकी पत्नी झल्लाती है- जब-जब जाता है कहीं बाहर, बिना बीमार हुए पटना नहीं लौटता यह आदमी। वह झल्ला रही है और मरीज के साथ आए लोगों को डपट रही है। तीमारदार परेशान। मरीज आंखें खोलता है और बंद करता है। तय होता है कि ऑपरेशन डॉक्टर यूएन शाही की टीम करेगी। पास में यूएन शाही भी खड़े। अचकचाए हुए से। हालत इतनी खराब कि पूछिए मत। पहचान पाना तक मुश्किल। अचानक उस मरीज के बेजान से जिस्म में हरकत होती है और शाही चौंक जाते हैं। वो तीखी और सांद्र नजरों से घूरते हुए शाही से पूछता है- पहचाना? मैं…। फिर दर्द से कराहने लगता है। यह रेणु हैं, फणीश्वरनाथ रेणु।

कलम वही, सिपाही नया
रेणु ने हिंदी को ‘मैला आंचल’ जैसा कालजयी उपन्यास दिया, ‘परती परिकथा’ जैसा उपन्यास दिया, ‘ठेस’, ‘पलटू बाबू रोड’, ‘पंचलाइट’, ‘मारे गए गुलफाम’, ‘दीर्घतपा’, ‘ऋणजल- धनजल’ जैसी कभी न भूलने वाली रचनाएं दीं और उम्रभर लड़ते रहे इस चिंता से कि आंचलिकता से इतर मुख्यधारा के कुल-गोत्र में उन्हें शामिल करने से कतराना दानिशमंद कब बंद करेंगे? रेणु हिंदी के पहले लेखक थे जिन्होंने आजाद भारत के गांवों में कस्बे की आहट महसूस की और हिंदी को उसका आसमान दिखाया- फारबिसगंज और औराही हिंगना और कोसी की सरजमीन से।

कल्पना करिए, प्रेमचंद अगर रिपोर्टर होते तो कैसी कॉपी फाइल करते? यकीनन बहुत अच्छी। सधी हुई। कुछ भी छूट न जाने लायक। यही खूबी उनकी रचनाओं में भी दिखती है। लेकिन रेणु के यहां एक चीज और है, जो उन्हें प्रेमचंद से सिर्फ अलगाती है बल्कि खड़ा होने की नई जमीन देती है। प्रेमचंद के यहां गरीबी है तो है, जहालत है तो है, बेबसी है तो है, निजात पाने के तरीके और औजार हैं तो हैं लेकिन संगीत नहीं है। रेणु के यहां हर जगह संगीत है। रुदन तक का संगीत। मौसम तक का संगीत।

कहन का संगीत
‘मारे गए गुलफाम’ के हीरामन के कहन का संगीत अलग तो हीराबाई के कहन का संगीत अलग। हिंदी पट्टी में जीवन के और जीवन की जद्दोजहद के इतने सारे सांगीतिक रंग भी हैं या हो सकते हैं- इस तथ्य की सिलसिलेवार पहचान सबसे पहले रेणु के यहां ही मिलती है और इनका पेटेंट भी रेणु के सिवा कोई दूसरा नहीं करा पाएगा। वे प्रेमचंद के बाद का होते हुए भी कुछ मामलों में प्रेमचंद से आगे के कथाकार हैं। वे उस गांव के कथाकार हैं, उस लोक के कथाकार हैं जिसके अंतरविरोधों पर प्रेमचंद की नजर नहीं गई। जा भी नहीं सकती थी और उसकी वजह भी है। प्रेमचंद गुलाम भारत में लिख रहे थे, रेणु की दुनिया आजाद भारत में आजादी की तलाश करने के जुनून की दुनिया है। ०

ऋणजल-धनजल

बाढ़ और अकाल पर बहुत कुछ लिखा गया और आगे भी लिखा जाता रहेगा लेकिन रेणु ने ‘ऋणजल- धनजल’ में इन दोनों मसलों, खास तौर पर 1975 में बिहार में आई बाढ़ को केंद्र में रखकर जो रिपोर्ताज लिखा, वैसा रिपोर्ताज कहीं और देखने को नहीं मिला। वजह? वजह बहुत साफ है। रेणु उस बाढ़ में अपने को तलाश रहे थे। औराही हिंगना से भागकर काम की तलाश में पटना आए और मीठापुर में जल प्लावन में फंसे उस बच्चे की तरह जिसे सिर छुपाने को एक ठौर चाहिए और अगले दिन काम पर जा सकने लायक सूरते हाल।
रेणु की पारिवारिक पृष्ठभूमि ठीकठाक थी।

ठीकठाक जमीन थी परिवार के पास और जीने के दीगर बहाने भी। फिर उन्होंने लेखक बनना ही क्यों कबूल किया? ठेकेदार नहीं, कंपाउंडर नहीं, मास्टर नहीं, राजनेता नहीं- ऐसा क्या था जो उन्हें लेखक बनने के अलावा और किसी भी काम से रोक रहा था? वह रहा होगा कच्ची उम्र का कोई ऐसा सपना जो रंगमहल बुनता है और जिसका व्यामोह मरते दम छूट नहीं पाता। उस सपने में होते हैं पंख, पंखों पर झूलती हैं जगमग करती झालरें, झालरों पर टंगे होते हैं अबाबील के बच्चे, जिन्हें गिद्धों और बाजों से बचाना होता है। लेखक बनना कुछ ऐसा ही हुआ करता है। क्या ताज्जुब कि हीरामन की आंखों से भी गुजरा हो ऐसा कोई सपना और वह कूद पड़ा हो लड़ने और रचने की दुनिया में अपनी सारी बुर्जुआ जरूरतें, सारी प्राथमिकताएं तज कर।

नेपाली क्रांति का नायक
वे नेपाली क्रांति में कूदे तो हरबा-हथियार के साथ। कमर में पिस्टल और कंधे से लटकता ट्रांसमीटर। पीठ पर भोंपू, हाथ में माइक। कब किसकी जरूरत पेश आ जाए। लड़ते रहे। पटना-नौगछिया और फारबिसगंज से कब वे नेपाल निकल जाएं, उन्हें खुद पता नहीं होता था। नेपाल को अंतत: राणाशाही से मुक्तिमिली और तब कहीं उन्होंने चैन की सांस ली। इसका मतलब समझ रहे हैं आप? मतलब साफ है कि आग के आसपास ही होगा यह लेखक या उसे आसपास ही होना चाहिए आग के। ०

संघर्ष का दाखिल-खारिज
फणीश्वरनाथ रेणु को लोग सिर्फ इसलिए याद करते हैं कि उन्होंने साहित्य पढ़ने वालों को एक बिल्कुल ही नए आस्वाद से परिचित कराया, उन्होंने पाठकों को उस जमीन से परिचित कराया जो शताब्दियों तक हाशिए पर रही। लेकिन यह मूल्यांकन न सिर्फ एकांगी बल्कि बेईमानी भरा भी है। उनकी ताकत यहां नहीं है। उनकी ताकत इस बात में है कि वे अपनी रचनाओं में जरूरी लड़ाइयों को समय-समय पर खारिज भी करते रहे और लड़ते भी रहे। अपने ही कहे को दूसरे पल खारिज करने का इतना दुर्दांत फैसला वही कर सकते थे और वही कह भी सकते थे कि 1947 में मुल्क को जो आजादी मिली, वह फर्जी थी।

उन्हें इस मुल्क की आजादी के नकलीपन पर हमेशा एतबार रहा और यह बात वे बार-बार कहते भी रहे। वे दूसरी आजादी को बेताब थे और जीवित रहते तो जाने कितनी लड़ाइयां और लड़ते आजादी की। जेपी की सदारत में दूसरी आजादी आई तो लेकिन वह भी नकली। दूसरी आजादी का मीन-मेख निकालने, उसमें छेद ढूंढने की मोहलत उन्हें वक्त ने नहीं दी (अप्रैल, 1977 में पीएमसीएच में ही उनका इंतकाल हो गया (ऑपरेशन के कुछ दिनों बाद)। वरना वे और भी तीखे सवाल पूछते और साहित्य को उन नए गुलाग द्वीपों से परिचित कराते जहां लोग लड़ते ही नहीं, लड़ते रहने को ही जीवित रहने की ऑक्सीजन मानते हैं। लड़ना, नए मोर्चों पर लड़ना और लड़ाई को महबूब की तरह चाहना रेणु की फितरत थी।