रविंद्र केलकर- जन्म : 7 मार्च 1925
निधन : 27 अगस्त 2010

रवींद्र केलकर कोंकणी साहित्य के सबसे मजबूत स्तंभ थे। पद्म भूषण से सम्मानित केलकर ने अंग्रेजी, हिंदी, कोंकणी, मराठी और गुजराती भाषा में अनेक कृतियों की रचना की। रवींद्र केलकर का जन्म दक्षिण गोवा के कोकुलिम में डॉ. राजाराम केलकर के यहां हुआ। पणजी में आरंभिक शिक्षा के दौरान ही रवींद्र केलकर 1946 में गोवा मुक्तिसंग्राम से जुड़ गए। इस दौरान वे कई स्थानीय और राष्ट्रीय नेताओं के संपर्क में थे। शिक्षाविद, लेखक और स्वतंत्रता सेनानी लक्ष्मण राव सरदेसाई ने उनके भीतर देशभक्ति को जगाया। उन्हीं दिनों स्वाधीनता सेनानियों ने एक सरकारी स्कूल को जला डाला था और इसमें रवींद्र की गिरफ्तारी हो सकती थी, इसलिए वो भागकर मुंबई आ गए। यहां वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के नेताओं और गांधीजी के संपर्क में आए।

राम मनोहर लोहिया से मिलने के बाद उन्होंने जाना कि जनता को जगाने के लिए अपनी मातृभाषा को माध्यम बनाकर कैसे लड़ा जा सकता है। बाद में वे मुंबई से वर्धा चले आएं। छह साल तक वर्धा में रहते हुए एक पत्रिका का संपादन किया। 1949 में दिल्ली के गांधी स्मारक संग्रहालय में लाइब्रेरियन के रूप में काम करने लगे। देश आजाद हो चुका था, लेकिन गोवा पर अभी भी पुर्तगाली आधिपत्य था। रवींद्र केलकर ने एक साल में ही दिल्ली की नौकरी छोड़ दी और चले पड़े गोवा को आजाद कराने।
गोवा की आजादी
गोवा पहुंचकर उन्होंने गांधीवादी अहिंसक रास्ते से गोवा की मुक्ति के लिए संघर्ष आरंभ किया। उन्होंने जन जागरण के लिए हिंदी, मराठी और कोंकणी में लेख लिखें। मुंबई से उन्होंने ‘गोमांतभारती’ साप्ताहिक पत्रिका निकाली, जो रोमन लिपि में कोंकणी में प्रकाशित होती थी। 1961 में भारतीय सेना ने गोवा को आजाद करा लिया। इसके बाद उन्होंने कोंकणी भाषा और गोवा को महाराष्ट्र से अलग राज्य का दर्जा दिलाने के लिए संघर्ष शुरू कर दिया। उनके आंदोलन का ही परिणाम था कि भारत सरकार ने गोवा को महाराष्ट्र में शामिल करने के बजाय केंद्रशासित प्रदेश का दर्जा दिया।
कोंकणी और गोवा के पूर्ण राज्य के लिए आंदोलन
कोंकणी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने और गोवा को पूर्ण राज्य बनाने के लिए उनका संघर्ष और योगदान अप्रतिम है। 1962 में प्रकाशित उनकी ‘आमची भास कोंकणिच’ पुस्तक से उन्होंने लोगों से कोंकणी भाषा की अस्मिता के लिए आह्वान किया। ‘कोंकणी साहित्य की ग्रंथसूची’ को कोंकणी, हिंदी और कन्नड़ में प्रस्तुत कर उन्होंने सिद्ध कर दिया कि कोंकणी का महत्व स्वीकारा जाना चाहिए। उन्हीं के संघर्षों के फलस्वरूप 1975 में साहित्य अकादेमी ने कोंकणी को स्वतंत्र भाषा के रूप में मान्यता दी। 1987 में जब गोवा को पृथक राज्य घोषित किया गया तो राज्य विधानसभा ने कोंकणी को राज्य की आधिकारिक भाषा स्वीकार किया। यही नहीं, उन्हीं के प्रयासों के फलस्वरूप 1992 में कोंकणी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया।
सम्मान और पुरस्कार
रवींद्र केलकर संघर्षशील और जुझारू कलम के योद्धा थे। कोंकणी में उन्होंने ‘महाभारत’ के दो खंडों का अनुवाद भी किया है। उनके यात्रा संस्मरणों की पुस्तक ‘हिमालयांत’ को 1976 में साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रदान किया गया। गुजराती निबंधकार झवेरचंद मेघानी की पुस्तक का कोंकणी में अनुवाद करने के लिए उन्हें 1990 में दोबारा साहित्य अकादेमी पुरस्कार दिया गया। उन्हें 2006 का ज्ञानपीठ पुरस्कार भी मिला, ऐसा पहली बार हुआ था जब कोंकणी भाषा में लिखने वाले लेखक को यह सम्मान प्राप्त हुआ था। अस्वस्थता के कारण उन्होंने यह सम्मान 2010 में दिया जा सका। 2007 में उन्हें जीवनपर्यंत साहित्य सेवा के लिए साहित्य अकादेमी का फैलो चुना गया और 2008 में पद्मभूषण से नवाजा गया। ल्ल