चंद्र त्रिखा
पड़ोसी पाकिस्तान में अस्मां जहांगीर की मौत पर वहां की सिविल सोसायटी और मानवाधिकारों से जुड़े संगठन बेहद उदास हैं। कट्टरपंथी मुल्लाओं, संवेदनहीन सेना और आतंकी संगठनों के खिलाफ लगातार जूझने वाली आवाज खामोश हो गई है। भारत में उनके निधन पर सत्तापक्ष और विपक्ष के राजनेताओं ने कोई ज्यादा टिप्पणी करना भी मुनासिब नहीं समझा, लेकिन यह एक हकीकत है कि शहीदे-आजम भगत सिंह की स्मारक के लिए और वहां के एक हिंदू इनकम टैक्स इंस्पेक्टर की ईशनिंदा के मामले में हुई हत्या को लेकर अस्मां ने जो तेवर दिखाए, उनके मद्देनजर उन्हें वहां के कछ उन्मादी नेता ‘भारत की एजेंट’ करार देने लगे थे। अस्मां के स्वाभिमानी तेवर उनके मृत्यु पर्यंत कायम रहे। लाहौर में ऐसा पहली बार हुआ, जब हजारों की संख्या में औरतें भी किसी जनाजे में शामिल हुर्इं। और वह जनाजा था अस्मां जहांगीर का। पाकिस्तान में धार्मिक परंपरा है कि किसी भी जनाजे में औरतें शिरकत नहीं कर सकतीं। लेकिन अस्मां अपने जीते-जी मानवाधिकारों के कई योद्धाओं के जनाजों में शिरकत करती रही थीं। इस बार उनके जनाजे में भी सैकड़ों हजारों की तादाद में जब औरतों का हुजूम उमड़ पड़ा तो किसी की हिम्मत नहीं हुई कि उन्हें रोक पाए।
मानवाधिकारों के मामले में एक बार वे अपने देश की सुप्रीम अदालत से भी जूझ पड़ी थीं। तब मामला र्इंट भट्टा मजदूरों के अधिकारों का था। अस्मां अपने साथ उन मजदूरों को भी अदालत में ले गई थीं, ताकि उनकी हालत के बारे में सुप्रीम कोर्ट को आगाह किया जा सके। एक जज ने इस तरह से मजदूरों को अदालत में साथ लाने पर एतराज भी जताया था, क्योंकि उनके कपड़ों से पसीने की बदबू आ रही थी। अस्मां ने तब उस जज की आंखों में आंखें डाल कर कहा था, ‘मैं ऐसे लोगों की असली हालत बयान करने के लिए उन्हें उसी तरह साथ लाई हूं, जिस तरह वे जी रहे हैं। मैं इन्हीं लोगों के लिए लड़ने यहां आई हूं।’ कुछ वर्ष पहले लाहौर से भारत आई डॉ. सईदा दीप ने चंडीगढ़ में बताया था कि वहां अस्मां की फोटो मजदूर-कॉलोनियों में जगह-जगह मिल जाती है, हालांकि उनका संबंध लाहौर के एक बेहद संपन्न और संभ्रात परिवार से था। वे अक्सर वहां के मजहबी जुनूनियों के खिलाफ लड़ती थीं। उन्होंने एक बार कट्टरपंथियों को खुली चेतावनी भी दे दी थी कि ‘अगर तुम लोगों ने मजहब के नाम पर सियासत जारी रखी, तो समझ लो कि तुम ऐसी आग से खेल रहे हो जो तुम्हें भी जलाकर राख कर देगी।’ पाकिस्तान की एक प्रमुख शायरा किश्वर नाहीद ने उन्हें एक कविता के माध्यम से याद किया है और इन दिनों वह कविता वहां के सोशल मीडिया पर छाई हुई है। यह कविता इस तरह से है-
आज लाहौर की बुनियाद और
उसे सहारा देने वाली दीवारों में गहरी दरारें आ गर्इं
वे बर्बर लोग, जो तुम्हारी मौत से
खुश दिख रहे हैंवे तब भी खुश थे, जब
हसन निसार और भुट्टो परिवार खुदा के पास चला गया था
खुदा ने देखा है, उन शैतानों को
जिन्होंने मिशाल और नजीबुल्लाह की जान ले ली थी
और जिन्होंने मासूम बच्चियों का कत्ल कर दिया
और इसके बाद एक-दूसरे को इस शैतानी कृत्य के लिए
मुबारकबाद देते रहे
लेकिन खुदा अन्याय नहीं करता
अमन की शहजादी, तुम काले बादलों से घिरी रहीं
तुम्हारे रास्ते पर जहरीले बल्लम बिछाए गए
मगर तुम आगे बढ़ती रही शहर दर शहर
तुम जब मुस्कराती थीं, परेशान चेहरे भी खिल जाते थे
तुम्हारी मुस्कराहट ने उनके दिलों में उम्मीदें जगार्इं
कहते हैं कि सच्ची आत्माएं अधीर रहती हैं और फिर से
जन्म लेती हैं, जब तक कि निर्मल न हो जाएं…
अस्मां ने ‘कान्वेंट आफ जीसस एंड मेरी’ लाहौर से प्राथमिक शिक्षा पाई थी। वर्ष 1978 में पंजाब यूनिवर्सिटी लाहौर से एलएलबी के बाद उन्होंने पहले हाईकोर्ट और बाद में सुप्रीम कोर्ट में मानवाधिकारों के लिए कानूनी संघर्ष शुरू किया। वर्ष 1983 में तत्कालीन राष्ट्रपति जिया उल-हक के खिलाफ लोकतंत्र के युद्ध में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। वर्ष 1987 में उन्होंने स्वयं ही मानवाधिकार आयोग का गठन किया। नवंबर 2007 में उन्हें वकील-आंदोलन के मध्य फिर जेल में डाल दिया गया। वर्ष 2016 में उन्हें संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार संगठन के लिए चुना गया।
अपने सरकार-विरोधी तेवरों के बावजूद उन्हें 2010 में ‘हिलाले-इम्तियाज’ और अन्य सम्मान मिले। अस्मां के पिता मलिक गुलाम जिलानी देश की प्रशासनिक सेवा में रहे थे और रिटायरमेंट के बाद वे राजनीति में सक्रिय हो गए। एक समय ऐसा भी आया जब उनके परिवार की सारी संपत्ति जब्त कर ली गई।
पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए वे आखरी सांस तक लड़ती रहीं। वे अपने मुल्क की शायद एकमात्र ऐसी नेता थीं, जिसने एक हिंदू इनकम टैक्स इंस्पेक्टर की हत्या पर बुलंद आवाज में बयान जारी किया था, ‘यह हमारे लिए शर्मनाक बात है कि सैनिक अधिकारियों की मौजूदगी में एक अल्पसंख्यक अधिकारी को ‘ईशनिंदा’ के आरोप में मार डाला गया, जबकि लश्करे-तैयबा के लोगों और व्यापारियों को हम चाय-नाश्ता कराते हैं। हमारी हुकूमत ने सत्तर वर्षीय मुख्तारन बीबी और उसकी गर्भवती बेटी समीना को ईशनिंदा के आरोप में शेखूपुरा जेल में डाल दिया, जबकि जल्लाद किस्म के लोग खुले घूमते रहे।’ 18 जनवरी, 2017 को उन्होंने ‘लंदन स्कूल आफ इकोनॉमिक्स’ में अमर्त्य सेन के नाम पर आयोजित व्याख्यान माला में भाषण देते हुए भी अपने देश में ‘ईशनिंदा’ के नाम पर जारी शर्मनाक हरकतों पर सवाल उठाए थे। अस्मां जहांगीर अपने मुल्क में भारत-पाक सद्भावना की मुखर प्रवक्ता थीं। यह अलग बात है कि हमने इस भारतीय महाद्वीप की सर्वाधिक सशक्त मानवाधिकार नेता को उनके आखिरी लम्हों में याद नहीं किया। मगर मानवाधिकारों की लड़ाई में जूझने वालों का अंजाम शायद यही होता है। यही हमारे पूरे भारतीय उपमहाद्वीप की त्रासदी है। कितना विचित्र है कि उनके निधन पर पाकिस्तान के कट्टरपंथियों और आतंकी संगठन बेहद खुश हैं।
