संतन कुमार पांडेय
बापू के दो डगमग पग किधर चल पड़े थे? उनके कदम राजधानी दिल्ली में आयोजित भव्य स्वतंत्रता-समारोह में शामिल होने के लिए नहीं उठे थे। वे तो अंतत: उस समारोह में शरीक ही नहीं हुए। वे गैरहाजिर थे। उन्हें तत्कालीन कराहते कलकत्ता में ही रुकना-ठहरना क्यों अधिक वाजिब महसूस हुआ? दरअसल, कलकत्ता में दर्दनाक दंगों का दौर था। इंसानियत पर हैवानियत हमलावर थी। एक देश के दो टुकड़े हो गए थे। हिंदुस्तान-पाकिस्तान में बंटे लोगों के अपने-अपने घर देखते-देखते पराए हो गए और वे सब कुछ घर-द्वार गंवा कर शरणार्थी बन गए। स्वाधीनता की बलिबेदी पर इतना बड़ा बेइंतहा बलिदान!
बापू कश्मीर से पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) के नोआखाली के लिए रवाना हुए थे। उनका एकमात्र उद्देश्य था कि किसी प्रकार छियालिस के दंगों की पुनरावृत्ति न हो। आजादी पर अराजक आंतक की आंच न आने पाए। वे 9 अगस्त, 1947 को मनुबेन और आभा के साथ बंगाल के सोदपुर पहुंचे। बंगाल प्रशासन के मुसलिम अधिकारी पाकिस्तान का रुख करने की तैयारी पूरी कर चुके थे। बीते साल पाकिस्तान की मांग पर सीधी कार्रवाई की उलटी चाल संत्रस्त कलकत्ता को भुगतना पड़ा था। अब हिंदुओं के प्रतिशोध की आशंका से उनके पसीने छूट रहे थे। स्थानीय मुसलिमों का भारी-भरकम जत्था गांधीजी के सोदपुर आश्रम में पहुंचा और उनसे फिलहाल नोआखाली न जाने की गुहार लगाने लगा। उस्मान खान, जो कलकत्ता के मेयर और मुसलिम लीग के सेक्रेटरी थे, गांधीजी के सामने नतमस्तक हो निवेदन कर रहे थे। गांधीजी के कलकत्ता प्रवास के समय बंगाल के प्रधानमंत्री हुसैन साहिद सुहरावर्दी कराची में थे।
गांधीजी की खबर मिलते ही वे कराची से कलकत्ता के लिए फौरन रवाना हो गए और 11 अगस्त को उनसे मुलाकात की और कलकत्ता में ही ठहरने की लगातार मिन्नतें करने लगे। उन्होंने गिड़गिड़ाते सुहरावर्दी को चेताया कि ‘मैं यहां एक ही शर्त पर रुक सकता हूं कि उन्हें भी उनके साथ ही रहना गवारा हो। न ही हम लोगों की सुरक्षा के लिए पुलिस या सेना के जवानों की तैनाती हो।’ दूसरे दिन सुहरावर्दी ने गांधीजी की शर्तों को मान लिया। उन्होंने तत्काल नोआखाली के दंगाइयों के सरगना गुलाम सरवर को तार देकर सचेत किया कि किसी भी कीमत पर नोआखाली में अमन-चैन बहाल रहना चाहिए।
उस समय किसी प्रांत के मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री ही कहा जाता था। सुहरावर्दी के नेतृत्व में मुसलिम लीग ने पाकिस्तान की मांग कर कलकत्ता में कोहराम ही नहीं मचाया था, खुल्लमखुल्ला खून की होली खेली थी। वह दिल दहलाने वाला दंगा था। कलकत्ता की गली-गली लाशों से पट गई थी। उपासना-स्थल तक खून से लथपथ थे। बहू-बेटियों की इज्जत सरे आम लूटी जा रही थी। कलकत्ता के इतिहास में ऐसा कल्लेआम कभी दर्ज नहीं हुआ था। आखिरकार, महात्मा गांधी को मोहब्बत और मिल्लत की मशाल जलानी और थामनी पड़ी। पंद्रह अगस्त के दिन गांधी के नोआखाली में रहने का निश्चित कार्यक्रम टल ही गया। गांधी के लिए स्वाधीनता दिवस हर्षोल्लास का नहीं, खाली हृदय के टीसते दर्द का रहा। उन्होंने एकांत में अकेले आंसू बहाए। उन्होंने बेलियाघाटा में उपवास-व्रत का पालन किया, चरखा चला कर सूत काते और प्रार्थनारत रहे।
12 अगस्त, 1947 को गांधी को 150 बी, डॉ. सुरेशचंद्र बनर्जी रोड, कलकत्ता स्थित एक मंजिला हैदरी मंजिल पहुंचने में उग्र भीड़ का सामना करना पड़ा था। अशांत भीड़ काले झंडे दिखा कर, उनके वापस जाने की मांग कर रही थी। भीड़ को इस बात का मलाल था कि गांधीजी जितने मुसलमानों के हमदर्द हैं, उतने हिंदुओं के हिमायती नहीं। शांत-शिष्ट गांधीजी ने मुस्कुराहट बांट कर उन्हें शांत ही नहीं किया, अपना अनुयायी भी बना लिया। ऐसे बाधा-बंधनों से गांधीजी उबरे ही थे कि अचानक ‘हिंदू महासभा’ के कार्यकर्ताओं ने उनेक आवास में अफरा-तफरी मचा दी और तोड़फोड़ करने से भी बाज नहीं आए। वे उनकी बकरी भी लेते गए। अंत तक गांधीजी ने धैर्य का दामन नहीं छोड़ा और शांतिपूर्वक सब कुछ सहन कर गए।
गांधीजी की संगिनी मनुबेन की उन दिनों की डायरी ‘दी मिरैकल ऑफ कलकत्ता’ (कलकत्ता का कमाल) में हैदरी मंजिल की दैनंदिन गतिविधियां दर्ज हैं। पंद्रह अगस्त को वे आधी रात दो बजे ही उठ गए, क्योंकि उसी दिन रमजान का मुबारक दिन था और लोग उन्हें सलाम करने के बाद ही रोजा तोड़ने के आग्रही थे। उनके प्रति तड़के-तड़के श्रद्धा ज्ञापित करने में हिंदू भी पीछे नहीं थे। आम लोगों से गांधीजी प्रेम पूर्वक मिले और गीता पाठ किया। फिर, वे सुबह की सैर पर निकले पर उनके दर्शन के लिए लोगों का हुजूम इकट्ठा हो गया।
गांधीजी की मंशा दंगा-ग्रस्त इलाके में ही रहने की थी। उन दिनों बेलियाघाटा को मियांबागान के नाम से जाना जाता था। यहां की आबादी मिलीजुली थी। 1946 में यहां भी सांप्रदायिक दंगे हो चुके थे। वे तथाकथित सुरक्षित जगह पर टिकना नहीं चाहते थे। उन्हें अपने आप पर इतना भरोसा था कि उन्होंने किसी भी प्रकार के पुलिसिया बंदोबस्त की मनाही कर दी थी। हैदरी मंजिल में मुलाकातियों से मिलते-मिलते गांधीजी के धैर्य का दामन कभी-कभार छूटने-सा लगता था। ‘हरिजन’ में लिखने के लिए माकूल मौका तक मिलना मुश्किल हो गया था, जिसका मलाल होना स्वाभाविक था। वे अक्सर थके-हारे कमरे के बुलंद दरवाजे को बंद कर दिया करते थे।
उस दिन हैदरी मंजिल की सांध्यकालीन प्रार्थना-सभा में कहीं तिल रखने तक की जगह नहीं थी। उनके हृदयोद्गार थे-‘आज आजादी का पहला दिन है और राजाजी राज्यपाल बन गए हैं। (चक्रवर्ती राजगोपालाचरी पश्चिम बंगाल के प्रथम राज्यपाल नियुक्त हुए थे) आम लोगों ने मान लिया कि राजभवन उनकी निजी संपत्ति बन गई है, वे पूरे राजभवन को ही हथिया सकते हैं। यह एक अच्छी बात है कि लोग (जनता) समझ रहे हैं कि सभी के पास समान प्रवेशाधिकार है। पर यह दुखद है कि फिरंगी वापस चले गए हैं, तो लोगों को कुछ भी कर गुजरने की इजाजत मिल गई है। वे कुछ भी तोड़-फोड़ सकते हैं। मुझे उम्मीद है कि कोई भी ऐसी उच्छृंखल ज्यादती से बाज आएगा। खिलाफत आंदोलन के दौरान हम लोगों ने जैसी एकता दिखाई थी, वैसी ही एकता दिखाने पर हम अब तक जहर के प्याले की जगह, अमृत के घूंट पी सकेंगे।’
शाम ढलने के बाद ही सुहरावर्दी पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री प्रफुल्ल घोष को साथ लेकर गांधीजी के पास पहुंचे और उन दोनों ने उनसे आग्रह किया कि वे उनके साथ चल कर बिजली के लट्टुओं से जगमग शहर को देख आएं। उनकी कार जहां-जहां से गुजरी- जय हिंद के नारों से, गुलाब जल के छिड़काव से और गुलाब की पंखुड़ियों की बारिश से शानदार स्वागत हुआ। नन्हे-मुन्नो ने बापू से हाथ भी मिलाए। वे हैदरी मंजिल रात के दस बजे के करीब थक कर लौटे और सोने चले गए। मगर हिंसा की छिटपुट वारदातें जारी थीं। आंच सुलग रही थी। हैदरी मंजिल के करीब ‘आलोछाया’ सिनेमा के इर्दगिर्द खूंरेजी में चार लोग मारे गए। प्रायश्चित्त करने के लिए 1 सितंबर, 1947 को महात्मा गांधी आमरण अनशन पर बैठ गए। उनके अनशन की खबर से देश की अंतरात्मा आंदोलित हुए बिना नहीं रही। स्थानीय नेताओं ने अमन-चैन पर अमल करने का आह्वान किया और हिंसा की आग बुझ गई।
गांधीजी के चरणों में एक-एक कर घातक हथियार समर्पित कर दिए गए। आश्वस्त होने पर ही आखिर गांधीजी ने 4 सितंबर, 1947 को अनशन व्रत तोड़ा। बंगाल के बवाल को विगलित-विताड़ित कर वे 7 सितंबर, 1947 को राजधानी दिल्ली चले गए। हैदरी मंजिल के जो दरो-दीवार उस दर्दनाक दौर के दर्शक बने रहे, कब के ध्वस्त हो चुके होते, अगर जुगलचंद्र घोष जैसे समर्पित गांधीवादी कार्यकर्ता नहीं होते। वे अगर घर-घर से चंदा इकट्ठा कर इस धरोहर को खंडहर होने से नहीं बचाते। गांधी भवन ने उदासी-उपेक्षा का उपसंहार ही देखा है। अब ‘गांधी भवन’ संग्रहालय में तब्दील हो गया है।
