ज्योतिबा फुले का पूरा नाम ज्योतिराव गोविंदराव फुले था। वे एक प्रखर विचारक, समाजसेवी, लेखक, दार्शनिक तथा क्रांतिकारी कार्यकर्ता थे। उन्हें ‘महात्मा फुले’ और ‘ज्योतिबा फुले’ के नाम से भी जाना जाता है। सितंबर 1873 में उन्होंने महाराष्ट्र में सत्य शोधक समाज नामक संस्था का गठन किया। महिलाओं और दलितों के उत्थान के लिए उन्होंने अनेक कार्य किए। समाज के सभी वर्गों को शिक्षा प्रदान करने के ये प्रबल समर्थक थे। वे भारतीय समाज में प्रचलित जाति पर आधारित विभाजन और भेदभाव के विरुद्ध थे।
आरंभिक जीवन
महात्मा ज्योतिबा फुले का जन्म पुणे में हुआ था। एक वर्ष की अवस्था में इनकी माता का निधन हो गया। इनका लालन-पालन एक बाई ने किया। उनका परिवार कई पीढ़ी पहले सतारा से पुणे आकर फूलों के गजरे आदि बनाने का काम करने लगा था। ज्योतिबा ने कुछ समय तक मराठी में अध्ययन किया, बीच में पढ़ाई छूट गई और बाद में इक्कीस वर्ष की उम्र में अंग्रेजी में सातवीं कक्षा की पढ़ाई पूरी की। इनका विवाह 1840 में सावित्री बाई से हुआ, जो बाद में स्वयं एक प्रसिद्ध समाजसेवी बनीं। दलित और स्त्री शिक्षा के क्षेत्र में दोनों ने मिल कर काम किया।
कार्यक्षेत्र
ज्योतिबा फुले ने विधवाओं और महिलाओं के कल्याण के लिए काफी काम किया। इसके साथ ही किसानों की हालत सुधारने और उनके कल्याण के लिए भी काफी प्रयास किए। स्त्रियों की दशा सुधारने और उनकी शिक्षा के लिए ज्योतिबा ने 1848 में एक स्कूल खोला। यह इस काम के लिए देश में पहला विद्यालय था। लड़कियों को पढ़ाने के लिए अध्यापिका नहीं मिली, तो उन्होंने कुछ दिन खुद पढ़ा-लिखा कर अपनी पत्नी सावित्री को इस योग्य बना दिया। उच्च वर्ग के लोगों ने उनके इस काम में बाधा डालने का प्रयास किया, पर जब फुले उससे नहीं डिगे और आगे बढ़ते ही गए तो उनके पिता पर दबाव डाल कर पति-पत्नी को घर से निकालवा दिया। इससे कुछ समय के लिए उनका काम रुका जरूर, पर जल्दी ही उन्होंने एक के बाद एक बालिकाओं के तीन स्कूल खोल दिए।
महात्मा की उपाधि
गरीबों और निर्बल वर्ग को न्याय दिलाने के लिए ज्योतिबा ने ‘सत्यशोधक समाज’ स्थापित किया। उनकी समाजसेवा देख कर 1888 में मुंबई की एक विशाल सभा में उन्हें ‘महात्मा’ की उपाधि दी गई। ज्योतिबा ने ब्राह्मण-पुरोहित के बिना ही विवाह-संस्कार आरंभ कराया और इसे मुंबई हाईकोर्ट से भी मान्यता मिली। वे बाल-विवाह विरोधी और विधवा विवाह के समर्थक थे। उन्होंने कई पुस्तकें भी लिखीं। तृतीय रत्न, छत्रपति शिवाजी, राजा भोंसला का पखड़ा, किसान का कोड़ा, अछूतों की कैफियत आदि उनकी प्रसिद्ध पुस्तकें हैं।
महात्मा ज्योतिबा और उनके संगठन के संघर्ष के कारण सरकार ने ‘एग्रीकल्चर एक्ट’ पास किया।
पुस्तक ‘गुलामगिरी’ और दलित आंदोलन
सन 1873 में महात्मा फुले ने ‘सत्यशोधक समाज’ की स्थापना की थी और इसी साल उनकी पुस्तक ‘गुलामगिरी’ का प्रकाशन भी हुआ। दोनों ही घटनाओं ने पश्चिमी और दक्षिण भारत के भावी इतिहास और चिंतन को बहुत प्रभावित किया। महात्मा फुले की किताब ‘गुलामगिरी’ बहुत कम पृष्ठों की है, लेकिन इसमें बताए गए विचारों के आधार पर पश्चिमी और दक्षिणी भारत में बहुत सारे आंदोलन चले। उत्तर प्रदेश में चल रही दलित अस्मिता की लड़ाई के बहुत सारे सूत्र ‘गुलामगिरी’ में ढूंढ़े जा सकते हैं।

