मीना
दिलचस्प सफर रैप का
रैप शब्द सोलहवीं शताब्दी में ब्रिटिश अंग्रेजी में इस्तेमाल किया गया था, जिसका शाब्दिक अर्थ है ‘हड़ताल’। आज रैप शब्द हिप-हॉप के साथ इस कदर जुड़ गया है कि कई लेखक इन्हें पर्याय के रूप में प्रयोग करते हैं। 1990 में जब रैप कई देशों में फैल चुका था, तब भारत की ओर भी इसकी बयार बही। 2000 तक भारत के लोगों को रैप समझ आने लगा था। बाबा सहगल ने हिंदी में पहली बार रैप शुरू किया। उन्होंने ‘ठंडा ठंडा पानी’ एलबम निकाली, जिसकी हजारों कॉपियां बिकीं। इसके बाद बोहेमिया ने 2002 में एलबम निकाली, जो खूब हिट हुई। बोहेमिया को ही देसी हिप-हॉप का श्रेय दिया जाता है। बोहेमिया ने ही बॉलीवुड में रैप संगीत की शुरुआत की। 2011 के बाद भारत में हर राज्य से रैपर्स सामने आने लगे। अब भारत में यूट्यूब पर कई चैनल खुल रहे हैं। हजारों लोग इस ओर आ रहे हैं।
रैप को एक करिअर के तौर पर केवल पुरुषों ने नहीं अपनाया, बल्कि लड़कियों ने भी इसमें बाजी मारी। 2010 में भारत में रैप की शुरुआत करने वाली मनमीत कौर का कहना है कि जब उन्होंने रैप करना शुरू किया था तब कोई महिला थी ही नहीं रैप में। मनमीत ने तेरह साल की उम्र में रैप शुरू कर दिया था। वे कहती हैं कि इसमें मैं कविता का भाव दिखा सकती हूं। इसने मुझे इस कदर प्रभावित किया कि मुझे लगा कि इसमें मैं अपनी जिंदगी की पूरी सच्चाई बयान कर सकती हूं। मनमीत कहती हैं कि भारत में हिप-हॉप की शुरुआत सोशल मीडिया से हुई। सोशल मीडिया पर भी पुरुषों ने उन्हें तंग किया। उनकी फेसबुक आइडी हैक कर ली गई। वे कहती हैं कि 2010-11 में जब वे लाइव परफारमेंस देतीं थीं तब मंच पर जाने के लिए उनका रास्ता रोका जाता था। लेकिन कभी हिम्मत नहीं हारी और आगे बढ़ती गर्इं। वे कहती हैं कि मेरे लिए हिप-हॉप इस दुनिया का एक नजरिया है। मनमीत कहती हैं कि मुझे हिप-हॉप की बहुत-सी चीजों से परेशानी भी है। हिप-हॉप बहुत मर्दानगी भरा है। दूसरा हिप-हॉप में ‘मैं’ की संस्कृति है। मैं अपने संगीत से ‘मैं’ निकाल कर लोगों की कहानी कहना चाहती हूं। मैं इसका भाव बचाना चाहती हूं। हिप-हॉप के माध्यम से वह सच्चाई बाहर लानी है, जो मीडिया छिपाता है। मनमीत इस साल दो एलबम पर काम कर रही हैं। वे हिप-हॉप को केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि जिम्मेदारी के रूप में देखती हैं। वे कहती हैं कि हिप-हॉप समाज से संवाद करने का एक माध्यम है। मनमीत की शादी 2013 में हुई। शादी के बाद उनकी जिम्मेदारी केवल रसोई तक रह गई थी। वे अपने सपनों को पूरा नहीं कर पा रही थीं और एक दिन उन्होंने पति का घर छोड़ दिया। बाद में ‘हिप-हॉप बहू’ नाम से एलबम निकाली, जिसमें उन्होंने बताया कि समाज ने लड़कियों के लिए हर स्तर पर पैटर्न बना रखे हैं। उनकी एक और एलबम है जिसका नाम है नियोफिलिया। नियाफीलिया में विकसित यूरोप और विकसशील भारत में महिलाओं के साथ कैसा व्यवहार होता है, इसके बारे में बताया है। वे कहती हैं कि जब मेरे शब्द, मेरा काम लोगों के इतने करीब आ जाएंगे कि सभी पर उसका प्रभाव पड़ेगा तब मेरा वक्त आएगा।
गोशे गोशे में सुलगती है चिता तेरे लिए/ फर्ज का भेस बदलती है कजा तेरे लिए/ कहर है तेरी हर इक नर्म अदा तेरे लिए/ जहर ही जहर है दुनिया की हवा तेरे लिए/ रुत बदल डाल अगर फूलना फलना है तुझे/ उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे…’ कैफी आजमी की ‘औरत’ में जिस ओर इशारा किया गया था आज की औरतें वाकई रुत बदलने का काम कर रही हैं। अब वे केवल डॉक्टर, इंजीनियर या सेना को अपना पेशा नहीं बना रही हैं, बल्कि गीत-संगीत में भी करिअर बना रही हैं। एक समय था जब घरों की बेटियों को शास्त्रीय संगीत की शिक्षा दी जाती थी। वे खयाल, ठुमरी जैसा संगीत सीखती थीं। बाद में वे भजन, लोकगीत, आल्हा जैसे गीत गाने लगीं और आज की लड़कियां रैप गा रही हैं। अब लड़कियां पूरे ‘स्वैग’ के साथ बिंदास होकर ‘चार लोगों की बातें सुन लीं, हमने क्या पाया फिर भी’, अवेयरनेस इज माय बेस्ट फ्रेंड, फ्रीडम इज माय कजिन, यू बेटर लिव इट जैसे रैप गा रही हैं।
दरअसल, रैप गलियों, सड़कों, आंदोलनों से निकली संस्कृति है। अमेरिका, एशिया, यूरोप, अफ्रीका आदि में दासों और अश्वेतों के साथ कू्ररतापूर्ण व्यवहार को बयान करते हैं रैप। यही वजह है कि डेनिरो फरार ने ‘वी आर अफ्रीकन/ एंड बी हैपेंड टू बी इन अमेरिका/ वी आर नॉट अमेरिकन/ वी आर अ पीपल हू फॉरमरली वर अफ्रीकन हू वर किडनैप्ड/ एंड ब्रॉट टू अमेरिका/ वी डिडंट लैंड आॅन प्लाइमाउथ रॉक/ दि रॉक वॉज लैंडिंड आॅन अस…’ जैसा रैप गाया। एक ओर रैप जहां मनोरंजन का हिस्सा है, तो वहीं क्रांति का प्रतीक भी। आज की लड़कियां भी इस क्रांति की मशाल को जलाए रखना चाहती हैं और रैप को अपना पेशा बना रही हैं।
फिल्म उरी में ‘जग्ग जीतेया’ गाना गा चुकीं दीपा उन्नीकृष्णन यानी डीएमसी ने 2012 में रैप करना शुरू किया था। पच्चीस साल की दीपा का कहना है कि हिप-हॉप ने मुझे पहचान दी है। आज हिप-हॉप मेरी जिंदगी बन गया है। दीपा कहती हैं कि किसी समाज के बनाए ढांचों से जब भी हम कुछ इतर करना चाहते हैं, तो मुश्किलें आती ही हैं। वे कहती हैं कि जब उन्होंने रैप शुरू किया था तब वे खुद के लिए ही गाने बना रहीं थीं। घर वालों को समझाना मुश्किल होता है कि हम क्या कर रहे हैं। हमारे काम को उतना सम्मान भी नहीं मिलता था जितना अभी मिलता है। पैसे भी कम मिलते थे, लेकिन अब बदलाव हो रहे हैं। पिछले कुछ सालों से लोग इसे करिअर का हिस्सा बना पा रहे हैं। अब लोगों में हिप-हॉप को लेकर जागरूकता बढ़ रही है। गली बॉय की वजह से लोगों में हिप-हॉप की तस्वीर और साफ होगी। वे कहती हैं कि हिप-हॉप समुदाय मेरे लिए बहुत जरूरी है, क्योंकि इसने मुझे एक नई पहचान दी है।
दीपा से डीएमसी बनना मेरे लिए एक अच्छा अनुभव रहा है। दीपा कहती हैं कि हिप-हॉप में इतनी ताकत है कि अपने शब्दों से किसी की जिंदगी बदल सकता है। जिस तरह कव्वाली को भारत में जगह मिली उसी तरह से हिप-हॉप को भी मिलेगी। दीपा का मानना है कि हिप-हॉप का पूरा दारोमदार ज्ञान पर होता है। हमें दुनिया को दिखाना है कि हमारे पास भी उतना ज्ञान है कि हम बेहतर गाने बना सकते हैं। वे कहती हैं कि संघर्ष सभी की जिंदगी में होते हैं, लेकिन चूंकि मैं एक लड़की हूं इसलिए मुझे ज्यादा संघर्ष करना पड़ा। मेरा घर कल्याण में था और जो भी कार्यक्रम होते थे वे सब बांद्रा और अंधेरी में होते थे। सभी कार्यक्रमों का समय रात नौ बजे से होता था और दो बजे खत्म होता था। इस वजह से मुझे कई साल घर पर ही बैठ कर गाने लिखने पड़े। क्योंकि मैं उस समय अठारह साल की थी और मुझे रात में बाहर जाने की मनाही थी। लेकिन स्नाकोत्तर खत्म होने के बाद नौकरी की। फिर मुझे थोड़ी आजादी मिली और मैं बाहर निकल पाई। अगर मैं मुंबई में नहीं होती तो शायद मैं इतना समय इसमें नहीं रह पाती। दीपा कहती हैं कि भारत में जिन लोगों ने रैप शुरू किया वे सब अंग्रेजी में थे। मैंने हिप-हॉप शुरू करने से पहले होमवर्क किया। जो भी उम्दा रैपर थे, उनसे भी गाने मांगे। मैंने ज्यादातर महिला रैपर को सुना। तब यहां तक पहुंच पाई।
रैप की कहानी
यों तो रैप की शुरुआत को लेकर बहुत विरोधाभास हैं लेकिन बहुमत में लोगों का मानना है कि रैप पश्चिम अफ्रीका के ग्रायोट्स परंपरा से शुरू हुआ। वे ड्रम और विरले उपकरणों से लयबद्ध तरीके से कहानियां सुनाया करते थे। ग्रायोट्स वे इतिहासकार थे जो कहानियों को गाकर बताते थे। रैप अश्वेतों के संगीत का हिस्सा था। उसके शब्द उनका दर्द बयान करते थे। तो वहीं, कैरेबियन लोक कलाकर भी कहानियों को पद्य की शैली में सुनाते थे। जब इस शैली के बारे में अमेरिकी लोगों को मालूम हुआ तो उन्होंने इसमें तुकबंदी और ताल के साथ प्रयोग करना शुरू किया। दीपा के मुताबिक, रैप हिप-हॉप का हिस्सा है। जिसमें पांच अलग-अलग तत्त्व होते हैं। ब्रेक डांस, डीजेइंग, एमसिंग (रैप), बीट बॉक्सिंग और ग्रफ्टिंग। वे बताती हैं कि हिप-हॉप न्यूयॉर्क में 1973 में एक पार्टी की तरह शुरू हुआ था। यह पार्टी न्यूयॉर्क के डीजे हॉलिवुड ने रखी थी। उन्हें ही हिप-हॉप का जनक माना जाता है।
वे बताती हैं कि शुरुआत में पहले डीजे बजता था, जिसमें बाद में रैपर आए। फिर हिप-हॉप डांस शुरू हुआ। 1973 के अंत तक डिस्को खत्म हो चुका था और हिप-हॉप चलन में आया। दीपा कहती हैं कि दासों के साथ जिस तरह का अमानवीय व्यवहार किया गया था उसी को उनकी अगली पीढ़ी ने रैप के माध्यम से बताया। यही वजह है कि 1980 के अंत में रैप में शब्दों की अहमियत समझी जाने लगी। लोग राजनीतिक रैप भी तैयार करने लगे। दीपा कहती हैं कि रैप अमीरों ने नहीं, गरीबों ने शुरू किया है।
वे कहती हैं कि पश्चिम में भी वही रैपर्स प्रसिद्ध हैं जो शराब पीती हैं या छोटे कपड़े पहनती हैं। लेकिन जो वाकई अच्छी चीजों के बारे में बात कर रहे हैं उनको उतने दर्शक नहीं मिलते। लेकिन मैंने ऐसे गानों को नहीं चुना, क्योंकि मुझे मालूम था कि भौतिकवादी चीजें लंबे समय तक प्रोत्साहित नहीं कर सकतीं। अश्वेत लोगों ने दासता देखी है, तो उनके गानों में वह दर्द दिखता है। इसलिए कहा जाता है कि शब्दों से रैपर एक नई दुनिया बनाता है। हिप-हॉप में कहानी कहने की कला है। हिप-हॉप केवल संगीत नहीं, यह क्रांति है। भारत में भी हिप-हॉप राजनीति को बदलेगा।
दीपा कहती हैं कि मैंने अपनी पढ़ाई और काम दोनों को साथ रखा। मुझे मालूम था कि मुझे कुछ रचनात्मक करना है। इसलिए सीए की पढ़ाई छोड़ कर रैप शुरू किया। दीपा का कहना है कि आगे जो भी लड़कियां हिप-हॉप में आना चाहती हैं, अगर वे ‘कूल’ बनने के लिए या ‘ट्रेंड’ में आने के लिए हिप-हॉप में आना चाहती हैं तो न आएं, क्योंकि ऐसा बहुत आगे तक नहीं चल पाएगा। जब आपको सच में सीखना हो तभी आप आगे बढ़ सकते हैं। सिर्फ रैप करने से आपकी रचनात्मकता अधिक नहीं बढ़ेगी, बल्कि इसकी पूरी संस्कृति को समझना होगा। दूसरा अगर आप में वह आग है, जिसे आप बुझा नहीं पा रहे हैं, तब जरूर हिप-हॉप करो।
लैंगिक भेदभाव में विश्वास नहीं
बॉलीवुड हो या हॉलीवुड, सभी में महिलाओं की संगीत के क्षेत्र में बराबर प्रतिनिधित्व को लेकर चर्चाएं होती रहती हैं। कई बार इस लैंगिक गैरबराबरी को लेकर आंदोलन भी हुए। पुरुषों के मुकाबले महिलाओं का प्रतिनिधित्व कम है, लेकिन आॅनलाइन प्लेटफॉर्म्स के आने के बाद यह बंधन भी टूटता नजर आ रहा है। महिलाएं भी खूब यूट्यूब चैनल खोल रही हैं और अपनी आवाज का दम दुनिया को दिखा रही हैं। कन्नड़ रैपर सिरी नारायण को आज हर नौजवान सुनना चाहता है। वे हिंदी, कन्नड़ और अंग्रेजी तीनों भाषाओं में रैप करती हैं। उनका कहना है कि इतने लड़कों की भीड़ में अकेले परफॉर्म करना अकेलापन महसूस कराता है, इसलिए और लड़कियों को रैप की ओर आना चाहिए। उन्होंने 2013 में रैप शुरू किया था। ‘आउट आॅफ माय माइंड’ गाना सुन कर वे रैप के लिए प्रेरित हुर्इं। वे कहती हैं कि जब मैंने तय किया था कि रैप करूंगी तब मेरे माता-पिता ने मना किया, क्योंकि बचपन में मैंने शास्त्रीय संगीत सीखा था और मम्मी-पापा को रैप समझ नहीं आता था। बाद में मेरे पापा ने मेरा साथ दिया। अब भी मम्मी समझती नहीं हैं, लेकिन मुझे कभी रोकती नहीं हैं। वे बताती हैं कि मुझे इस बात से भी समस्या है कि किसी पुरुष को पुरुष रैपर नहीं कहा जाता है लेकिन लड़की को महिला रैपर जरूर कहा जाता है। मैं इस तरह के लैंगिक भेदभाव में विश्वास नहीं करती हूं। सभी को बराबर मानना चाहिए।
सिरी बताती हैं कि एक महिला रैपर होने का फायदा यह मिलता है कि लोग आप पर ध्यान ज्यादा देते हैं। रैप एक रचनात्मक कार्य है। आप अपनी समस्या किसी को सामान्य तरीके से बताओगे तो वे आपको नहीं सुनेंगे। वहीं, अगर आप रैप के माध्यम से किसी को कुछ बताओगे तो उस पर सभी का ध्यान जाएगा। गली बॉय आने के बाद रैप को और ज्यादा लोग समझ पाएंगे।
गली बॉय से रैप को लेकर समझ बनेगी, साथ ही संगीत एक ऐसा उद्योग है, जिसका बाजार कभी खत्म नहीं होने वाला है। संगीत से बहुत कुछ सीखने को मिलता है। खासकर रैप के शब्दों का प्रभाव दर्शकों पर अधिक पड़ता है। संगीत सुनने वालों की संख्या भी बढ़ती जा रही है। फिक्की की 2018 की रिपोर्ट के मुताबिक, इंटरनेट उपभोक्ताओं की संख्या बढ़ने की वजह से संगीत सुनने वालों की संख्या भी बढ़ी है। आइएफपीए ग्लोबल म्युजिक रिपोर्ट 2017 के मुताबिक, संगीत उद्योग को डिजिटल माध्यमों से 64.60 फीसद राजस्व प्राप्त हुआ।
सिरी का कहना है कि यह हम कलाकारों के लिए सही समय है। इस समय में हम खुद को निखार सकते हैं। वे कहती हैं कि अगर खुद की पहचान बनानी है तो दूसरे के विचारों पर मत चलो, बल्कि अपना खुद का स्टाइल बनाओ।

