बेहद चर्चित रही फिल्म ‘ठग्स आफ हिंदोस्तान’ के बॉक्स ऑफिस पर औंधे मुंह लुढ़क जाने से सबसे बड़ा झटका, और वह भी काफी जोर से, आमिर खान को लगा होगा। कहते हैं कि मेहनताने के रूप में उन्हें मुनाफे का सत्तर फीसद हिस्सा मिलने वाला था। सही है या गलत, लेकिन पिछले कुछ साल से स्टार मेहनताने के रूप में या तो भारी भरकम रकम लेते हैं (जैसे दोनों ‘टाइगर’ के लिए सलमान खान ने कथित रूप से सौ-सौ करोड़ रुपए लिए) या बदले में फिल्म का मजबूत वितरण क्षेत्र या मुनाफे में मोटा हिस्सा दो साल पहले जब ऋतिक रोशन के सितारे गर्दिश में चल रहे थे। खबर आई कि उनकी अगली छह फिल्मों के सैटेलाइट अधिकार के लिए साढ़े पांच सौ करोड़ रुपए का सौदा हुआ। यह खबर ठीक से ठंडी भी नहीं हुई थी कि सलमान खान को दस फिल्मों के लिए एक हजार करोड़ रुपए मिलने की डुगडुगी बज गई। सितारों पर करोड़ों का दांव चलना आज का फैशन या दस्तूर बन गया है।

सही है कि जब किसी स्टार की फिल्में सफल होने लगती हैं तो उसका भाव बढ़ जाता है। निर्माता और कारपोरेट उस पर आंख मूंद कर पैसा लगाने को तत्पर हो जाते हैं, लेकिन ऋतिक और सलमान खान को अगले कई साल तक के लिए सफलता की गारंटी मान लेने की खुशफहमी का क्या औचित्य है? सवाल है कि ऐसे कारोबार में जहां अनिश्चितता हमेशा मुंह बाए खड़ी रहती है, किसी सितारे पर अंधा भरोसा करने की प्रवृत्ति क्या ठीक है? असल में फिल्म बनाना कारोबार की शक्ल ले चुका है और कारोबार में मुनाफा कमाने के लिए जोखिम तो उठाना ही पड़ता है। यही जोखिम उठाया जा भी जा रहा है। इससे फायदा भी हो रहा है। कुछ साल पहले अजय देवगन को दस फिल्मों के सैटेलाइट अधिकार के बदले चार सौ करोड़ रुपए मिले थे। तब से एक ‘दृश्यम’ को छोड़ कर उनकी कोई फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कमजोर नहीं गई है।

सितारों को करोड़ो-अरबों में नहलाना इतना आम हो गया है कि समझ में नहीं आता, पर होड़ कहां तक चलेगी? बारह साल पहले जब ‘रोबोट’ बनी थी, तब रजनीकांत को पैंतीस करोड़ रुपए मिले थे। उसके सीक्वल ‘2.0’ के लिए उन्होंने सवा सौ करोड़ रुपए में अनुबंध किया। साढ़े तीन सौ करोड़ रुपए में बनी ‘कबाली’ के लिए रजनीकांत को कहते हैं, डेढ़ सौ करोड़ रुपए दिए गए।

एक समय था जब हिंदी या कुल मिलाकर कहें तो भारतीय फिल्में और उनसे जुड़े स्टार हॉलीवुड की फिल्मों और उनके सितारों के मुकाबले विपन्न माने जाते थे। संतुलन हालांकि अब भी नहीं बन पाया है, लेकिन पहले की तुलना में स्थिति सुधरी है। कम से कम एशियाई देशों में तो भारत का जलवा हो ही गया है। कुछ समय पहले तक हिंदी में सौ करोड़ या उससे ज्यादा लागत में बनने वाली फिल्मों की संख्या गिनी-चुनी थी। भारतीय फिल्मों की बात करें तो मूल रूप से तमिल में बनी ‘रोबोट’ की लागत डेढ़ सौ करोड़ रुपए रही। उसी साल आई ‘बाहुबली’ जरूर लागत के मामले में ढाई सौ करोड़ की सीमा छूने में सफल हो गई।

‘कबाली’ ने साढ़े तीन सौ करोड़ रुपए की सीमा लांघ ली तो ‘2.0’ ने भी उसे टक्कर दी। अब ‘साहो’ की लागत चार सौ करोड़ रुपए बताई जा रही है।
भव्यता और संपन्नता के मामले में हॉलीवुड की फिल्में भले काफी आगे हैं, लेकिन एक मोर्चे पर हिंदी फिल्मों के बड़े सितारे हॉलीवुड की नामचीन हस्तियों तक को बराबर की टक्कर देते रहे हैं। यह मोर्चा है कमाई का। ‘फोर्ब्स’ पत्रिका की 2015 की सूची में पांच भारतीय फिल्मी सितारों को बेहद संपन्न माना गया था।

वैश्विक सूची में सलमान खान अमिताभ बच्चन के साथ संयुक्त रूप से सातवें स्थान पर थे। दोनों की कुल संपत्ति 213-213 करोड़ रुपए आंकी गई थी। आठवें नंबर पर 207 करोड़ रुपए की कमाई से अक्षय कुमार थे। फोर्ब्स ने अपनी सूची में शाहरुख खान को उन्नीसवें स्थान पर रखा और उन्हें कुल 165 करोड़ रुपए की संपत्ति का मालिक बताया गया था। यह तथ्य थोड़ा खटकने वाला था। दुबई की एक एजंसी ने 2014 में शाहरुख की संपत्ति और परिसंपत्ति छह हजार करोड़ रुपए से ज्यादा बताई थी।

क्या सच है, कुछ नहीं कहा जा सकता। इसी साल जारी एक सूची ने जरूर अपने सितारों को हॉलीवुड के स्टार्स की तुलना में पीछे छोड़ दिया है। यह आकलन हालांकि हॉलीवुड के पुरुष और महिला सितारों की वार्षिक आय में बढ़ते फर्क को दर्शाने के लिए किया गया था। इसमें जो आंकड़े दिए गए हैं उनके मुताबिक अक्षय कुमार की 2018 की अनुमानित आय 282 करोड़ रुपए है और मालदार फिल्मी सितारों की वैश्विक सूची में वे सातवें नंबर पर हैं। 270 करोड़ रुपए से सलमान खान नौवां स्थान हासिल कर पाए हैं।