इस विवेच्य कविता-संग्रह की अधिकतर कविताएं जीवन के वृहत्तर अभावों का पीछा करती दीखती हैं। कहीं-कहीं बेदी की कविता जनोन्मुखी तेवरों के साथ अपनी बात कहती भी लगती है। पर वास्तव में देखा जाए तो उनको ‘एकांत में शब्द’, ‘पर दुख एकल नहीं होता’, ‘पांच सितारों का जन्मदिन’, ‘राष्ट्र के साथ’ तथा ‘प्रेम की प्रयोगशाला’ जैसी कविताएं मानवीय ऊर्जा के रूबरू करवाती हैं जो वर्तमान कविता का पहचान बिंदु है।
आज, एक बार फिर हम गंभीर कविता के दौर में प्रवेश कर चुके हैं। जन्म से मरण तक का हमारा वास्ता कविता से संबद्ध है यानी कविता की महनीयता से हम मुखापेक्षी नहीं हो सकते। इस दृष्टि से विवेच्य संग्रह की कविताएं जनोन्मुखी जमीन की तलाश में मानवीय अनुभूति का सच्चा यथार्थ हमारे पाले में आ टिकता है। ‘वह अब नहीं तोड़ती पत्थर’, ‘नदी स्मृति में’, ‘नीड़ का चिंतन’ जैसी कविताएं पाठकों को त्वरित झकझोरती हैं और हादसे से उभरे आदमी से साक्षात कराती हैं। ‘बुद्धम शरणम् गच्छामि’ एक अद्भुत कविता है, लंबी कविता की गुणात्मकता लिए। संग्रह की कोई भी कविता ऐसी नहीं है, जो मात्र शाब्दिक साहस तक सीमित रही हो। कवि का हर कहन सहज-सरल भाषाजन्य है- राजनीति से नितांत परे होकर भी राजनीतिक है, उम्मीदों का वृहत्तर संसार रचता। बेदी की कविता मानवीय रिश्तों के चलते जीवन के बाह्य व अभ्यांतर को एक साथ समग्रता के साथ अभिव्यक्त करती है।
एकांत में शब्द : हरमहेंद्र सिंह बेदी; आस्था प्रकाशन, लाडोवाली रोड, जालंधर; 260 रुपए।
नीलकंठ : पराजय का विष और शिव
शिव- जड़ में चेतन का आभास। शिव आदि गुरु हैं, क्योंकि कहते हैं कि ये सबसे पहले थे। सबसे पहले अर्थात हमारे अस्तित्व से भी पहले। और यह सच है क्योंकि आर्यों के इस भूमि पर आने से पहले भी शिव थे, द्रविड़ों के देव के रूप में। आर्य यहां आए और द्रविड़ों से उनका संघर्ष शुरू हुआ, जिसकी परिणति थी देवासुर संग्राम। यह संग्राम आर्यों और द्रविड़ों के बीच अस्तित्व के लिए लड़ा गया युद्ध था, जिसमें आर्यों का नेतृत्व विष्णु ने किया तो द्रविड़ों की कमान शिव के हाथ थी। युद्ध में आर्यों की विजय हुई और शिव ने पराजय रूपी विष को गरिमा के साथ पिया।
विष्णु और शिव ने मिलकर आर्यों और द्रविड़ों के संघर्ष को सदा के लिए समाप्त करने के लिए आर्यों और द्रविड़ों का संविलियन कराया और दोनों के मिलन से एक नए धर्म- हिंदू धर्म ने जन्म लिया। हिंदू धर्म में शिव सबसे बड़े देव महादेव बन कर उभरे। शिव की विशालता ने आर्यों में उन्हें अति लोकप्रिय बना दिया और लाल वर्ण शिव को आर्यों ने अपना नील वर्ण देकर नीलकंठ बना दिया। कहते हैं कि ईश्वर की अनेक गाथाएं हैं, किसी एक की कल्पना इस किताब में की गई है।
नीलकंठ : पराजय का विष और शिव: संजय त्रिपाठी; मंजुल पब्लिशिंग हाउस, द्वितीय तल, उषा प्रीत कॉम्प्लेक्स, 42 मालवीय नगर, भोपाल; 295 रुपए।
मूर्ख बन कर जियो</p>
हिंदी साहित्य की अन्य विधाओं की भांति ‘व्यंग्य’ भी एक सशक्त विधा बनकर उभरी है। यों तो व्यंग्य का पुट अन्य विधाओं में भी कहीं न कहीं दिखाई पड़ जाता है, फिर भी अलग रूप में न होने से इसकी अभिव्यक्ति खुलकर नहीं हो पाती है। इसी पीड़ा को देश के तमाम व्यंग्यकारों ने शिद्दत से महसूस किया और व्यंग्य को स्वतंत्र विधा के रूप में स्थापित करने में अपना अमूल्य योगदान दिया।
समाज को प्रभावित करने, आह्लादित करने, जीवन में बढ़ती हुई विद्रूपताओं को मुखर करने एवं बात को फटाक से कह देने की जो क्षमता व्यंग्य में निहित है, अन्य किसी विधा में भला कहां? यह अपने पाठकों से सीधा संवाद करता है। इसे पढ़कर व समझकर लोग तिलमिलाते हैं और मुस्कुराते हैं। व्यंग्य का जादू सिर चढ़कर बोलता है, समाज की परत-दर-परत खोलता है।
‘मूर्ख बनकर जियो’ प्रख्यात साहित्यकार घमंडीलाल अग्रवाल की प्रथम व्यंग्य कृति है। कृति के सभी व्यंग्य लेखों के जरिए समाज की उस तसवीर को पाठकों के समक्ष लाया गया है जो सदा दर्पण के पीछे ही रहा करती है। समाज में व्याप्त कुरीतियों एवं व्यवस्थागत सवालों के अतिरिक्त राजनीतिक विसंगतियों की ओर भी इन लेखों में इशारा किया गया है।
मूर्ख बनकर जियो : घमंडीलाल अग्रवाल; इंडिया डिजिटल पब्लिशर्स, रेअर पोरशन, डब्ल्यू-116, ग्रेटर कैलाश-1, नई दिल्ली; 350 रुपए।
माउथ ऑर्गन
एक होती है ‘कहानी’, एक होती है ‘कहन’। कहानी और कहन में वर्णमाला के तीन अक्षरों की आवृत्ति के अलावा और एक समानता है, और वह है- कहना। कहानी कही जाती है और कहने की खास शैली कहन बन जाती है। एक लेखक अपनी कहन से पहचाना जाता है। कहानियों में घटनाएं तो होती हैं लेकिन कहानियां केवल घटनाएं नहीं होतीं। बहुत से महाआख्यान और महाकाव्य ऐसे हैं जिनकी कुलजमा कहानी को एक माचिस की डिबिया के पीछे लिखा जा सकता था, पर कहन ने उन्हें कुतुबकद बना दिया।
यह किस्सों की किताब है। कुछ कपोल कल्पना, कुछ आपबीती, कुछ दास्तानगोई, कुछ बड़बखानी। अंग्रेजी में जिसे कहते हैं- ‘नैरेटिव प्रोज’। वर्णन को महत्त्व देने वाला गद्य, ब्योरों में रमने वाला गल्प। आत्मकथा का एक भिन्न रूप जेएम कोएट्जी ने विकसित किया था और उसे ‘फिक्श्नालाइज्ड मेमॉयर्स’ कहा था। कुछ वैसी ही खुदकहानियां और आपबीतियां इस पुस्तक में भी हैं। ‘नॉवलिस्टिक एसे’ का एक रूप मिलान कुंदरा ने विकसित किया था। कुछ वैसे ही नेरेटिव निबंध भी यहां हैं।
माउथ आॅर्गन : सुशोभित; एका, वेस्टलैंड प्रकाशन, प्रथम मंजिल, ए ब्लॉक, ईस्ट विंग, प्लॉट नं. 40, एसपी इन्फोसिटी, डॉ. एमजीआर सलाइ, पेरूंगुडी, कंदनछावडी, चेन्नई; 175 रुपए।

