अकबर और तुलसीदास भारतीय इतिहास के दो समकालीन पात्र हैं, जिन्हें अपनी कल्पना के केंद्र में रख कर असगर वजाहत ने इस नाटक को रचा है। इतिहास में इसका कोई प्रमाण नहीं है कि कभी तुलसीदास और अकबर की भेंट हुई थी। लेकिन राजसत्ता और कला के पारस्परिक संबंधों पर विस्तृत चर्चा करने के लिए यह आवश्यक था कि दोनों की भेंट कराई जाए। सपने या कल्पना में तुलसीदास और अकबर एक-दूसरे से मिलते हैं। यह नाटक का अंतिम दृश्य है। इस दृश्य में ही राजसत्ता और कला के संबंधों की जटिलताओं को सामने रखा गया है।
नाटक के सभी प्रमुख पात्र बहुत जाने-पहचाने पात्र हैं। तुलसीदास भक्ति, समर्पण, भावनात्मकता, विद्वत्ता और कल्पना के धनी थे। राम के प्रति उनका समर्पण अद्वितीय था। उनका अभिनय करने वाले पात्र को लगातार कल्पना और यथार्थ के बीच आवाजाही करनी होगी। एक ओर तुलसी भक्ति और समर्पण के अथाह सागर में डूब जाते हैं, तो दूसरी ओर बड़ी सतर्कता से विसंगतियों का संयोजन करते हैं। वे अपने काम को बिना किसी बाधा के पूरा करने के लिए दुष्टों तक की स्तुति करते हैं, पर दुष्ट तुलसीदास का विरोध जारी रखते हैं। अत्यधिक विरोध होने और जान पर खतरा हो जाने के बाद भी उनकी प्रतिबद्धता, भक्ति और बल में कोई कमी नहीं आती। पुस्तकों से अधिक वह सामान्य ज्ञान पर विश्वास करता था। उसक व्यक्तित्व प्रतिभा और जिज्ञासा से भरा हुआ था। वह अपने को महाबली कहलाना पसंद करता था। ‘महाबली’ नाम का यही आधार है। लेकिन नाटक के अंत तक आते-आते यह विवाद का विषय बन जाता है कि महाबली कौन है। अकबर महाबली है या तुलसीदास। नाटक इस प्रश्न का उत्तर भी देता है।
महाबली : असगर वजाहत; राजपाल एंड संज, 1590, मदरसा रोड, कश्मीरी गेट, दिल्ली; 215 रुपए।
दक्षिणायन
दक्षिणायन की पांच कहानियों में प्रचंड प्रवीर द्वारा राशिचक्र की उन राशियों के अधीन कहानियां लिखी गई हैं, जिन पर उत्तरायण में नहीं लिखा गया था। ‘उत्तरायण’ और ‘दक्षिणायन’ में राशिचक्र का यह द्वि-भाजन सूर्य द्वारा राशिचक्र में किए गए परिभ्रमण के अनुसार होता है और इस प्रकार ये दो शीर्षक ‘राशिचक्र में सूर्य’ पर नजर रखते हैं जबकि कहानियों के शीर्षक अधिकतर ‘राशिचक्र में चंद्र’ पर। इसे ऐसे समझा जा सकता है कि अगर हम उदाहरण के लिए दक्षिणायन की पहली कहानी कर्क लेते हैं तो उसके पात्र पुष्य और अश्लेषा उन नक्षत्रों के नाम हैं, जिनमें चंद्रमा की मौजूदगी के समय किसी का जन्म होने से भारतीय ज्योतिष के अनुसार उसकी राशि कर्क कही जाएगी। चंद्रमा पूरे राशिचक्र (के 27 नक्षत्रों) की यात्रा लगभग तीस दिन में और सूर्य यही यात्रा एक वर्ष में पूरी करता है।
इस प्रकार भारतीय ज्योतिष के अनुसार एक तनाव इन दो खंडों के शीर्षकों और कहानियों के शीर्षकों में है, क्योंकि कहानियां राशियों के अनुसार हैं, जो राशिचक्र के चांद परिभ्रमण के अनुसार निर्धारित होती हैं, जबकि खंड राशिचक्र के सौर परिभ्रमण के अनुसार विभाजित है। पर यह तनाव केवल दो ग्रहों द्वारा राशिचक्र के अलग-अलग परिभ्रमण-समयों का नहीं है, इसका एक आध्यात्मिक संदर्भ भी है। इस तरफ ध्यान जाने से ये दोनों खंड जीव की पारलौकिक गतियों को समेटने का भी प्रयास करते लगते हैं।
दक्षिणायन : प्रचंड प्रवीर; नित्य प्रकाशन, डी 44, ज्योति मार्ग, बापू नगर, जयपुर; 275 रुपए।
जो पब्लिक चाहती है
शिक्षा और राजनीति वर्तमान जीवन के महत्त्वपूर्ण विषय हैं। देश का जीवन इनसे प्रभावित है। इनमें सुधार की आवाज बार-बार उठाई जाती है। प्रयास और प्रयोग निरंतर होते रहते हैं, लेकिन प्रगति नहीं दीखती। जनतंत्र को महत्त्व दिया गया, मगर किसी ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि यह तो भेड़ियाधसान है। नहीं तो तालियां बजा कर सरकार गिराने की प्रथा हमारे देश में नहीं थी। यही वह देश है, जिसका दिमाग तालियों में बसता है। बड़ी उम्मीद थी कि पब्लिक जो करेगी अपनी भलाई के लिए करेगी। लेकिन हर भलाई में मलाई मिल गई। पहले मलाई चाट लो फिर भलाई देखी जाएगी। महिलाओं और मर्दों की भीड़ देख लीजिए।
रसगुल्ले की दुकान पर भीड़ लगी है। कुछ लोग बांट रहे हैं और कुछ लोग बांटने का भरोसा दे रहे हैं। भोला जनतंत्र भरोसे की रस्सी पकड़े कुएं में लटका हुआ है। रस्सी टूट गई या छूट गई जो ‘जन गण मन विधायक जय हो’ होते देर नहीं लगेगी। ये पुलिस वाले बेचारे क्या करें? पब्लिक को सुधारते-सुधारते उनके लाखों डंडे टूट गए। डंडे से भी मजबूत पब्लिक की पीठ होती है। देवता लोग चकित हैं कि पब्लिक को कैसे समझाया जाय जिससे यह देश सुधर जाय। उस दीमक की दवा अपनी कलम से खोजने का प्रयास लेखक ने ‘जो पब्लिक चाहती है’ में किया है।
जो पब्लिक चाहती है : रमाशंकर श्रीवास्तव; एजुकेशनल बुक सर्विस, एन-3/25ए, डीके रोड, मोहन गार्डन, उत्तर नगर, नई दिल्ली; 400 रुपए।

