इस कथा-संग्रह में कुल नौ कहानियां हैं। सभी कहानियां लेखक को जीवन में प्राप्त अनुभवों से जन्मी हैं। पहली और शीर्षक कहानी ‘बंद होठों की चीत्कार’ लीक से हट कर लिखी गई कहानी है। परिस्थितिवश दो लोगों के मन में एक-दूसरे के प्रति एक अजीब-सा रिश्ता बन जाता है। कोई बातचीत नहीं, कोई वादा नहीं, कोई चाह नहीं, फिर भी उनके मन में एक-दूसरे के प्रति एक खिंचाव जन्म लेता है। कहानी की नायिका उस समय एकदम सकते में आ जाती है, जब उसकी खुशी के लिए एक युवक अपनी जान दे देता है। ‘फेसबुक प्रोफाइल’ आजकल के संचार युग की क्रांति फेसबुक के प्रभाव पर आधारित है। एक समय था जब पढ़ाई पूरी करने के बाद लोग बिखर जाते थे और जीवन में दुबारा मिलने-जुलने की बात असंभव-सी होती थी। पर फेसबुक के कारण कई दशकों से बिछड़े लोग मिलते हैं तो उनका अतीत उनके सामने से फिर से गुजरने का आभास देता है।
‘गड्ढे में गुरुजी’ कहानी हिंदी साहित्य में बड़े-बड़े लोगों की छोटी हरकतों को सामने लाती है। ‘जासूस’ कहानी पति-पत्नी के बीच पैदा हुए अनावश्यक शक, जबकि ‘मत छूना मुझे’ एक सवर्ण किशोर की एक दलित लड़की से उपजे प्रेम पर आधारित है। ‘वह टेलीफोन वाली लड़की’ लंबी कहानी है। विवाहेतर संबंध पर लिखी यह एक अलग-सी कहानी है। बंद होठों की चीत्कार: सुरेश्वर त्रिपाठी; विजया बुक्स, 1/10753, सुभाष पार्क, गली नं. 3, नवीन शाहदरा, दिल्ली; 295 रुपए।
ठसक
इस पुस्तक की कहानियों में इसी दौर में जन्मे नए कथाकार जैसी ताजगी और सहजता के साथ इन सब चीजों से बनते नए वक्त और नए नागरिक के चित्र खींचे गए हैं। और यह सुनी-पढ़ी सूचनाओं के नहीं, प्राथमिक और आंखों देखे अनुभवों के चित्र हैं। मशीनी सुगमता में बीतते जीवन ने अपने को इन कहानियों में इतने स्पष्ट रूप से रेखांकित किया है कि भाषा और कहन के प्रवाह में डूबा पाठक भी, उन्हें महसूस करने से नहीं बच पाता। उनकी कहानियां नारीवादी न होकर नारी के यथार्थ की रचनाएं हैं। रचनाओं में भाषा की विदग्धता, हास्य में तुर्शी और तुनकमिजाजी रहती है जो चरित्रों, स्थितियों, परिवेश की गहन परतों को भी सामने लाती हैं।
‘ठसक’ कहानी जीवंत और ज्वलंत प्रश्नों को उठाती है, जो हमेशा से साहित्य के केंद्र में पुरानी पीढ़ी और नई पीढ़ी का द्वंद्व, स्त्री विमर्श और स्त्री लेखन, ज्यादा या कम लिखना, अखबार में छपी सच्ची खबर और कहानी, यथार्थ-यथार्थवाद का अंतर, बाजारवाद तथा अच्छी रचना के मानक इत्यादि पर यह कहानी बेबाकी के साथ विचार करती है। लेखिका ममता कालिया की महत्त्वपूर्ण खासियत उनकी कथा-भाषा है। यह कथा-भाषा ही रचनात्मक तटस्थता को संभव करती है। भाषा में करुणा, व्यंग्य, विट, खिलवाड़ उनकी रचनात्मक जरूरत के अनुरूप आवाजाही करते हैं।
ठसक: ममता कालिया; लोकभारती प्रकाशन, पहली मंजिल, दरबारी बिल्डिंग, महात्मा गांधी मार्ग, प्रयागराज; 125 रुपए।
अमृतसर 1919
जैसा कि किताब के शीर्षक से ही जाहिर हो जाता है कि जरूर इसका संदर्भ जलियांवाला बाग की घटना से होगा। अमृतसर के जलियांवाला बाग में हुए हत्याकांड की पृष्ठभूमि पर लिखा यह उपन्यास उस समय के माहौल का अत्यंत सजीव चित्रण प्रस्तुत करता है। अप्रैल 1919 में अंग्रेजों ने रौलेट एक्ट के जरिए भारतीय नागरिकों की हर किस्म की आजादी पर पूरा नियंत्रण करने की तैयारी कर ली। इस कानून के खिलाफ देश भर में विरोध हो रहे थे। 30 मार्च 1919 से 10 अप्रैल 1919 तक अमृतसर के लोगों ने ऐसा प्रतिरोध किया कि वहां के प्रशासन ने अमृतसर के लोगों को सबक सिखाने की ठान ली। 13 अप्रैल को बैसाखी का त्योहार मनाने हजारों की तादाद में लोगों का जलियांवाला बाग में जमघट हो गया। इन निहत्थे लोगों पर अंग्रेजों ने बिना कोई चेतावनी दिए गोलियां चलानी शुरू कर दीं जिसमें हजारों की जानें गर्इं और हजारों लोग घायल हो गए। निर्मम क्रूरता ने वहां के लोगों के बसे-बसाए घर-परिवार एक पल में उजाड़ दिए और उनकी जिंदगी तहस-नहस हो गई। देशभक्ति और अंग्रेजों के प्रति विरोध के जज्बातों के बीच जूझता अमृतसर का आम नागरिक…। यही इस पठनीय उपन्यास का ताना-बाना है। उपन्यास की भाषा-शैली में गजब रवानगी है। बीच-बीच में आए अंग्रेजी संवाद उपन्यास को और प्रभावी बनाते हैं।
अमृतसर 1919: रजनीश धवन; राजपाल एंड संज, 1590, मदरसा रोड, कश्मीरी गेट, दिल्ली; 275 रुपए।

