रागिनी सांकृत 

चिंता व्यक्ति की निद्रा में कितनी बड़ी बाधा है इसका अहसास आज बद्रीबाबू को हो रहा था। रात में सोने से पहले वे अपने मोबाइल में तड़के चार बजे का अलार्म लगाना तो न भूले, पर कंबख्त नींद मानो कोसों दूर थी। पत्नी भी घर के कामों को जल्दी-जल्दी समेट रही थी। पत्नी जैसे ही कमरे में दाखिल हुई बद्रीबाबू ने कहा: ‘अगर सुबह पहले तुम्हारी नींद खुले तो मुझे भी जगा देना। कल हम लोग टहलने नहीं जाएंगे, कहीं कोई सुबह-सुबह मिल गया तो गपियाने में देर हो जाएगी।’ आज तो उन्हें अपने मोबाइल के अलार्म पर भी भरोसा नहीं था। बस एक ही चिंता बार-बार सता रही थी कि कहीं सुबह देर न हो जाए। चिंता क्यों न हो, अपने अध्यापकीय जीवन में उन्हें पहली बार ध्वजारोहण का मौका जो मिला था। साथ ही देश के नैतिक पतन पर भाषण भी देना था।
इस मौके पर भाषण देने की चिंता उन्हें रत्ती भर नहीं थी, क्योंकि उसमें तो वे सिद्धहस्त थे। उन्हें चिंता सिर्फ इस बात की थी कि वे समय पर पहुंच कर झंडा फहराएं और डोरी ठीक से खींचें, ताकि फूल बिखेरते हुए झंडा हवा में लहराने लगे। कल कौन-सा कपड़ा पहनेंगे इसका निर्धारण एक सप्ताह पहले ही हो गया था। कुर्ते पर फबती हुई बंडी खादीग्राम से पहले ही खरीद ली गई थी। रात में सोने से पहले सैंडिल भी पालिश कर लिए गए थे। मन ही मन सभी चीजों की तहकीकात करते हुए समय पर उठने की धुकधुकी के साथ बद्रीबाबू सोने की कोशिश करने लगे।
कब नींद लग गई, पता भी नहीं चला। लेकिन सुबह आलार्म बजने से पहले फोन की घंटी घनघना उठी। किसी अनहोनी की आशंका से बद्रीबाबू ने अर्धनिद्रा में हड़बड़ा कर मोबाइल कान पर लगाते हुए अलसाई आवाज में कहा- हेलो! उधर से आवाज आई, ‘भइया माई ना रहली!’ ‘क्या?’ नींद को झिड़कते हुए उन्होंने फिर से पूछा- ‘क्या?’ फिर उधर से भर्राई हुई आवाज में वही संदेश मिला। ‘कब?’ ‘अभी-अभी भोर में।’ ‘ओह हो!’ अफसोस जाहिर करते हुए बोले: ‘अरे! होनी को कौन टाल सकता है, विधि की लेखनी को कौन मिटा सकता है, तुम लोग इस दुख की घड़ी में धैर्य से काम लेना, भगवान छोटी मां की आत्मा को शांति दे।’ सांत्वना देते हुए उन्होंने फोन काट दिया और बड़बड़ाए- ‘लो छोटी मां को भी आज ही मरना था! आज मेरे लिए कितना ऐतिहासिक दिन है। पहली बार जीवन में मौका मिला है, इतने दिनों की मेहनत और लगन का यह फल महाविद्यालय का प्राचार्य पद और यह सुनहला मौका और अब सुबह-सुबह ही यह सब झमेला।’ सोच-सोच कर सिर भन्नाने लगा।

बद्रीबाबू की अचकचाहट और लगभग चीत्कारानुमा प्रतिक्रिया से पत्नी भी उठ बैठीं। बद्रीबाबू ने उन्हें चाची की मृत्यु की खबर देते हुए मायूसी भरे लहजे में कहा: ‘अब क्या किया जाए? छोटी मां को भी आज ही दुनिया से विदा लेना था। ध्वजारोहण का मजा तो किरकिरा हो ही गया, अब तो यह भी सोचना होगा की दो दिन बाद बेटे की नौकरी की खुशी में जो पार्टी रखी है उसका क्या होगा? कैटरर से लेकर केक वाले तक को बयाना दे दिया गया है।’
छोटी मां का मरना जी का जंजाल बनता लग रहा था। पति के माथे पर जाड़े के मौसम में पसीना चुहचुहाता देख कर प्यार और खीझ कर पत्नी बोली: ‘आप भी नाहक परेशान हो रहे हैं। अब आप उठिए और जल्दी से तैयार हो जाइए। आज वाकई खुशी का दिन है, इसलिए निश्चिंत होकर झंडा फहराने जाइए। मैं आपका कुर्ता-बंडी अलमारी से निकाल देती हूं। हां, एक बात और, आप अपना मोबाइल घर पर ही छोड़ जाइएगा। मैं गांव के नंबर को ब्लाक लिस्ट में डाल दूंगी, ताकि सभी झंझटों से मुक्ति मिले। आपके भाई-बहन का फोन आएगा, तो मैं संभाल लूंगी। बस आप अपना मुंह बंद रखिएगा, क्योंकि आपका कुछ पता नहीं कि आप कब भावनाओं में बह जाएं और पार्टी का मजा किरकिरा हो जाए।…

‘हां, मैं तो भूल ही गई कि दो-तीन दिन बाद एक रिश्तेदार के यहां शादी में भी जाना है। वहां जाने पर लोगों से कांटेक्ट बनेगा, ऐसी शादियों में आने-जाने से ही नए रिश्ते बनते हैं। बेचारे वे भाई साहब कार्ड देने घर तक आए थे। कितना आग्रह किया था शादी में आने के लिए।’ पत्नी के चेहरे पर एक अलग तरह की चमक थी। ‘अच्छा सुनिए न! शादी में जाएंगे तो लगे हाथ मायके भी हो लूंगी। एक पंथ दो काज। ऐसे भी मां से मिले कितने दिन हो गए। रोज फोन करके हालचाल तो ले ही लेती हूं, लेकिन जाकर मिलना अलग बात है। लोगों को भी पता हो कि मैं भी मां को देखने आई हूं। बेचारी बीमार भी रहने लगी हैं।… आप बस सब कुछ मेरे पर छोड़ दीजिए और बेफिक्र होकर अपने कार्यक्रम में जाइए।’ यह सुन कर बद्रीबाबू के चेहरे पर इत्मीनान का भाव जागा। वे उठे और गुसलखाने में घुस गए। अचानक त्याग की भावना उनके मन में जागी। बचपन की यादें परत-दर-परत खुलने लगीं। छुट्टियों में गांव पहुंचने पर छोटी मां के चेहरे पर जो खुशी उभरती थी, वह कैसे गांव से लौटते वक्त गम में बदल जाती थी वह सब दृश्य चलचित्र की भांति आंखों के सामने दीखने लगे। छोटी मां लोगों को बड़ी खुशी से बताती थीं कि ‘बबुआ लोग शहर में रहेलन बड़का आदमी बारन।’ एक क्षण में छोटी मां के कितने रूप सामने आ रहे थे। मिट्टी के चूल्हे पर खाना जल्दी बनाने और खिलाने की हड़बड़ी रहती थी। छोटी मां के पैर में चक्करघिन्नी बंध जाती थी। फिर खाने के बाद दूध पीने का आग्रह। मिट्टी के बर्तन में खूब औंटाया हुआ मोटी मलाई वाला एक कटोरा दूध। मिट्टी का सोंधापन लिए दूध का वह कटोरा आंखों के सामने घूम गया।

तभी बाहर से पत्नी की आवाज और बाथरूम का दरवाजा खटखटाने से तंद्रा टूटी, ‘क्या कर रहे हैं? बाथरूम में ही सो गए क्या? और लोगों को भी जाना है।’ छोटी मां का वह चेहरा, लकड़ी के धुएं से मिचमिचाती वे आंखें, आंखों के सामने से ओझल होने लगीं। अतीत के सुनहले संसार से यथार्थ के कठोर धरातल पर आते ही सब कुछ बदल गया। बद्रीबाबू हड़बड़ा कर कमोड से उठ कर सीधे शावर के नीचे खड़े हो गए। फिर सोचने लगे, आज भाषण की शुरुआत जरा धमाकेदार होनी चाहिए। ऐसी स्पीच दंू कि बस तालियां बजती रहें, रुकें नहीं। अचानक आंखों में बच्चों की आखों वाली चमक जागी, अरे, कल के अखबार का मुख्य मुद्दा ही तो विश्वविद्यालय में दो छात्रगुटों की आपसी रंजिश और बढ़ते तनाव का था। आजकल के छात्रों को पढ़ाई-लिखाई से ज्यादा राजनीति और झगड़ा-फसाद करने मे मन लगता है। बच्चों में मोरल वैल्यू नाम की कोई चीज बची ही नहीं है। यह समाज कितना असंवेदनशील हो गया है।… इस पर तो मैं पूरे दिन भाषण दे सकता हूं, कौन-सी बड़ी बात है? यह तो एक कला है, बस भाषा पर अपनी पकड़ होनी चाहिए।… अब जल्दी से तैयार होकर निकल लूं। थोड़ा जल्दी पहुंच कर वहां की व्यवस्था का भी मुआयना करना होगा।

निकलते-निकलते पत्नी को आवाज दी: ‘हां वो गांव वाला लफड़ा तुम संभाल लेना, ऐसे भी मैं तुम्हारे रहते बिल्कुल निश्चिंत रहता हूं। पत्नी रूमाल थमाते हुए बोली: ‘हां एक बात मेरी भी ध्यान से सुन लीजिए। किसी से आज भूल कर भी चर्चा नहीं कीजिएगा कि छोटी मां का देहांत हो गया है।’  ‘लेकिन अगर दसवें के दिन सिर मुड़ाएंगे तो लोगों को पता तो चलेगा ही’, बद्रीबाबू ने आशंका जताई। ‘सिर मुड़ाने का सवाल ही नहीं उठता’, पत्नी नें प्रत्युत्तर में कहा। ‘गांव जाना नहीं है कि वहां के लोग देखेंगे और इस महानगर की आपाधापी में किसी को इतनी फुर्सत कहां कि वह इन सबकी तहकीकात कर सके।’ अपनी पत्नी की सूझ-बूझ और दुनियादारी के कायल बद्रीबाबू के चेहरे पर मुस्कान आई। वे ध्वजारोहण के लिए निकल पड़े।  इधर पत्नी भी पार्टी में किन-किन लोगों को बुलाएं और किसे नहीं, सोचने में मशगूल हो गई। जो गांव से संबंधित हैं उन्हें छोड़ दिया जाए, नहीं तो पार्टी की उड़ती-उड़ती खबर गांव में पहुंचेगी और लोग क्या सोचेंगे।… वैसे भी लोग क्या सोचेंगे, उससे मुझे क्या लेना-देना। मैं क्या सोचती हूं यह मेरे लिए मायने रखता है। बेफिक्री से मन ही मन मुस्काई। इतने में लैंड लाइन की घंटी बजी। उठाते ही उधर से आवाज आई- ‘भाभी भइया के मोबाइल कवरेज क्षेत्र से बाहर बतावता।… माई के दाह-संस्कार हो गइल… तेरहवीं में रउवा लोग जरूर आइब।…’ उधर से याचना भरा स्वर सुनाई दिया।

‘अरे, आप लोग परेशान मत होइए, हमलोग गांव जरूर आएंगे। इसी दुख-सुख में तो परिवार काम आता है, आखिर हम लोग हैं किस दिन के लिए। इतना भरा-पूरा परिवार छोड़ कर छोटी मां गई हैं, उनकी कमी…।’ सुबकते हुए पत्नी ने कहा, ‘आप लोग काम-क्रिया की तैयारी कीजिए। अब फोन करने की जरूरत नहीं है, हम लोग रिजर्वेशन करा लेंगे।’ कहते हुए रिसीवर रख दिया। एक लंबी सांस लेते हुए नौकर को बाहर लॉन में चाय लाने को कह कर पार्टी की लिस्ट लेकर चली गई। सोचने लगी, पार्टी के दिन केक पहले कटेगा या बाद में। अगर बाद में कटेगा तो स्वीट-डिश की जगह पर हो जायगा। हां, यह आइडिया ठीक है।… हां, मि. रॉय को तो इस पार्टी में बिल्कुल नहीं बुलाऊंगी। कितनी बार उनको खाने पर बुला चुकी हूं, पर उन्हें कभी नहीं बना कि एक बार भी हमको बुलाएं।, किसी काम लायक नहीं हैं।… हां, मि. सिंह को भी नहीं। इनका इतना बड़ा परिवार है, सबको लेकर आ जाते हैं, गिफ्ट एक और खाते पांच-पांच जने हैं।… लिस्ट से बहुतेरे तथाकथित नाकाम, नासमझ लोग निकल गए या अपनी बुरी आदतों या व्यवहारों के कारण निकाल दिए गए। फिर मायके, ससुराल, दोस्त, रिश्तेदारों को आमंत्रण दिया जाने लगा।

ध्वजारोहण कर जब बद्रीबाबू लौटे तो चहकते हुए पत्नी से बोले- ‘पार्टी का निमंत्रण दे दिया? सबको याद कर बुलाना, कोई छूटे नहीं। हां मि. दयाल को जरूर बुलाना, सपरिवार आने का आग्रह भी करना। आजकल शिक्षा विभाग में बहुत ऊंचे ओहदे पर हैं। पता नहीं कब जरूरत पड़ जाए। संबंध बना कर रखना चाहिए। पत्नी के साथ मिल-जुल कर लिस्ट में बचे लोगों को निमंत्रण दिया जाने लगा। पति-पत्नी के बीच गुफ्तगू जारी थी। पत्नी ने कहा- ‘हां, पार्टी में आपके भाई-बहन भी आएंगे। उनको मैं गांव न जा पाने की अपनी असमर्थता बता दूंगी, और उन्हें कह दूंगी कि उन लोग को गांव जाना है तो अपना देख लें। आप बस अपना मुंह बंद रखेंगे, मैं आपको बार-बार चेता रही हूं।’ बद्रीबाबू ने पत्नी से धीमे स्वर में सकपकाते हुए पूछ लिया- ‘सुनो न, मेरे मन में एक खयाल आया है कि क्यों न ऐसा करें कि वहीं ससुराल से लौटती टिकट गांव का ले लें, दूसरे दिन ही तो छोटी मां की तेरहवीं है। उसमें भी हम लोग शरीक हो जाएंगे। गांव में भी मान रह जाएगा। गांव में इज्जत बहुत प्यारी चीज होती है, मुंह पर तो नहीं, पीठ पीछे दबे स्वर में चर्चा तो होती ही है।…’

पत्नी ने आग्नेय नेत्रों से पति को देखा। वे सहम गए और आंखें झुका कर बोले- ‘ऐसे ही मन में आया तो सोचा कि एक बार तुमसे राय ले लूं। वैसे तुम जैसा उचित समझो।…’ पत्नी के चेहरे पर विजय की मुस्कान दौड़ गई। मन ही मन बुदबुदाई, गांव जाने का मतलब खर्चे का घर। पचास दुनियादारी निभाना। इससे अच्छा तो न ‘ऊधो का लेना, न माधव को देना’। चहकते हुए बोली- ‘हां, और आज का कार्यक्रम कैसा रहा? मुझे पता है आप तो वहां जमा दिए होंगे।’
बद्रीबाबू एक फीकी मुस्कान छोड़ते हुए अपने कमरे के तरफ चल दिए। भाषण, तालियों की गड़गड़ाहट, बच्चों में नैतिक पतन… छोटी मां का ममतामयी चेहरा… पूरे कमरे में चक्कर काट रहा था।  पार्टी वाले दिन पूर्ववर्ती योजना के अनुसार छोटी मां की तेरहवीं में शरीक होने की चर्चा को केंद्र में रख कर सारी बातें होने लगीं। इधर अनुजों ने भी परिस्थतिजन्य अपने-अपने औजार तेज कर रखे थे। वे सब अपनी-अपनी व्यस्तता का रोना लेकर बैठ गए। असल में बड़े-बड़े ओहदे, बड़े-बड़े काम। और चाचा छोटे किसान, न बेटा न बहू। बेटे के चक्कर में बेटियां ही बेटियां।

बद्रीबाबू ने बात शुरू की- ‘सुनो, मैं व्यस्त हूं। तुममें से कोई एक भी चला जाए तो समाज में इज्जत रह जाएगी।…’ बात पूरी भी न हो पाई थी की मंझले भाई ने कहा, ‘अरे, हम कैसे जाएंगे! मैंने तो पहले ही बता दिया था कि मुझे इसी हफ्ते मद्रास एक इंटरव्यू लेने जाना है। फ्लाइट का टिकट भी बहुत पहले से बुक करा लिया था, वह भी नॉन रिफंडेबल।…’ अब क्या किया जाए? सभी बंधु-बांधव अपनी-अपनी सौभाग्यवतियों से सलाह लेने लगे। छोटकी बहू की राय थी कि लोकाचार के लिए बस छोटी मां के श्राद्ध में कुछ पैसे भेज कर छुटकारा पाया जाए। गांव में थोड़े से पैसे का भी बहुत महत्त्व होता है। अब जो चला गया, सो चला गया, जीते जी कभी मान-सम्मान की बात तो हम लोगों के जेहन में नहीं आई, पर मरने पर लोकाचार तो करना ही होगा न। सशरीर न सही, पैसे से ही सही। अभी तो मुझे सांस लेने की भी फुर्सत नहीं है।… पतिदेव महोदय ने अपनी अर्धांगिनी का मान-मनौवल करते हुए धीमे से कहा- ‘केवल पैसा भेज देना प्रीतिकर न होगा। हममें से कम से कम किसी एक को तो थोड़ी देर के लिए ही सही, वहां जाना चाहिए। छोटी मां हमारे गांव पहुंचने पर कितना खुश होती थीं। उस समय उनके चेहरे पर जो गर्व झलकता था वह भी हमें याद रखना चाहिए। हमको क्या, तुमको भी तो गांव जाने पर लोग हथेली पर रखते हैं। मेरी चचेरी बहनें तुमको हमेशा रानी की तरह घेरे रखती हैं। तुम्हारी हर छोटी-छोटी चीज का खयाल रखती हैं। तुम्हें थोड़ा प्रैक्टिकल होकर सोचना चाहिए।’

‘तो, आप क्या चाहते हैं कि मैं इस ठंडी में गांव चली जाऊं? बोली न, कि पैसा भेज दूंगी। तुम कुछ ज्यादा ही सेंटी हो रहे हो। हां, अगर तुम्हें जाना है तो जाओ, कोई रोका है तुम्हें, मैं तो नहीं जाने वाली।’ वह उठ कर चली गई। पर समस्या यथावत थी। छोटी मां की तेरहवीं में जाने का प्रसंग जस का तस था।
मंझली बहू अंत में खीझ कर अपने पति से बोली- ‘आप लोगों को जहां-जहां जाना है, निश्चिंत होकर जाएं और जहां तक गांव जाने की बात है, मैं वहां अकेले चली जाऊंगी।’ अब तक अकेले घर की देहरी से बाहर पांव न रखने वाली एक सामान्य गृहिणी के लिए यह कोई आसन निर्णय न था। पर बेबस ननदों की वह गुहार कि ‘लोग क्या सोचेंगे…’ उसके कानों में गूंज और विचलित कर रही थी। छोटी मां का ‘दुलहिन’ संबोधन कानों में जैसे अटक-सा गया था। मंझली बहू अपनी स्मृति के पन्नों को पलटने लगी थी- अपनी सासू मां नहीं थीं, छोटी मां ही सास का हर धर्म निभाती थीं। हमेशा सास का प्यार -दुलार उड़ेलती रहती थीं। बहुओं को तो पलकों पर बिठाए रखती थीं। वे हमेशा नई-नवेली दुल्हन के रूप में ही हमें रखना चाहती थीं।… उनकी प्यार भरी बातें कानों में गूंजने लगीं। अब वह आवाज सुनने के लिए कान तरस जाएंगे।… अब परिवार में बचा ही कौन? एक पीढ़ी का अंत हो गया…  मंझली बहू ने अपने निर्णय को क्रियान्वित किया और तत्काल में आरक्षण करा कर ट्रेन में बैठ गई। जैसे-जैसे रेलगाड़ी दिल्ली से गांव की तरफ बढ़नें लगी मिट्टी और पुआल की खुशबू नाकों से टकराने लगी। मंझली बहू सोच रही थी, ‘काश, आज चाचाजी का भी ओहदा बड़ा रहा होता तो आज मैं अकेली नहीं, पूरा परिवार गांव जा रहा होता। ०