वेंकटेश कुमार

महिलाएं शारीरिक रूप से पुरुषों की अपेक्षा कमजोर होती हैं।’ जो इस स्थापना में विश्वास करते हैं, उन्हें उत्तराखंड की महिलाओं की दिनचर्या का अध्ययन करना चाहिए। कृषि से संबंधित नब्बे फीसद कार्य महिलाएं ही करती हैं। जंगल से लकड़ी और झाड़ काटकर 40-50 किलो के बोझ को पहाड़ की खड़ी चढ़ाई चढ़ते हुए करीब 3-4 किलोमीटर की दूरी तय करके घर पहुंचना वहां की तमाम महिलाओं की दिनचर्या है। सुबह-सुबह सिर पर घास और गोबर की पोटली उठाए अपने खेत की ओर जा रही जो मानव-आकृति दिखाई देती है वह शर्तिया स्त्री ही होती है। जो लोग मानते हैं कि दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में रहने वालों की जिंदगी बड़ी तेज होती है और उनके पास घड़ी देखकर समय बताने का भी वक्त नहीं होता, उन्हें पहाड़ की महिलाओं से तब कुछ पूछने का प्रयास करना चाहिए, जब वे जंगल या खेतों में काम करने जा रही होती हैं। उनका एक ही जवाब होता है-अभी तो मेरे पास पानी पीने की भी फुर्सत नहीं है। दरअसल ज्यादा से ज्यादा झाड़ और लकड़ी काटकर ये महिलाएं ठंड के मौसम में इस्तेमाल के लिए जमा कर लेना चाहती हैं।

झाड़ जानवरों के लिए और लकड़ी भोजन बनाने के लिए। खुद के इस्तेमाल से ज्यादा झाड़ और लकड़ी जमा करके इसे बेचकर पैसा भी कमा लेती हैं। यहां खेतों में मजदूरी करने का प्रचलन आज भी बहुत कम है। महिलाएं आपस में मिलकर एक-दूसरे का काम निपटा देती हैं। हां, मजदूर के रूप में खेतों में काम करने वाले कुछ नेपाली अवश्य देखने को मिल जाते हैं। सवर्ण महिलाएं भी न सिर्फ खेतों और जंगलों में काम करने जाती हैं बल्कि वे पत्थर तोड़ने से लेकर सड़क बनाने तक का काम कर लेती हैं। इस दृष्टि से उन पर पुरुषों की ओर से कोई बंदिश नहीं होती। तो क्या ‘घर की चारदीवारी में कैद स्त्रियां’ जैसा जुमला पहाड़ की महिलाओं के लिए अर्थहीन है? शायद नहीं। फर्क बस यही है कि इन महिलाओं के लिए घर की चारदीवारी उनके खेत और जंगल तक पहुंचकर खत्म होती है।

सवाल उठता है कि परिवार की अर्थव्यवस्था की रीढ़ और शारीरिक रूप से मजबूत इन महिलाओं को क्या पितृसत्तात्मक दमन का सामना नहीं करना पड़ता? शायद कुछ ज्यादा ही। यहां की महिलाओं को जिस चीज से सबसे ज्यादा जूझना पड़ता है, वह है- पति की नशाखोरी। आंकड़े बताते हैं कि पुरुषों का बड़ा भाग नशाखोरी की गिरफ्त में है। पिछड़े से पिछड़े गांवों में भी देशी और विदेशी शराब आसानी से उपलब्ध हो जाती है। महिलाएं पहले तो नशे में धुत अपने पति की हिंसा का शिकार होती हैं और उनकी तबीयत खराब होने पर इलाज की व्यवस्था भी करती हैं। एक रिपोर्ट में बताया गया कि बागेश्वर जिले में करीब तीस महिलाएं अपने पति को छोड़कर दूसरे पुरुष के साथ रहने चली गर्इं। इनमें से कुछ महिलाएं ऐसी भी हैं जो अपने बच्चों को छोड़कर घर से भाग गर्इं। पुलिस ने जब इन महिलाओं से पूछताछ की तो वे अपने पति के साथ रहने को तैयार नहीं हुर्इं। इस पहाड़ी राज्य की कृषि की स्थिति भी दयनीय है। ऐसे परिवारों की संख्या बहुत कम है जो अपने खेतों से साल भर खाने के लिए अन्न पैदा कर लेते हों। अनाज बेचकर पैसा कमाने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। इन क्षेत्रों में संतरा और नासपाती जैसे फल पर्याप्त मात्रा में होते हैं। लेकिन बिक्री की समुचित व्यवस्था न होने के कारण किसानों को कुछ खास फायदा नहीं हो पाता। एक किसान ने बताया कि कोई एक रुपए प्रति किलो नासपाती लेने को भी तैयार नहीं होता। ये परिस्थितियां उस विडंबना को पैदा करती हैं जिसे हम पलायन के नाम से जानते हैं। स्त्रियां ही खेती-किसानी का काम देखती हैं। पुरुष बाहर जाकर काम करते हैं।

उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है। यहां बच्चों को जो पहला पाठ पढ़ाया जाता है, वह है- ‘ईश्वर से डरो।’ तो महिलाएं भी- ‘ईश्वर की यही मर्जी थी’, मानकर सब कुछ बर्दाश्त कर लेती हैं। मासिक धर्म के समय भी महिलाओं की स्थिति बहुत नाजुक बना दी जाती है। फिर भी खेतों और जंगलों-पहाड़ों में काम के मोर्चे पर डटी रहती हैं। सचमुच में स्त्रियों की सहन शक्ति और शारीरिक क्षमता को देखना हो तो उत्तराखंड को देखना चाहिए। एक महिला ने कहा कि उसकेलिए तो दर्द ही उसकी दवा है। १