उस गांव में, जहां आज भी किसी डॉक्टर से मिलने के लिए सत्तर किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है, वह भी बर्फबारी में अगर रास्ता बंद न हो तब। जहां शाम को सूरज ढलने के बाद अब भी लकड़ी की मशाल और कैरोसीन वाली लालटेन जलती हों, उन कटी हुई अंगुलियों की दास्तान पर मेरी हैरानी को चुपचाप तकता हुआ दर्दपुरा जैसे हौले-हौले मुझे चिढ़ा रहा था।
क्या बताएं डॉक्टर साब, उसे एके-47 से इश्क हो गया और छोड़ कर चली गई हमको।’ कहते-कहते माजीद की आंखें भर आई थीं। माजीद यानी माजीद अहमद वानी। उम्र करीब सैंतीस-अड़तीस। मुझसे बस कुछेक साल बड़ा। मेहंदी से रंगी सफेद दाढ़ी पर चढ़े हल्के भूरे रंग की परत उसकी आंखों के कत्थईपन को जैसे सार्थक करती है। करीब छह महीने पहले जब मैंने क्लीनिक खोली, कुपवाड़ा के मेन मार्केट से थोड़ा-सा आगे, तो माजीद का फार्मेसी में डिप्लोमाधारी होना मेरे लिए इस दूर-दराज इलाके में सुकून से भर गया था। परिचय यहीं के एडिशनल एसपी ने करवाया था, यह कहते हुए कि अच्छा नौजवान है, आसपास के औसत युवाओं से एकदम अलग सोच वाला और सुलझा हुआ।
एडिशनल एसपी सुरेश रैना खुद बड़े मिलनसार और सुलझे हुए निकले। जम्मू से घर छोड़ते समय, जब पापा और मां के लाख समझाने पर भी मैं राजी नहीं हुआ था अपनी प्रैक्टिस घर के आसपास जमाने के लिए, तो पापा ने अपने बचपन के मित्र का हवाला दिया था। एडिशनल एसपी पापा के उसी मित्र के इकलौते पुत्र थे। कश्मीर आकर इस सुदूर कुपवाड़ा में क्लीनिक खोलने की मेरी जिद के पीछे जहां मेडिसीन के खुदा, हिप्पोक्रेट्स की फिलॉसफी को अंगीभूत करने का एक तरह का रोमांटिसिज्म था, वहीं दूसरी ओर बत्तीस-तैंतीस वर्ष पहले अपने पूर्वजों की जमीन से जबरन बेदखल कर दिए जाने के प्रतिरोध को आत्मसात करना भी था। नब्बे के दशक के उन शुरुआती वर्षों के खौफ की दास्तान जाने कितनी बार मां-पापा और दीदी से सुन और उनकी आंखों में जीवंत होते देख चुका हूं। जम्मू के शरणार्थी शिविर में बीता बचपन, पापा की कश्मीर यूनिवर्सिटी से छूट गई प्रोफेसरी, फिर जम्मू के एक कॉलेज में लग जाना और मां के बुटीक-शॉप का अपना मुकाम बनाना, दीदी और मेरी पढ़ाई का खर्चा और ठीकठाक मध्यवर्गीय जीवन निकाल ले गए।
जम्मू मेडिकल कॉलेज में मेडीसिन की पढ़ाई के दौरान ही बावरे मन की बावरी बातों में आकर अपनी प्राइवेट प्रैक्टिस मैंने कुपवाड़ा में शुरू करने का निर्णय ले चुका था। दोस्तों ने यों तो बहुत समझाने की कोशिश की थी कि कहां उस मिलिटेंसी की तपिश में सुलग रहे इलाके में जा रहे हो, कश्मीरी पंडितों के लिए अब भी वह हिस्सा सुरक्षित नहीं है। कश्मीर में ही करना है तो श्रीनगर में बेस बना लो, कुपवाड़ा हॉट है…, लेकिन इस जानिब नासमझ-सी धुन थी कि बस किसी जिद्दी की तरह गले में पैठ गई थी। फिर काजीगुंड के किसी गांव में सेबों का पैतृक बगान और लकड़ियों के बने एक घर, जिनकी धुंधली स्मृतियां तीन वर्षीय बालमन के चिलमन से अब भी कई बार एकदम से उभर आती हैं, की झलक देखने की इच्छा इस धुन को सप्तम पर लिए जाती थी।
क्लीनिक शुरू हुए दूसरा दिन था और कुपवाड़ा में आए एक हफ्ता बीता था, जब मार्च की एक ठिठुरती दोपहर को माजीद आया था मिलने मुझसे, एडिशनल एसपी साब के हुक्म पर।
‘सलाम वलेकुम, साब! वो डॉक्टर अशोक भान आप ही हैं?’ किसी गहरे कुएं से आती हुई एक अजब-सी कशिश से भरी आवाज वाला माजीद अहमद वानी उस दिन से मेरा लगभग सब कुछ हो गया था। मेरा कंपाउंडर, मेरा हमसाया, मेरा फ्रेंड-फिलॉसफर-गाइड। उसकी आंखों में कैसा तो कत्थईपन था, जो हर वक्त मानो पूरी झेलम का सैलाब समोए रखता था अपनी रंगत में और हाथ इतने सुघड़ कि क्लीनिक का हर हिस्सा हर घड़ी दमकता रहता था। उन सुघड़ हाथों की बनी रोटियां जैसे अपनी पूरी गोलाई में स्वाद के हिज्जे लिखा करती थीं और यही स्वाद जब उसके हाथों से उतर कर करम के साग या फिर मटन की मार्फत जिह्वा तक पहुंचता तो मेरा उदर अपने फैल जाने की परवाह करना छोड़ देता।
उस रात जब उसके पकाए वाजवान का लुत्फ लेते हुए मैंने कहा कि ‘माजीद, तेरी बीवी तो जान छिड़कती होगी तुम्हारे हाथों का रिस्ता और गुश्ताबा खाकर’ तो एकदम से जैसे कत्थई आंखों में हर वक्त उमड़ती झेलम अपना पूरा सैलाब लेकर कमरे में ही बहने लगी थी। पहले तो बस पल भर को एक विचित्र-सी हंसी हंसा वह। ऐसी हंसी जो उसके पतले होठों से फिसल कर उसकी मेहंदी रंगी दाढ़ी में पहले तो देर तक कुलबुलाती रही और फिर धच्च से आकर धंस गई मेरे सीने में कहीं गहरे तक। ‘क्या बताएं हम डॉक्टर साब, उसे एके-47 से इश्क हो गया और छोड़ कर चली गई हमको!’ दाढ़ी में कुलबुलाती हंसी के ठीक पीछे-पीछे चंद हिचकियां भी आ गई थीं, दबे पांव।
‘क्या मतलब? क्या कह रहे हो, माजीद?’ अगला निवाला मेरे मुंह तक जाते-जाते वापस प्लेट में आकर ठिठक गया था। ‘हमारी मुहब्बत, दो धूप-सी खिली-खिली बेटियां, भरा-पूरा घर और आपका ये रिस्ता गुश्ताबा वगैरह कुछ भी तो नहीं रोक पाया हमारी कौंगपोश को। इन सब पर एके-47 का करिश्मा और नामुराद जिहाद का जादू जियादा भारी पड़ा डॉक्टर साब।’ ‘कौंगपोश? तुम्हारी बीवी का नाम है? बड़ा खूबसूरत नाम है! क्या मतलब होता है इसका?’ ‘केसर का फूल। उतनी ही खूबसूरत भी थी वह, बिल्कुल केसर के फूल की तरह!’ हिचकियां जिस तरह दबे पांव आई थीं, उसी तरह विलुप्त भी हो गर्इं, लेकिन झेलम का सैलाब अब भी उमड़ रहा था अपने पूरे उफान पर। ‘हुआ क्या माजीद? तुम चाहो तो शेयर कर सकते हो मेरे साथ सब बात… अब तो हम दोनों दोस्त हैं न!’ ‘आप बहुत अच्छे हो डॉक्टर साब! हुआ कुछ नहीं, बस हमारी किस्मत को हमारी मुहब्बत से रश्क होने लगा था और हमारी मुहब्बत ने इस कश्मीर वादी के आवाम की तरह ही एके-47 के आगे अपनी जबीं टेक दी।’ ‘तुम तो शायरी भी करते हो माजीद!’ उसे छेड़ते हुए मैंने कहा, तो झेलम का उमड़ता सैलाब थोड़ा-सा थमक गया जैसे।
‘मुहब्बत ने जितने बड़े शायर नहीं पैदा किए होंगे, बेवफाई ने उससे कहीं जियादा और उससे कहीं बड़े-बड़े शायर दिए हैं इस जहान को। कौंगपोश को शायरी वाले माजीद से जियादा एके-47 वाला उस्मान भाया और वो चली गई एक दिन हमको छोड़ के।’ सिहरते हुए सितंबर की जुम्मे वाली रात एक नए माजीद से मिलवा रही थी मुझे, जो इन छह महीनों में अब तक छिपा हुआ था मुझसे। खाना खत्म करके बर्तन वगैरह धुल जाने के बाद, जब वह गरम-गरम कहवा लेकर आया तो उसकी आंखों के कत्थईपन ने अब झेलम के सैलाब को पूरी तरह ढांप लिया था। कहवे के कप से इलायची और केसर की मिली-जुली खुशबू लेकर उठती भाप, कमरे में एकदम से आ टपकी चुप्पी को एक अपरिभाषित-सा स्टीम-बाथ दे रही थी। फर्श पर चुकमुक बैठा अपने दोनों हाथों से कहवे के कप को थामे हुए माजीद बस अपने लौकिक अवतार में उपस्थित था मेरे साथ। जाने कहां विचरण कह रहा था उसका मन। देर बाद उसकी आवाज ने मुझे कहवे के स्वाद और सुगंध की तिलिस्मी दुनिया से बाहर खींचा। कुआं जैसे थोड़ा और गहरा हो गया था।
‘उस्मान नाम है उसका, साब! हमारे ही गांव दर्दपुरा का है। दस बरस पहले जिहादी हो गया। उस पार गया था ट्रेनिंग लेने। गांव में आता था फौज से छुप-छुपा कर और कौंगपोश से मिलता था। उसे रुपए-पैसे देता था और उसके लिए खूब सारे तोहफे भी लाता था। हमारे दर्दपुरा की लड़कियों पर एक अलग ही रौब रहता है साब, इन जिहादियों का। तकरीबन सत्तर घर वाले हमारे गांव में कोई भी घर ऐसा नहीं है, जिसका लड़का जिहादी न हो। एक तरह का रस्म है साब, हमारे दर्दपुरा का। मेरे दोनों बड़े भाई भी जिहादी थे… मारे गए फौज के हाथों। मुझ पर भी बड़ा जोर था साब, भाई के मरने के बाद… लेकिन मुझे कभी नहीं भाया जिहाद-विहाद।’
‘हासिल तो कुछ होना नहीं है इस जिहाद और इस आजादी के नारों से, माजीद! जिस पाकिस्तान की शह पर ये बंदूक उठाए घूमते हैं, उसी पाकिस्तान से अपना मुल्क तो संभलता नहीं!’ मुझसे रहा नहीं गया तो उबल-सा पड़ा था मैं। मां, पापा और दीदी की आंखों में फैला वह खौफ का मंजर एकदम से नाच उठा मेरे सामने। ‘खता हमारे कौम की भी नहीं है, साब। शुरुआत में जो हुआ सो हुआ… उसके बाद हमारी पीढ़ी के लिए आजादी का नारा उस भूत की तरह हो गया है, जिसके किस्से हम बचपन में अपनी नानी-दादी और वालिदाओं से सुनते आते हैं और बड़े होने के बाद यह समझते-बूझते भी कि भूत-प्रेत कुछ नहीं होते, मगर फिर भी जिक्र किए जाते हैं।’
‘खता कैसे नहीं हुई, माजीद? एक पूरी कौम ने मेरी पूरी कौम को जलावतन कर दिया और तुम कहते हो कि खता कौम की नहीं है?’ मां-पापा की आंखों वाले खौफ का वह अनदेखा मंजर जैसे मैंने खुद देख लिया हो। माजीद थोड़ा सहम-सा गया था मेरी इस औंचक प्रतिक्रिया पर। ‘आपका गुस्सा सर-आंखों पर डॉक्टर साब! उस एक खता की, जो आपकी कौम के साथ हुई, उसकी तो कोई तौबा ही नहीं साब! पूरी की पूरी एक पीढ़ी गुम हो गई है साब। निकाह के लिए लड़के नहीं हैं अब तो हमारी कौम में। आप यकीन करोगे साब, हमारे दर्दपुरा में कुंवारी लड़कियों की गिनती लड़कों से दूनी से भी जियादा है। लड़के बचे ही नहीं इस नामुराद जिहाद के चक्कर में।’ वह गहरा कुआं जैसे एकदम से भर गया था और मुझे खुद पर अफसोस होने लगा अपने इस बेवजह के गुस्से से। खुद पर बरस पड़ी खीझ की भरपाई करने के लिए, एकदम से कह उठा मैं उससे- ‘मुझे अपने गांव कभी नहीं ले चलोगे माजीद?’
और माजीद तो जैसे किलक ही पड़ा यह सुन कर। तय हुआ कि कल और परसों सप्ताहांत का फायदा उठाते हुए क्लीनिक को अवकाश दिया जाए और चला जाए दर्दपुरा।
इस गांव तक पहुंचने के लिए कुपवाड़ा शहर को दाएं छोड़ते हुए मुख्य सड़क से फिर से दार्इं तरफ उतरना पड़ता है। पहाड़ों पर घूमती कच्ची सड़क पर लगभग साढ़े चार घंटे की हिचकोले खाती ड्राइव के बाद चारों तरफ से पहाड़ों से घिरे इस गांव तक पहुंचने पर जहांगीर के कहे ‘गर फिरदौस बर रूए जमीं अस्त, हमीं अस्त, हमीं अस्त, हमीं अस्त’ का यथार्थ पता चलता है। दर्दपुरा, जहां आज भी बिजली का खंभा तक नहीं पहुंचा है, जहां भेड़ों की देखभाल के लिए एक देसी डॉक्टर तो है, लेकिन इंसानों के डॉक्टर के लिए यहां के बाशिंदों को लगभग सत्तर किलोमीटर दूर कुपवाड़ा जाना पड़ता है। इतना खूबसूरत होगा, मेरी कल्पना से परे था। कश्मीर में टूरिस्ट बस गुलमर्ग और सोनमर्ग के मिडोज देखकर जन्नत का ख्वाब बुन लेते हैं, यहां तो जैसे साक्षात जन्नत अपनी बांहें पसारे पहाड़ों के दामन में बैठी हुई थी।
जब माजीद के घर पहुंचा तो जैसे पूरे का पूरा गांव उमड़ा पड़ा था स्वागत की खातिर। माजीद का परिवार, जिसमें उसके अब्बू और अम्मी और उसकी दो छोटी बेटियां, हीपोश और शिरीन- जैसे दूर जम्मू में बैठा हुआ मुझे अपना परिवार यहां मिल गया था। माजीद ने अपनी बड़ी वाली नौ साल की बेटी से बड़े गर्व से मिलवाया और जिद की कि मैं उससे इंगलिश में कुछ पूछूं। उस गोरी-चिट्टी सेब सी लाल-लाल गालों वाली छुटकी से नाम पूछा तो उसका ‘माय नेम इज हीपोश… हीपोश अहमद वानी’ कहना जैसे इस सदी का अब तक गुनगुनायाहुआ सबसे खूबसूरत नगमा था। ‘ऐंड वाट डज हीपोश मीन माय डियर?’ ‘ओ… इट्स अ फ्लावर अंकल! जेस्मीन फ्लावर!’मन किया उस सकुचाई-सी बोलती हुई जेस्मीन के फूल को गोदी में उठा लूं।
धीरे-धीरे जब अधिकतर गांव वाले वहां से रुखसत हुए तो चंद बुजुर्गों के साथ अब मैं माजीद के परिवार के साथ अकेला था। दालान में सबके साथ बैठा गोल-गोल सख्त मीठी रोटियों के साथ नमकीन चाय का लुत्फ उठाता बस चुपचाप सुने जा रहा था मैं वहां बैठे बुजुर्गों की बातें। माजीद के अब्बू और उनके हमउम्र बुजुर्गों की किस्सागोई जैसे मुझे नब्बे के दशक से पहले वाले खुशहाल कश्मीर की यात्रा पर ले चली थी। एक अपनी ही तरह की टाइम-मशीन में बैठा मैं सत्तर और अस्सी के दशक वाले कश्मीर की यात्रा पर था और तभी नजर पड़ी मेरी माजीद के अब्बू के बाएं हाथ पर। उनके बाएं हाथ की अंगूठे को छोड़ सारी अंगुलियां नदारद थीं। एक अजीब-सी झुरझुरी दौड़ गई मेरे पूरे वजूद में उस महज अंगूठे वाले हाथ को देख कर। पूछा जब मैंने कि यह कैसे हुआ, तो वहां बैठे लोगों का जबर्दस्त मिला-जुला ठहाका गूंज उठा। मैं तो अकबका कर देखने लगा था क्षण भर को। माजीद एक स्मित-सी मुस्कान बिखेर रहा था। फिर जो मैंने उन कटी अंगुलियों की कहानी सुनी तो दंग रह गया।
अपने अब्बू के बाएं हाथ की चारों अंगुलियां खुद माजीद ने काटी थीं- कुल्हाड़ी से, जब वह बस ग्यारह साल का था। तब आतंकवाद उफान पर था कश्मीर में। माजीद के दोनों बड़े भाई जा चुके थे उस पार पाक अधिकृत कश्मीर के जंगलों में चल रहे किसी जिहादी ट्रेनिंग कैंप में और अपनी दो बहनों के साथ माजीद था बस अपने अब्बू और अम्मी के साथ। अब्बू की भेड़ों की देखभाल में हाथ बंटाते और बचपन की सुहानी पगडंडी पर जवान होते हुए। बर्फ की चादर में लिपटे सर्दी वाले उन्हीं दिनों में एक रोज अपनी कुल्हाड़ी से देवदार काटते हुए उसके अब्बू के बाएं हाथ की तर्जनी के जोड़ में भयानक दर्द उठा था। दो रोज लगातार भयानक पीड़ा सहते रहे वे। अम्मी के घरेलू उपचार बेअसर थे। तीसरे दिन झिमी-झिमी गिरते बर्फ के फाहों में बाहर अपनी बहनों के साथ ऊधम मचाते माजीद को पकड़ कर ले गए वे भेड़ों के बाड़े में। पहले से पड़े देवदार के एक कटे तने पर अपनी बार्इं हथेली बिछाते हुए उन्होंने अपनी कुल्हाड़ी की तेज धार को तर्जनी और हथेली के जोड़ पर रखा और माजीद को वहीं पड़ा पत्थर उठा कर कुल्हाड़े पर प्रहार करने का हुक्म दिया। सहमा-सा माजीद मना करता रहा देर तक, लेकिन फिर एक न चली उसकी अब्बू की तेज आवाज में दिए हुक्म के आगे।
फिर माजीद के दोनों हाथों से पकड़ा हुआ पत्थर पड़ा कुल्हाड़े पर और तर्जनी छिटक कर अलग हो गई हथेली से। अगली तीन सर्दियों तक यह सिलसिला फिर से दोहराया गया और बाकी अंगुलियां अलग होती गर्इं इम्तियाज अहमद वानी की बार्इं हथेली से। दर्दपुरा के उस बुजुर्ग, इम्तियाज अहमद वानी, का यह अपने तरीके का खास उपचार था चिल-ब्लेंस से निबटने का। उस गांव में, जहां आज भी किसी डॉक्टर से मिलने के लिए सत्तर किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है, वह भी बर्फबारी में अगर रास्ता बंद न हो तब। जहां शाम को सूरज ढलने के बाद अब भी लकड़ी की मशाल और कैरोसीन वाली लालटेन जलती हों, उन कटी हुई अंगुलियों की दास्तान पर मेरी हैरानी को चुपचाप तकता हुआ दर्दपुरा जैसे हौले-हौले मुझे चिढ़ा रहा था। अगले दिन, रविवार की उस सिली-सी दोपहर को वापसी की यात्रा में गांव को पलट कर निहारता हुआ मैं सोच रहा था कि पापा की प्रतिक्रिया क्या होगी, जब मैं उनको बताऊंगा कि मैं अपना क्लीनिक कुपवाड़ा से उठा कर किसी अनाम से गांव में शुरू कर रहा हूं। जीप के रियर-व्यू मिरर में पीछे छूटते हुए दर्दपुरा का चिढ़ाना जाने क्यों मुझे एक मुस्कुराहट में बदलता नजर आ रहा था। पलट कर पिछली सीट पर बैठे माजीद को बताने के लिए कि देखो तुम्हारा गांव मुस्कुरा रहा है, मुड़ा तो सीट की पुश्त पर सिर टिकाए उसका ऊंघना मुझे बस उसे निहारते रहने को विवश कर गया। ०

