सुरजीत सिंह
विकट ठंड है। शरीर गल रहे हैं। साहस पिघल रहा है। चेतना जीरो ग्रेविटी में है। धुंध की गिरफ्त मजबूत है। आग चूल्हे से और चूल्हा आग से पनाह मांग रहे हैं। दोनों की कातरता चरम पर है। ऐसे सितम भरे माहौल में भी कुछ लोग ठंड में नहाने के अपार फायदे बता कर किसी निरीह बंदे को स्नान के लिए बरगला रहे हैं। गोया धर्म परिवर्तन पर खुशहाली की गारंटी दे रहे हों। नोटबंदी से ईमानदारी के साम्राज्य दिवास्वप्न दिखा रहे हों। जिस स्नान भीरु के लिए बाथरूम दो-तीन माह तक उत्तरी ध्रुव बन जाता है। उसकी ओर जाते हुए आत्मा तक कांप उठती है। शरीर में कहीं गुप्त स्थान पर सेफ बैठी आत्मा नहाने के खिलाफ विद्रोह करने पर उतारू होती है, लेकिन शरीर साथ देने को तैयार नहीं होता। बंदा घबरा कर बाथरूम में घुस जाता है।
सत्ता में धंसा नेता और बाथरूम में घुसा बंदा दोनों कमोबेश एक जैसे हमाम वाली स्थिति में होते हैं। नेता चरित्र का आवरण उतारने में और बंदा कपड़े उतारने में ज्यादा नहीं सोचता। यहां बंदा बाथरूम में घुस तो गया है, लेकिन कपड़े नहीं उतार रहा। उधेड़बुन में है। कोई इससे पूछे- बंधु, क्या सोच कर आए थे कि नल से अच्छे दिनों की गरमागरम सप्लाई होगी। वैसे भी तुम बनारस के घाट पर तो खड़े नहीं हो कि इधर डुबकी लगाओ और उधर कोई तुम्हारे कपड़े, जूते, चप्पल ले भागे! फिर तुम नग्न बदन, ठंड में ठिठुरते चुनाव जीत कर चंपत हुए नेता की तरह उसे ढूंढ़ते फिरो कि हमारे जो ले गया, वो किधर गया। हो सकता है, कुछ लोग इस स्थिति में चिल्ला-चिल्ला कर दिल्ली की ओर इशारा करें।बंधवुर, किसके इंतजार में हो? न तो तुम संसद पर हमले के दोषी हो, जिसको फांसी होने वाली है और न तुम्हारी दया याचिका राष्ट्रपति ने ठुकराई है कि मानवाधिकारवादियों का दिल पसीजे और वे तुम्हारे समर्थन में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करें, कैंडल मार्च निकालें। अभी तुम इंसान से भ्रष्टाचार में भी तब्दील नहीं हुए हो कि कोई तुम्हारे लिए धरने पर बैठे। तुम अस्पष्ट जनादेश भी नहीं हो कि कई विकल्प खुल हों। तुम्हारे लिए एक लोटा पानी डाल लेना ही अंतिम और एकमात्र विकल्प है।
तुम शायद इस पसोपेश में हो कि चैनल वाले तुम्हें जबरन कराए जा रहे स्नान में ब्रेकिंग न्यूज खोजते हुए आएंगे और तुम्हें बाथरूम से मुक्त करा एसीयुक्त स्टूडियो में बिठा कर अत्याचार की मार्मिक कहानी सुनाने लगेंगे। तो बंधु, तुम सरासर गलत हो, क्योंकि न अभी तुम मरे हो और न बलत्कृत हुए! न तुम एटीएम की कतार में लगे हो और न तुमने लाइन में जान गंवाई है। न तुम बाढ़ में फंसे हो और न ही किसी धराशायी हुए पुल के नीचे आधे दबे हो कि चैनल वाले तुम्हारे मुंह में माइक घुसेड़ें और तुम्हारी पीड़ा को टीआरपी में बदलें। अगर चैनल वाले आ भी गए, तो बाथरूम से ही लाइव टेलीकास्ट शुरू हो जाएगा। फिर कंपकंपायमान अवस्था में सुनाते रहना दुनिया को अपनी ‘स्नान कहानी’! मुमकिन है तुम अंतिम आशा के तौर पर ‘घर वापसी’ वालों की ओर देख रहे होओगे, लेकिन सोचो, कहीं उन्होंने भी तुम्हारे शुद्धिकरण की ठान खुले में दो-चार बाल्टी उंड़ेल वापसी कार्यक्रम रख दिया और खुदा न खास्ता उसी समय कोई तुम्हें दिया जाने वाला एकमात्र कंबल भी ले भागा, तो सोचो किस भाव बीतेगी!
मित्र, यह गहन अफसोस करने का वक्त नहीं है कि जब हत्यारों तक के मानवाधिकार सुरक्षित हैं, तो स्नान भीरुओं की रक्षा के लिए कानून में एक शब्द तक क्यों नहीं है? सुनो, जिनके लिए समूचे कानून बने हुए हैं, जिन्हें कानूनों की तह में अच्छे से लपेटा गया है, देश के वे गरीब आदमी भी सत्तर साल से कपड़े उतारे खुले में बैठे ठिठुर रहे हैं। उलटे राहत के नाम पर सरकारी लोटे की मार से ही त्रस्त हैं। उनकी कपड़ों में ‘वापसी’ तक का कहीं कोई कार्यक्रम नहीं!
इसलिए मित्र, गीता में तनिक भी विश्वास करते हो, तो धर्म युद्ध का निनाद सुनो, बर्फ हो चुकी रगों में जोश पैदा करो और हुंकार भरते हुए उंडेल लो लोटा! यही तुम्हारे लिए श्रेयस्कर रहेगा!हो सकता है, कोई इसे ही तुम्हारी राष्ट्रभक्ति के तौर पर रेखांकित कर देशभक्ति का सर्टिफिकेट जारी कर दे! मन के काले हैं तो क्या हुआ, आखिर बतौर स्वच्छता अभियान इसे तन की स्वच्छता से जोड़ा जाना कौन-सा मुश्किल कार्य है! ०
