अपनी दिलकश आवाज से दुनिया को दीवाना बनाने वाले तलत महमूद को गजल का बादशाह कहा जाता है। उनका जन्म लखनऊ में हुआ। उन्होंने अपने गायक पिता से संगीत की प्रेरणा ली थी। उनके पिता ने संगीत की शिक्षा के लिए मॉरिश कॉलेज में उनका दाखिला करा दिया। वहां उन्होंने अपनी पूरी शिद्दत से संगीत सीखा।

प्रारंभिक जीवन
तीन बहन और दो भाइयों के बाद तलत छठी संतान थे। उनके घर का माहौल संगीतमय था। तलत की आवाज उनकी बुआ को बहुत पसंद थी। बुआ से ही तलत को गाने का प्रोत्साहन मिलता रहता था। सोलह साल की उम्र में तलत ने ‘सब दिन एक समान नहीं’ गीत गाया। इस गीत के बाद वे लखनऊ में प्रसिद्ध हो गए। फिर तलत को कई जगह मौका मिलने लगा। ‘तस्वीर तेरी मेरा दिल न बहला सकेगी’ गजल के बाद तलत और प्रसिद्ध हो गए। इस गजल को बाद में एक फिल्म में भी लिया गया।

अभिनेता बनने की तलब
कुंदन लाल सहगल को देख कर तलत में अभिनेता बनने की इच्छा जागी थी। यही वजह थी कि अभिनेता बनने के लिए वे 1944 में कलकत्ता जा पहुंचे। कलकत्ते में तलत ने बांग्ला गीत से शुरुआत की। 1945 में आई फिल्म ‘राजलक्ष्मी’ में जागो मुसाफिर जागो गीत गाया। इस गीत से उन्हें खूब सराहना मिली। पर उनके अंदर अभिनय की इच्छा जोर मारती रही। इसलिए वे मुंबई जाकर अनिल विश्वास से मिले। विश्वास ने उन्हें शरीर पतला-दुबला होने का कारण बता कर अभिनय के लिए मना कर दिया। फिर तलत कलकत्ता वापस चले गए। पर कलकत्ता में भी काम हल्का चल रहा था। इसलिए वे वापस मुंबई आ गए। ‘आराम’ में वे ‘शुक्रिया अय प्यार तेरा’ गजल गाते हुए देखे गए थे। इसके अलावा उन्होंने सुरैया के साथ भी अभिनय किया था। उन्होंने करीब सोलह फिल्मों में अभिनय किया।

संगीत में पिछड़ना
तलत महमूद अभिनय में इतने रम गए कि गायन में पिछड़ने लगे। अभिनय में भी वे अपना जलवा ठीक से नहीं दिखा पा रहे थे। उसी समय रफी केंद्र में आ गए थे। उन्हें अपने पिछड़ने का अहसास फिल्म ‘सोने की चिड़िया’ से हुआ। इस फिल्म में ‘प्यार पर बस तो नहीं’ गीत रफी से गवाया जाने वाला था, पर इस गाने को तलत खुद गाना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने फिल्म बीच में छोड़ने की धमकी दी। तब उनसे इस गाने को गवाया गया था।

संगीत का बदलता दौर
साठ के दशक के बाद संगीत का दौर बदलने लगा। अब तलत के गाने फिल्मों में बहुत कम होने लगे। दौर बदलने के साथ जब तलत की आवाज को फिल्मों में जगह नहीं मिली, तो उन्होंने गैर-फिल्मी गाने गाने शुरू कर दिए। लोग उनकी गजलों के दीवाने बनते गए। वे गजलों में शब्दों को लेकर बहुत सजग थे। वे गजलों के आधुनिक स्वरूप से निराश थे। वे गजल को एक साधना मानते थे। इसी वजह से गजलों को लेकर कोई मजाक सहन नहीं करते थे। तलत पहले व्यक्ति थे, जिन्हें दक्षिण अफ्रीका में बुलाया गया था। उन्हीं के साथ विदेशों में भारतीय फिल्मी कलाकारों के मंच कार्यक्रमों का सिलसिला चल पड़ा। तलत महमूद की लरजती, सलोनी और मखमली आवाज आज भी फिजां में गूंजती है।

निधन
9 मई 1998 को तलत महमूद का निधन हो गया।