आलोक कुमार सिंह
भारतीय इतिहास में विभाजन एक बड़ी त्रासदी है, जिसके परिणाम आज भी भयावह रूप में उद्वेलित करते हैं। इस विभाजन से उपजे सांप्रदायिक वातावरण नें मानवीय मूल्य ही बदल दिए। आजादी के बाद सोचा गया था कि हमारा देश विभाजन की त्रासदी से बाहर निकल कर धीरे-धीरे सामाजिक सद्भाव की ओर आगे बढ़ेगा, पर संकीर्ण मानसिकता के चलते ऐसा हो नहीं पाया। देश विभाजन ने लगभग पूरे उत्तर भारत को सांप्रदायिकता की ज्वाला में धकेल दिया। आज इक्कीसवीं सदी में भूमंडलीकरण की अवधारणा के चलते एक ऐसे विश्वग्राम की परिकल्पना की जा रही है, जहां संपूर्ण विश्व के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तथा सांस्कृतिक हित साझा होंगे, पर इस सबके बावजूद जातिवाद, भाषावाद, क्षेत्रवाद तथा संप्रदायवाद की जड़ें उत्तरोत्तर गहरी होती जा रही हैं। देश-विभाजन के समय उत्तर और पूर्वी भारत में अनेक स्थानों पर सांप्रदायिक दंगे हुए, जिससे जान-माल की भारी क्षति हुई, हिंदू और मुसलमानों को दिल में नफरत की ऐसी भावना घर कर गई कि आज भी यदा-कदा छोटे बड़े सांप्रदायिक दंगों के रूप में प्रकट होती रहती है। हालांकि भारतीय संविधान लागू होने के बाद भारत धर्म और जाति निरपेक्ष राष्ट्र बन गया, पर सांप्रदायिकता की समस्या अभी तक ज्यों की त्यों बनी हुई है।
सांप्रदायिकता के इस वीभत्स रूप ने साहित्यकारों को हिला कर रख दिया। उन्होंने न केवल विभाजन के दिनों में और उसके बाद इस विषय पर लिखा, बल्कि तबसे लेकर अब तक यह विषय लगातार प्रासंगिक बना हुआ है। हिंदी के साथ उर्दू के भी अनेक उपन्यासकारों ने इसे विषय बनाया। हिंदी में यशपाल, कमलेश्वर, राही मासूम रजा, भीष्म साहनी, अब्दुल बिस्मिल्लाह, मंजूर एहतेशाम, विभूति नारायण राय, गीतांजलिश्री, कमलेश्वर, दूधनाथ सिंह, नासिरा शर्मा आदि ऐसे उपन्यासकार हैं, जिन्होंने अपने लेखन में इस समस्या के विविध पहलुओं पर विचार किया है। ‘झूठा सच’, ‘लौटे हुए मुसाफिर’, ‘आधा गांव’, ‘तमस’, ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया’, ‘सूखा बरगद’, ‘शहर में कर्फ्यू’, ‘हमारा शहर उस बरस’, ‘कितने पाकिस्तान’, ‘आखिरी कलाम’, ‘जीरो रोड’ आदि उपन्यास न केवल इस समस्या को सजीवता से उठाते हैं, बल्कि इससे प्रभावित होती मनुष्यता के तमाम सवाल हमारे सामने खड़े करते हैं।
यशपाल ने ‘झूठा सच’ में देश की आजादी के बाद देश के बंटवारे के परिणामस्वरूप उपजी सांप्रदायिक हिंसा की त्रासदी का बहुत सजीव और दहलाने वाला चित्रण किया है। इसी प्रकार कमलेश्वर ने ‘लौटे हुए मुसाफिर’ में पाकिस्तान के नाम पर छले गए मुसलमानों के मोहभंग का अंकन किया है। राही मासूम रजा ने ‘आधा गांव’ में स्वतंत्रता प्राप्ति के समय हुए सांप्रदायिक दंगों का भारतीय समाज, विशेषतया मुसलमानों के जीवन पर पड़े प्रभावों का विशद रूप में चित्रण किया है। नासिरा शर्मा ने ‘जीरो रोड’ में सांप्रदायिकता का जहर फैलने के दुष्परिणामों का चित्रण किया है।
भीष्म साहनी ने ‘तमस’ में उन स्थितियों और कारणों का विश्लेषण करने का प्रयास किया है, जो देश के विभाजन और सांप्रदायिकता के मूल में थे। उनका मानना है कि सांप्रदायिकता की आग फैलाने में ब्रिटिश शासन और उसके पिट््ठुओं का हाथ था, और वह एक बनी-बनाई योजना का अंग था। विभूति नारायण राय के उपन्यास ‘शहर में कर्फ्यू’ का शहर अपनी-अपनी आबादी के हिसाब से हिंदुस्तान और पाकिस्तान में तब्दील हो जाता है। जिस क्षेत्र में हिंदू अधिक थे वह इलाका हिंदुस्तान और जहां मुसलिम अधिक थे वह इलाका पाकिस्तान जैसा बन जाता है। ऐसे में संघर्ष की तमाम परिस्थितियां उपजती हैं। एक कर्फ्यू किस तरह लोगों की जिंदगी बदल देता है। इसी कर्फ्यू के कारण इलाज न होने से सईदा जैसी कितनी माओं की बेटियों की मृत्यु हो जाती है। कर्फ्यू से सबसे अधिक अगर किसी का नुकसान होता है तो वह है रोज कमाने और रोज खाने वाला मजदूर और कामगार वर्ग, जिसके यहां कर्फ्यू लगने से भूखों मरने की नौबत आ जाती है।
कमलेश्वर के ‘कितने पाकिस्तान’ में भी सांप्रदायिकता विरोधी दृष्टिकोण है, जो धर्म, राजनीति, देश, दुनिया और मानवता को बांटने, एक-दूसरे से अलग और लहूलुहान करने की दानवी प्रवृत्ति के अंकन और उसके प्रतिरोध से युक्त है। दूधनाथ सिंह के ‘आखिरी कलाम’ में कथा की पृष्ठभूमि में बाबरी मस्जिद का विध्वंस है। यह उपन्यास राम जन्मभूमि में घटी घटनाओं को केंद्र में रखता है। इसमें भारतीय समाज में बढ़ती सांप्रदायिकता का सामयिक चित्रण करते हुए उपन्यासकार ने धर्म के ठेकेदारों और राजनेताओं द्वारा फैलाई जा रही घृणा, भेदभाव और वैमनस्यता का सजीव चित्रण किया है। मंजूर एहतेशाम के ‘सूखा बरगद’ में देश-विभाजन के बाद एक ऐसा शहर, जहां ‘देश के बंटवारे के समय भी कोई हिंदू-मुसलिम तनातनी या झगड़ा-फसाद नहीं हुआ था’, एक छोटी-सी घटना से सांप्रदायिक दंगे में झुलस गया। गीतांजलिश्री के उपन्यास ‘हमारा शहर उस बरस’ में हिंदू मुसलिम सांप्रदायिकता का चित्रण किया गया है। इस उपन्यास का मुख्य मुद्दा है- हिंदू-मुसलिम सांप्रदायिक संघर्ष और आए दिन शहरों में होने वाले दंगे। लेखिका चाहती है कि ऐसे भयावह समय में बुद्धिजीवी वर्ग अपनी कायरतापूर्ण मानसिकता का परित्याग कर आगे आए और समाज में सांप्रदायिक सद्भाव कायम करे।
इनके अलावा यशपाल के उपन्यास ‘मेरी तेरी उसकी बात’ में हिंदुओं और मुसलमानों के गहन भावात्मक, सौहार्दपूर्ण संबंध और राजनीतिक कारणों से उसके विघटन का चित्रण, धर्म परिवर्तन कर ईसाई बने परिवारों की मानसिकता और मुसलिम समाज की सामाजिक मानसिक बनावट का अंकन किया गया है। बदीउज्जमा ने ‘छाको की वापसी’ में देश विभाजन के बाद बिहार से पूर्वी पाकिस्तान गए मुसलमानों के मोहभंग का चित्रण किया है। इसी तरह अमृतलाल मदान के ‘सिंधुपुत्र’, दीपचंद निर्मोही के ‘और कितने अंधेरे’, हरदर्शन सहगल के ‘टूटी हुई जमीन’, द्रोणवीर कोहली के ‘वाह कैंप’, प्रताप सहगल के ‘अनहदनाद’ आदि उपन्यासों में भी देश-विभाजन की त्रासदी और सांप्रदायिक दंगों से बच कर आए शरणार्थी परिवारों की कथा कही गई है। भगवान सिंह ने अपने उपन्यास ‘उन्माद’ में सांप्रदायिकता की परिभाषा देने से लेकर उसके फैलने की परिस्थितियों का विश्लेषण करने की कोशिश की है।
हिंदी के साथ उर्दू में भी सांप्रदायिक समस्या को लेकर खूब लेखन हुआ है, जिसमें सलाम आजाद का ‘टूटा मत’, इंतजार हुसैन का ‘बस्ती’, कुर्रतुलऐन हैदर का ‘आग का दरिया’, अब्दुल्लाह हुसैन का उदास नस्लें, अब्दुस्समद का ‘दो गज जमीन’, शौकत सिद्दीकी का ‘खुदा की बस्ती’ विशेष हैं। विभाजन की त्रासदी में अनगिनत परिवार जो दर-दर भटकने को मजबूर हो गए और लाखों की संख्या में ऐसे लोग थे, जो अपनी जन्मभूमि, अपना परिवार, जमीन, जायदाद, नाम, प्रतिष्ठा, आदि छोड़ कर जाने को बाध्य हुए। इस त्रासदी को झेलने वाले अनेक परिवारों और पात्रों की कथा के माध्यम से सांप्रदायिकता की त्रासदी को समझाने का सफल प्रयत्न इन उपन्यासकारों ने किया है। यह एक भीषण और अमानवीय त्रासदी थी, जिससे उपजी सांप्रदायिकता को हिंदी और उर्दू उपन्यासकारों ने अपने उपन्यास का विषय बनाया। १

