श्रीशचंद्र मिश्र
निर्माता-निर्देशक अनुराग कश्यप अभिनेता बनने मुंबई गए थे। दाल नहीं गली, तो फिल्म बनाने लगे। बीच में जब भी समय मिला ‘ब्लैक फ्राइडे’, ‘नो स्मोकिंग’, ‘देव डी’, ‘गुलाल’, ‘शागिर्द’ आदि फिल्मों में चेहरा दिखा कर उन्होंने अभिनय का शौक पूरा किया। दो साल पहले फिल्म ‘अकीरा’ में उन्होंने अभिनय को गंभीरता से लिया। फिल्म में उन्होंने एक भ्रष्ट पुलिस अफसर की भूमिका की, लेकिन रंग नहीं जमा पाए। फिल्म निर्माण में उनके साझीदार रहे करन जौहर भी ‘बांबे वेलवेट’ में खलनायक के रूप में नजर आए, लेकिन बेहद प्रभावहीन रहे। उनसे पहले भी कुछ और फिल्मकारों ने खुद को खलनायक के रूप में स्थापित करने की कोशिश की। ‘ट्रैफिक सिग्नल’ में सुधीर मिश्रा और ‘गैंग्स आफ वासेपुर’ में तिग्मांशु धूलिया ने खलनायकी की। दूसरों से बेहतरीन अभिनय कराने वाले ये फिल्मकार खुद अभिनय करने में फिसड्डी साबित हुए।
कई ने खलनायकी करनी चाही
फिल्मकारों ने ही नहीं, अपने समय के कई सितारों ने खलनायकी में धमाल मचाना चाहा। कुछ ने हीरो-हीरोइन की पारी खत्म हो जाने के बाद पटरी बदली। अभिनेता से सांसद बनने के बाद हाशिए पर चले गए गोविंदा ने ‘किल दिल’ और ‘हैप्पी एंडिंग’ में खलनायक के रूप में वापसी की। पिछले कुछ साल में यह चलन ज्यादा बढ़ा है। ‘सोचा न था’ में रति अग्निहोत्री ने नकारात्मक भूमिका निभा कर बाकी का हौंसला ऐसा बढ़ाया कि सैफ अली खान से शादी टूटने के बाद अमृता सिंह ने ‘कलयुग’ में खल भूमिका की। ‘गुलाब गैंग’ में जूही चावला कू्रर नेता के रूप में सामने आर्इं। कुछ इसी तरह की भूमिका शबाना आजमी ने ‘मटरू की बिजली का मंडोला’ में की। शबाना ठहरी दबंग अभिनेत्री। ‘गॉडमदर’ में माफिया का किरदार कुछ साल पहले वे काफी सजीवता से निभा चुकी थीं। ‘खाकी’ में ऐश्वर्य राय पारंपरिक वैंप नहीं थीं, पर वह भूमिका नकारात्मक छाप लिए हुई थी। तबु ‘जाल’ में आतंकवादी और ‘अंधाधुन’ में शातिर कातिल बनीं, तो प्रियंका चोपड़ा ने ‘सात खून माफ’ में जुनूनी हत्यारिन की भूमिका की।
गोविंदा खलनायक बन कर आने वाले पहले हीरो नहीं थे। ‘विलेन’ में रितेश देशमुख खलनायक बने और सामान्य नहीं, बल्कि खूंखार किस्म के खलनायक, जिसे किसी की जान लेने में कोई हिचक नहीं होती। फिल्म रितेश देशमुख की फिल्मी छवि को पूरी तरह बदल देने वाली जरूर साबित हुई, लेकिन रितेश और उनसे पहले और बाद के किसी भी कलाकार या फिल्मकार के लिए खलनायकी में कोई विशेष गुंजाइश नहीं बन पाई।
साफ-सुथरी छवि की भी रहती थी फिक्र
एक समय था जब हीरो या हीरोइन की भूमिका निभाने वाले कलाकार अपनी साफ-सुथरी छवि को लेकर काफी सचेत रहते थे। खल भूमिका करना तो उन्हें कतई गवारा नहीं था। फिल्म ‘मदर इंडिया’ में महबूब खान सुनील दत्त वाली भूमिका दिलीप कुमार को देना चाहते थे। दिलीप कुमार ने मना करने की वजह यह बताई कि कई फिल्मों में नरगिस के नायक बनने के बाद उनके बेटे की भूमिका को वे सहजता से नहीं निभा पाएंगे। जबकि असलियत यह थी कि वे अपनी इमेज को बिगाड़ना नहीं चाहते थे। यह खतरा नादिरा ने उठाया और पूरी उम्र उसका खमियाजा भुगतती रहीं। महबूब खान ने टेक्नीकलर फिल्म ‘आन’ में उन्हें पहली बार मौका दिया था। नायक दिलीप कुमार थे। फिल्म जबर्दस्त हिट हुई। लेकिन इसके बाद नादिरा ने अति उत्साह में गलत कदम उठा लिया। राज कपूर ने उनसे ‘श्री 420’ में नेगेटिव भूमिका करने का आग्रह किया। भूमिका एक डांसर की थी। उस समय वैंप का ठप्पा लगा चुकी कलाकार या सहायक अभिनेत्रियां ही इस तरह की भूमिकाएं किया करती थीं। ‘श्री 420’ में नादिरा को सराहना तो बहुत मिली, लेकिन उन पर खल भूमिका का ऐसा ठप्पा लग गया कि नायिका के तौर पर उन्हें कोई महत्त्वपूर्ण फिल्म नहीं मिली। मरते दम तक उन्हें नेगेटिव भूमिकाएं ही ज्यादा करने को मिलीं।
चोला बदलना आसान नहीं
पिछले कुछ सालों में कई कलाकारों ने नकारात्मक भूमिका करने में रुचि दिखाई है। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि उनमें से ज्यादातर की हीरो बनने की उम्र बीत गई थी और सहायक भूमिकाओं में उन्हें चर्चित होने का कोई मौका नहीं मिल पा रहा था। खलनायक बनते ही उनमें से कुछ की किस्मत चमक गई। रिलीज होने के पहले ही दिन पचीस करोड़ के कारोबार का रेकॉर्ड कायम करने वाली ‘अग्निपथ’ ने दो हफ्ते पूरे होते-होते निर्माता को अरबपति बना दिया। लेकिन एक अनूठी उपलब्धि जुड़ी संजय दत्त के नाम। ‘लगे रहे मुन्ना भाई’ को नायक के रूप में रेकॉर्ड तोड़ सफलता दिलाने वाले संजय ने खलनायक कांचा चीना का चोला पहन कर ‘अग्निपथ’ को उससे भी आगे खड़ा कर दिया। ‘अग्निपथ’ में अपने करिअर का सर्वश्रेष्ठ अभिनय करने के बावजूद ऋतिक रोशन संजय दत्त के मुकाबले उन्नीस ही रहे।
ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि नायक से क्लाइमैक्स में मात खाने के बावजूद खलनायक दर्शकों का ज्यादा दुलारा बन कर सराहा गया। ‘अग्निपथ’ में दो खलनायक थे। एक कांचा चीना और एक रऊफ लाला। ऋषि कपूर ने पहली बार एक कुटिल और शातिर खलनायक की भूमिका की और रऊफ लाला को किसी भी मायने में उन्होंने कांचा चीना से कमजोर नहीं पड़ने दिया। उसके बाद ‘औरंगजेब’ में एक शातिर पुलिस अफसर की भूमिका में भी ऋषि कपूर नजर आए। लेकिन संजय दत्त और ऋषि की खलनायकी की पारी सीमित रही। उस पर जल्दी विराम लग गया।
खलनायक अभिन्न हिस्सा
खलनायक हिंदी फिल्मों का शुरू से ही अभिन्न हिस्सा रहा है। बुराई पर अच्छाई की जीत का सनातन दर्शन ही खलनायक की स्थिति पर टिका है। सामाजिक स्थितियों में बदलाव के साथ साथ खलनायक का रूप और कद भी बदला है। वही फिल्में ज्यादा चलती हैं, जिनमें दर्शकों को लगता है कि नायक उनकी दमित इच्छाओं और आक्रोश को अभिव्यक्त करने वाला उनका प्रतिरूप है। वे व्यवस्था से लड़ना चाहते हैं। लड़ नहीं पाते। जब नायक लड़ता है तो उन्हें संतुष्टि मिलती है। लेकिन नायक का नायकत्व उभारता है खलनायक, जो कभी व्यवस्था का प्रतीक होता है तो कभी सामाजिक व्यवस्था का। वर्ग भेद हमारे यहां इतना ज्यादा रहा है कि साधन संपन्नता और साधनविहीनता का अंतर समाज में एक बड़ी खाई बना चुका है। एक परंपरा के तहत फिल्मी नायक शोषितों और पीड़ितों का प्रतिनिधि रहा है, तो खलनायक शोषण का झंडा उठाने वाला। शुरुआती सालों में वह महाजन या जमींदार था। फिर मिल मालिक या धनपति सेठ हो गया। अपराध की शाखाएं फैलीं तो वह स्मगलर या माफिया के रूप में सामने आया। भ्रष्टाचार बढ़ा तो राजनीति की अनैतिकता और अपराध से उसके गठजोड़ ने नया सफेदपोश खलनायक खड़ा किया। कभी वह डाकू के रूप में सामने आया तो कभी व्यवस्था के रखवालों की वर्दी में। इन सभी रूपों का शिकार होने वाला बहुसंख्यक वर्ग जब नायक के हाथों हर रूप का नाश देखता है, तो उसे अस्थायी राहत मिलती है। असरदार खलनायक वही बन पाता है जो बुराई का प्रतीक लग पाता हो।
छवि बनी बाधा
शुरुआती सालों में नायक और खलनायक की अलग-अलग श्रेणी बनी हुई थी और आमतौर पर दोनों में से कोई अपनी सीमा लांघने की कोशिश नहीं करता था। उस दौर में कई बार खलनायक सब पर हावी होकर उभरा। ‘मदर इंडिया’ के लाला कन्हैया लाल और ‘जिस देश में गंगा बहती है’ के डाकू प्राण को कौन भूल सकता है। केएन सिंह की आग उगलती आंखों के बिना ‘आवारा’ का द्वंद्व क्या प्रभावशाली हो सकता था? खलनायक की उपयोगिता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कई प्रतिष्ठित नायकों ने मौका मिलने पर खल भूमिकाएं की। धर्मेंद्र ने ‘आई मिलन की बेला’ और विश्वजीत ने ‘इश्क पर जोर नहीं’ में पारंपरिक खलनायक का रूप धरा। लेकिन शाहरुख खान ने ‘बाजीगर’, ‘अंजाम’ और ‘डर’, जैकी श्राफ ने ‘मिशन कश्मीर’, अजय देवगन ने ‘खाकी’ नाना पाटेकर ने ‘अग्निसाक्षी’ में खलनायकी को नया तेवर दिया। नायक के तौर पर कई साल रगड़ने के बाद प्रेमनाथ और अजीत को खलनायक के रूप में ज्यादा काम और ख्याति मिली। फिल्मों में हिंसा-प्रतिहिंसा का एक ऐसा दौर भी आया, जिसमें नायक ने देवत्व का चोला फेंक कर अन्याय और शोषण से लड़ने के लिए अपराध का रास्ता चुन लिया।
एंटी हीरो ने पारंपरिक नायक की पहचान बदली तो खलनायक का चोला भी बदल गया। कम बुरे और ज्यादा बुरे के संघर्ष में हारा हर बार ज्यादा ही बुरा, लेकिन कई बार यह ज्यादा बुरा कम बुरे पर हावी हो गया और खालिस खलनायक स्टार बन गया। डाकुओं पर फिल्में बहुत बनीं। कई में तो नायकों ने ही डाकू की भूमिका की। लेकिन जो छाप ‘शोले’ के गब्बर सिंह के रूप में अमजद खान ने छोड़ी, वह अद्वितीय है। अमजद खान ने बाद में पचास से ज्यादा फिल्मों में तरह-तरह की भूमिकाएं की लेकिन किसी भी चरित्र को वे गब्बर की ऊंचाई तक नहीं पहुंचा पाए।
जीपी सिप्पी-रमेश सिप्पी ने ‘शोले’ के बाद अपनी अगली फिल्म ‘शान’ में शाकाल (कुल भूषण खरबंदा) खड़ा किया पर वही सलीम-जावेद शाकाल को गब्बर की टक्कर तक नहीं पहुंचा पाए। 1987 में बनी ‘मिस्टर इंडिया’ में ‘मोगैम्बो खुश हुआ’ का संवाद बोल कर अमरीश पुरी जितने लोकप्रिय हुए उतनी ख्याति सौ से ज्यादा फिल्मों और कुछ में ‘मिस्टर इंडिया’ से भी बेहतर अभिनय करने के बाद भी वे पा नहीं सके। यह मोगैंबो का ही कमाल था कि अमरीश पुरी एक फिल्म में काम करने का एक करोड़ रुपया पाने वाले पहले खलनायक बन गए। खलनायक के बढ़ते स्तर का ही यह असर है कि ‘धूम-2’ में ऋतिक रोशन ने खल भूमिका की और फिर ‘धूम-3’ में आमिर खान इसी अवतार में दिखे। सैफ अली खान ‘ओंकारा’ में खलनायक बने और यह उनके करिअर की अब तक की सर्वश्रेष्ठ फिल्म भी कही जा सकती है। सुनील शेट्टी ‘मैं हूं ना’ में खलनायक बने। ‘मिशन कश्मीर’ के बाद जैकी श्राफ ने कुछ हिंदी और दक्षिण भारतीय फिल्मों में खलनायकी की। दरअसल, खलनायकी में ज्यादातर कलाकार या फिल्मकार इसलिए सफल नहीं हो पाए क्योंकि वे अपनी स्थापित छवि को नहीं तोड़ पाए। लेखन के स्तर पर भी उन्हें मजबूत सहारा नहीं मिला। एक खलनायक का नया हाव भाव अपनाने की कोशिश करने की बजाए बंधे बंधाए ढर्रे को ही उन्होंने अपनाया। जो इन बाधाओं को दूर कर पाए वे छाप छोड़ने में सफल हो गए। किसी हीरो या फिल्मकार का विलेन बनना फिल्म के लिए उत्सुकता तो जगाता ही है साथ ही कुछ अतिरिक्त की उम्मीद भी बांध देता है। इस अनिवार्यता को ज्यादातर लोग परख नहीं पाते इसलिए कमजोर साबित हो जाते हैं। फिर सबके बस का खलनायकी करना नहीं होता। सबकी अपनी-अपनी सीमा होती है और उससे बाहर निकलने के लिए जिस एकाग्रता की जरूरत होती है उसे अपनी अन्यत्र व्यस्तता की वजह से सब नहीं अपना पाते।
