निर्देश निधि
उस बार पापा अपने प्रमोशन के बाद हम सबको भी दिल्ली ले आए थे। हम उत्तर प्रदेश के छोटे से कस्बे, प्रतापगढ़ के मिलनसार लोग, खुद में ही जीने वाले, तेज रफ्तार दिल्ली वासियों के बीच आ गए थे। दिल्ली न सिर्फ देश की, बल्कि मेरे मन की भी राजधानी रही है। जगमग रोशनी से भरी दिल्ली की सड़कों पर अनगिनत दौड़ती छोटी-बड़ी गाड़ियां मुझे सदा आकर्षित करती रही हैं। उसकी ऐतिहासिक इमारतों की तस्वीरें मेरे मन पर सदा छपी रही हैं। पर पापा की भाग-दौड़ भरी जिंदगी और सीमित आमदनी की मजबूरी के चलते मैं प्रतापगढ़ में रह कर उन्हें कभी देख नहीं पाई। मैं खुशी के रंगीन परों पर सवार तैरती फिर रही थी, कि अब एक-एक कर उन सारी इमारतों को देख सकूंगी।
हम जिस घर में आए, वह पहली मंजिल पर था। सामने छोटा-सा पार्क था, पीछे गुरुद्वारा, दाहिनी तरफ चार मंजिला इमारत और उत्तर की ओर हमारे घर से सटा हुआ सिर्फ एक मंजिला मकान था, जिसका आंगन खुला था। हम सहजता से अपनी बालकनी से उसमें झांक सकते थे। हम बच्चे किसी मंजे हुए खोजी दस्ते जैसा व्यवहार कर रहे थे। इस तरफ क्या है? उस तरफ कौन है? हमारी जांच-पड़ताल की प्रक्रिया के दौरान हमारा अपनी बालकनी से उस खुले आंगन की तरफ झांक लेना स्वाभाविक ही था। एक-दो बार तो कुछ नहीं हुआ। पर हमें जल्दी ही पता चल गया कि पड़ोस के उस आंगन में झांकना, कितना अपमानजनक हो सकता था। पापा ऑफिस चले गए थे। मां काम-काज निपटा कर अपनी बेहद पसंदीदा लेखिका अनीता सिन्हा का नया उपन्यास पढ़ रही थीं, जिसे वह काम-काज निपटाए बगैर भी देर तक पढ़ती रह सकती थीं। इसलिए हम उनकी जगह दादी को अपने साथ बालकनी में खींच लाए। हमने झांका तो झांका, अपनी दादी को भी उस खुले आंगन में झंकवा दिया। दादी को झांकते हुए उस खुले आंगन वाले मकान की मालकिन ने देख भी लिया। हालांकि वे आयु में दादी से काफी छोटी रही होंगी, पर उन्होंने अपनी कड़क आवाज में कहा, ‘ऐसे बुजुर्ग बच्चों को क्या तौर-तरीकों और संस्कारों की शिक्षा देंगे, जिन्हें खुद ही तमीज न हो। दूसरों के घरों में असभ्यों की तरह झांकते फिरते हो, हुंह।’ इस अपमान से तिलमिलाई हुई दादी ने हमें खासी डांट लगाई, ‘खबरदार जो कभी तुममें से किसी एक ने भी उधर झांका, इधर चलो तुम सब। मुझे और ले गए उधर बेइज्जती कराने, बेवकूफ कहीं के।’
हम अपनी पड़ोसन से बेहद नाराज हो गए, उन्होंने हमारी प्यारी दादी का इतना भयानक अपमान जो किया था। मेरा राजधानी आगमन का उत्साह कुछ ठंडा-सा पड़ गया था। ऐसे लोग रहते हैं मेरे सपनों की राजधानी में? उनके आंगन में सिर्फ झांका ही तो था, कुछ चुरा तो नहीं लिया था न। अपने प्रतापगढ़ में तो अगर हम रेखा चाची के आंगन में झांकते नहीं थे, तो वे खुद ही हमें आवाज देने लगती थीं- ‘रूबी, शीनू, दक्षी, अरे कहां हो तुम सब आज, दिखाई ना दिये बच्चों? अरे रौनक ना लगती है तुम सबके बिना।’ फूटी आंख न सुहाने वाली गंवार रेखा चाची को उस दिन मैंने अपने सगों में शुमार कर लिया था। उस दिन मन उनसे मिलने के लिए बेचैन हो उठा था। मां से बार-बार उनका जिक्र किया था उस दिन मैंने।
‘मां, कितना अच्छा होता न कि रेखा चाची भी यहीं आ जातीं।’
मां ने घोर आश्चर्य से मेरी ओर देखा था, और बोलीं, ‘अच्छा, वहां तो वह बेचारी तुम्हें पुकारती रहती थी, फिर भी तुममें से कोई न जाकर फिरता था उसके पास।’
खैर, हमारा हमेशा सचेत रहना जरूरी हो गया था कि हमारा कोई भी सामान, सुरसा के मुंह जैसे, उस आंगन में न जा गिरे। पर हवाओं को थोड़े न यह पता था कि वह आंगन सुरसा का मुंह है। सावधानी बरतने के बावजूद हवा चुपके से हमारा एकाध कपड़ा उस आंगन में ले जा गिराती और मां कहतीं कि, ‘बस अब तो यह आंगन निगल ही लेगा इस कपड़े को।’ और वाकई, आंगन उसे निगल ही लेता। धीरे-धीरे हमारी अनगिनत चीजें सुरसा के मुंह जैसे उस आंगन में हमेशा के लिए जा समार्इं।
उस आंगन की मालकिन अगर कभी कहीं दिख जातीं, तो हम उन्हें एक-दूसरे को दिखाते हुए कहते, ‘देखो देखो वह रहीं मैडम खडूस।’ वाकई हमारी नजर में वे दुनिया की सबसे खडूस औरत बन चुकी थीं। यह उन्हें भी पता था, पर उन्हें तो जैसे अपने विषय में हमारी राय से कोई फर्क पड़ता ही नहीं था।
बड़ी दीदी और उनकी आठ माह की नन्ही-सी बेटी पाखी के आए बगैर तो पापा का प्रमोशन और हमारे दिल्ली आने की खुशी बिल्कुल अधूरी थी। सो, हम चारों की मुखिया दीदी को, भैया उनकी ससुराल बनारस जाकर लिवा लाए थे। दीदी और उनकी नन्ही-सी बिटिया के आते ही हमारा घर रौनक से भर गया। मैं पाखी को गोदी लूंगी और मैं लूंगा, की होड़ लग गई। पाखी हमारे अनजान चेहरे देख कर रो पड़ी। इसलिए उसे चुप कराने के लिए पड़ोस वाले आंगन के खौफ से बेखबर दीदी ने बालकनी की छोटी-सी दीवार पर बैठा लिया। वह बच्ची न जाने कैसी जोर से किलकारी मार कर उछली कि वह बनारस से दिल्ली तक के सफर से थकी-मांदी दीदी के हाथ से छूट गई। उनके पकड़ते-पकड़ते वो सुरसा के मुंह जैसे उस आंगन में जा गिरी। दीदी के आते ही, यह कैसी अनहोनी हो गई थी। पल भर को तो हममें से किसी को कुछ समझ ही नहीं आया। शाम का समय था। आसमान में घटाओं का झुरमुट-सा था, जिसकी वजह से अंधेरा कुछ जल्दी ही हो गया था। ‘मैडम खडूस’ भी आज शायद लाईट जलाना भूल गई थीं। आंगन में कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। वहां खड़े रह कर सिर्फ देखते रहने का धैर्य भी हममें से किसी के पास था नहीं। सो, जो जैसे था वैसे ही नीचे मैडम खड़ूस के घर की तरफ भागा। हम सब के सब उनका दरवाजा खटखटा रहे थे लगातार। पर दरवाजा नहीं खुला। दादी और मां उन्हें खुले शब्दों में कोस रही थीं। ‘ऐसी पत्थरदिल औरत हमने कभी न देखी, आपसी भाई-चारा तो इसे छूकर भी न निकला। हे भगवान, ऐसे लोगों को तो जंगल में जाकर बसना चाहिए।’ दरवाजा खटखटाने के लिए हाथ और मैडम खड़ूस को कोसने के लिए जुबान दोनों एक साथ बड़ी तेजी से चल रहे थे, पर बदले में बस चुप्पी ही थी। और दीदी, वह तो बस लगातार रोए ही जा रही थी।
अंतत: दरवाजा धीरे से खुला। हम सारे के सारे मैडम खड़ूस से पूछे बिना ही आंगन में जाने के लिए उनके घर के अंदर दौड़ पड़े। पर हमें आंगन तक जाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी। जैसे ही उनकी गैलरी पार करके हम अंदर पहुंचे, हमें उनके बेडरूम से पाखी की किलकारियां सुनाई दी। यह वही पाखी थी, जो हमारे पास चिल्ला-चिल्ला कर रो रही थी और मैडम खडूस के यहां आकर, आकर क्या गिर कर भी, इसे किलकारियां सूझ रही थीं। मां ने दौड़ कर उसे गोद में उठा लिया। दीदी और भी जोर से रो पड़ीं। पाखी को उनके बेडरूम में किलकारियां मारते देख दादी की पारखी आंखें मैडम खड़ूस को पल भर में पहचान गई थीं। वे मां से बोली थीं, ‘शशि इस औरत की कठोरता तो दिखावा भर है भई, क्योंकि जो बच्ची, हमारी छुआई तक न ले रही थी, देख तो इसके पास वो यहां कैसी किलारियां भर रही है। कहावत झूठ तो न बनी शशि कि ‘बड़ा जानै किया और बच्चा जानै हिया।’ मां पाखी को गोद में लिए मैडम खड़ूस का धन्यवाद देने उनकी ओर मुड़ी, तो देखा कि वे अपने बाएं हाथ को पकड़े दर्द से बुरी तरह कराह रहीं थीं। दरअसल, वे लाइट जलाने आंगन में आई थीं, पाखी को गिरते देखा तो उन्होंने झट से उसे अपनी बाहों में ले लिया। वे संभल नहीं पार्इं और गिर पड़ीं। उनका अपना और पाखी का सारा भार उनके बांए हाथ पर आ पड़ा, जिससे उनकी बुढ़ाती हड्डी चरमरा कर टूट गई थी। चूंकि वे अकेली रहती थीं, इसलिए हम ही उन्हें अस्पताल ले गए। उनकी दो हड्डियां टूट गई थीं। हाथ पर महीनों के लिए प्लास्टर बंध गया था। सो मां जिद करके उन्हें अपने साथ ले आई थीं, अपने घर। जिस मैडम खड़ूस को हम जानते थे, ऐसा लग रहा था जैसे ये तो वो हैं ही नहीं। वे तो किसी दूसरे के बच्चे की वजह से अपना हाथ तोड़ बैठने वाली स्नेहमयी हैं। मां को उनका चेहरा बहुत ही जाना-पहचाना-सा लगा। उन्होंने बताया कि वे लेखिका अनीता सिन्हा हैं। मां अपनी पसंदीदा कहानीकार-उपन्यासकार को अपने घर में पाकर कितनी खुश हुर्इं, बताया नहीं जा सकता। मगर हां, इतना जरूर कह सकती हूं कि उनका परिचय जान कर मां को हमेशा परेशान करने वाला उनकी कमर का दर्द कुछ दिनों के लिए उड़न छू हो गया था।
मां को तो जैसे उनकी बिछड़ी सहोदर मिल गई थी। भूतपूर्व मैडम खडूस ने हमें बताया कि उनके आंगन में गिरी हमारी हर चीज उनके स्टोर की अलमारी में सुरक्षित रखी है। उन्होंने अपने खडूसपन का राज खोलते हुए बताया कि हमसे पहले उस मकान में रह रहे लोगों ने उन्हें खूब परेशान किया था। यहां तक कि उनके बच्चे कूड़ा आंगन में फेंक देते थे। इसी कारण उन्होंने हमें शुरू में ही डराना-धमकाना बेहतर समझा। यह सुन कर हम खूब हंसे और वे खुद भी। पांच बरस के दिल्ली प्रवास के बाद हम पुन: अपने धीमी गति वाले कस्बे प्रतापगढ़ में आ गए थे। पापा पहले की तरह अपनी अगली पोस्टिंग पर अकेले ही चले गए थे। क्योंकि भैया, दीदी सबकी पढ़ाई पूरी हो चुकी थी और सबसे जरूरी इसलिए कि हमारी दादी अपनी चौखट से ही अपनी अनंत यात्रा पर जाना चाहती थीं।
मां अपनी अचानक पैदा हो गई सहोदर बहन के पास जाती और उन्हें अपने पास बुलाती रहीं। अब वे हमारी मां की बहन ही नहीं, हम सबकी प्यारी मौसी भी बन गई थीं । उस बार जब अनीता मौसी बीमार हुर्इं, तो मां उनके पास गर्इं। चूंकि मां घर छोड़ कर बहुत दिनों नहीं रह सकतीं थीं और मौसी को अकेले भी नहीं छोड़ सकतीं थीं, इसलिए उस बार वे मौसी को उनके साजो-सामान सहित प्रतापगढ़ ले आई थीं, अपने घर, क्योंकि अनीता मौसी ने विवाह नहीं किया था।
ऐसा लगता है जैसे अशक्त अनीता मौसी अपनी उम्र के अंतिम पड़ाव पर हैं। इसलिए मां उनकी बहुत देखभाल करती हैं। पापा रिटायर हो गए हैं। मेरे सारे बहन-भाई अपने-अपने परिवार में रम गए हैं, दादी अपनी चौखट से अपनी अनंत यात्रा पर निकल चुकी हैं। मैं ही बची हूं मां-पापा और मौसी के पास। मां के बच्चे उन्हें अपने पास बहुत बुलाते हैं, पर वे यह कह देती हैं कि ‘अरे ना-ना मैं ना आ पाऊंगी, अब अनीता जीजी को एक दिन के लिए भी अकेले न छोड़ सकती मैं तो।’ आजकल अनीता मौसी खुद कुछ नहीं कर पातीं, इसलिए मैं ही उनकी बिखरी हुई अंतिम कहानियों को इकट्ठा करके उनकी ही देखरेख में उनका एक संग्रह प्रकाशित कराने की कोशिश में हूं। इस सच के साथ कि, यह संग्रह हमारी मैडम खड़ूस की कहानियों का अंतिम संग्रह होगा।

