जवाहर चौधरी

पचहत्तर की उम्र में प्रेमबिहरी जी का देहांत कल रात नौ बजे के करीब हो चुका था। लेकिन मिसिर परिवार ने किसी को सूचित नहीं किया। दरअसल, उनकी हिम्मत नहीं हुई किसी को सूचित करने की। पता नहीं लोग आएंगे या नहीं, इधर तो लोग मरते आदमी को भी अनदेखा कर निकल जाते हैं। सूचित करें और दरवाजे पर कोई आए ही नहीं तो इस बात का दुख बड़ा हो जाएगा। उत्तरप्रदेश में होते तो और बात थी, इंदौर जैसे महानगर में खबर देने लायक कोई सूझ भी नहीं रहा था। इमारत के पांचवे माले पर वे लोग जिस फ्लैट में रहते हैं वहां आजू-बाजू तीन परिवार और हैं अलग-अलग प्रदेशों से आए हुए। तीन साल साथ रहते हुए हो गए, पर अभी तक कोई भी दूध-पानी नहीं हुआ है। बिल्डिंग के बाकी लोगों की बात भी इससे अलग नहीं है। प्रेमबिहरी जी को उम्र के हिसाब से लिफ्ट में आते जाते कोई ‘दा-जी’, कोई ‘सरजी’ संबोधित कर देता, बस उससे आगे कुछ नहीं। शायद ही किसी ने कभी उनकी तबियत पूछी हो। उनके दोनों बेटे भी कहां अलग माटी के साबित हुए, वे भी बिल्डिंग में आकर दूसरों जैसे हो गए, कभी किसी से कुछ नहीं पूछते या बतियाते। लाचारी भी है, यहां आकर वे इतने व्यस्त हैं कि किसी से हाल लेना तो दूर, बात भी नहीं कर पाते हैं। आज जब अचानक पिता चले गए तो समझ नहीं आ रहा कि क्या करें। यहां हर फ्लेट बंद दरवाजे के पीछे एक अलग दुनिया है, जो बाहरी संसार से मानो पूरी तरह कटी हुई है। घर में दोनों भाइयों की पत्नियां हैं, बच्चे अभी बहुत छोटे हैं एक साल भर का दूसरा पौने दो साल का।

‘हमें कुछ लोगों को सूचना देना चाहिए?’ गगनबिहारी ने कहा।
‘किसे दें?’ अंदर ही अंदर पूरी टाउनशिप का ध्यान कर लेने के बाद छोटे विश्वबिहारी ने पूछा।
‘किसी को तो बुलवा लो, घर में लाश पड़ी है और सामने पूरी रात!’ बड़ी राधा बोली।
‘वही तो पूछ रहे हैं, किसे बुला लें, कौन आएगा। दरवाजा भी तो खोलता नहीं कोई। और इस समय प्राइम टाइम है टीवी का।’ विश्वबिहारी बोले।
‘रोने-चीखने से भी कुछ नहीं होगा। तीसरे माले पर एक बार गुंडे घुस आए थे, कितनी मारपीट हुई, लेकिन एक ने भी दरवाजा नहीं खोला था।’
‘दूसरों की क्यों कहें, हमने भी तो दरवाजा नहीं खोला था।… आज हमारे लिए कौन खोलेगा।’
‘कैसे खोलते! हम कोई लड़इए या लठैत तो हैं नहीं, … फिर पुलिस का चक्कर, पुलिस गुंडों को नाम बता कर गवाहों को जोखिम में डाल देती है, सो अलग।’ विश्वबिहारी ने भाभी राधा के कटाक्ष पर सफाई दी।
‘अपनी तरफ से किसी को तो कहना होगा।’ गगनबिहारी चिंतित बने रहे।
‘कहें किसे?… अगर कोई आ भी जाए तो रात भर रुक कैसे सकता है। 406 वालों के यहां जब गमी हुई थी तब भी रात को कोई नहीं गया था उनके यहां। हमें ज्यादा अपेक्षा नहीं करना चाहिए, सबका टाइम कीमती है, उन्हें अपने काम देखने हैं कल सुबह।’
‘अपना यूपी होता तो जरा-सा रोना-धोना करके भीड़ इकट्ठा कर लेते। पर यहां परदेस में…’ छोटी जुगनी बोली।
‘मान लो अगर आज कोई रुक गया तो क्या ऐसे किसी मौकों पर हमें भी दूसरों के यहां रुकना नहीं पड़ जाएगा। उसके लिए क्या हम तैयार होंगे? पूरा दिन खराब होता है।’

‘बिरादरी वाले तो सुबह ही आएंगे।’ जुगनी ने ध्यान दिए बगैर अपनी बात कही।
‘दस बजने को है, बेहतर यही है कि अभी चुप लगाए रखो।…’ विश्वबिहारी ने निर्णय-सा लिया।
‘ऐसे कैसे चुप लगा सकते हैं!’ कहते हुए गगनबिहारी ने सबके चेहरे पढ़े।
इसके बाद कोई संवाद नहीं हुआ। लगा सबने मान लिया कि यही ठीक है।
सुबह हुई, फोन किए, लोग जुटे, दो एक दूर-पास के रिश्तेदार, जात-बिरादरी वाले पांच दस। कुछेक बिल्डिंग वाले भी। एक राहत-सी महसूस हो रही थी दोनों भाइयों को, मृत्यु की खबर सुन कर लोग आ गए इतने, वरना वे तो गए नहीं कहीं भी ऐसे मौकों पर। चेहरे पर शोक उतना नहीं था जितना आभार।
‘आगी नहीं जलाई!’ बिरादरी के एक प्रभावशाली लगने वाले व्यक्ति ने पूछा।
‘आग!’ गगनबिहारी कुछ समझा नहीं।
‘प्राण कब छूटे?’ उन्होंने आगे पूछा।
‘कल रात… नौ बजे के आसपास।’ गगनबिहारी के मुंह से निकल गया।
‘तो आगी! अंतिम संस्कार कैसे होगा आगी के बिना?’
‘माचिस…?’
‘माचिस!… नाम मत लो माचिस का। माचिस का उल्लेख नहीं है शास्त्रों में।’ आवाज सुन कुछ और शास्त्र समर्थक पास आकर सट गए।
‘फिर आप बताएं काका जी।… हमें तो कुछ भान रहा नहीं।’
‘उपला मंगवाओ… उपला। गोबर का कंडा।… दौड़ाओ किसी को। अब समय नहीं है।’ काकाजी संबोधन से वे थोड़े नरम पड़ गए थे। दरअसल, वे रूपनाथ मिसिर हैं और बिरादरी में ऐसे मौकों के अघोषित मुखिया भी।

जो लोग मिल एरिया में अंतिम संस्कार का सामान लेने गए थे उन्हें ही फोन से उपले भी लाने को कहा गया। इधर काकाजी के आसपास लोगों की संख्या बढ़ गई। वे बोले- ‘क्या समय आ गया है जी!… कोई रो नहीं रहा है! हमारे उत्तर प्रदेश में तो ऐसे मौकों पर माहौल ही अलग होता है, औरतें रोरो कर बेहोश गिरी जातीं हैं। किसी की मौत हो जाए तो दूर से ही पता चल जाता है और जब तक संस्कार नहीं हो जाता, मोहल्ले-टोले में किसी के घर चूल्हा नहीं जलता है।… और यहां… देखिए उधर… होटल में कितनी भीड़ है। लोग पोहा-जलेबी खा रहे हैं। कचैड़ी-समोसा भी चल रहा है दही चटनी के साथ।’
‘अब यहां महानगर में भीड़ बहुत है, कोई किसी को जानता नहीं है।’ साथ वाले ने बयान और उत्तर का कांबो-पैक सामने रखा।
‘अरे घर वालों में ही ज्ञान नहीं है। देखिए… आगी ही नहीं जलाई! जबकि उसके बिना संस्कार हो ही नहीं सकता।… एं।’
‘शिक्षा ने सबको भ्रष्ट कर दिया जी। डर लगता है कहीं काली पोलीथीन में भर कर नगरनिगम की गाड़ी में न डालने लगें शव को।’ साथ वाले दूसरे सज्जन ने पता नहीं कहां का गुस्सा निकाला।
तभी किसी ने आकर सूचना दी- ‘काकाजी कंडे आ गए हैं। केरोसिन लेने गया है दुकान पर…’
‘केरोसिन!… किसने कहा कि केरोसिन से जलाना है कंडे को!’
‘फिर? माचिस से तो जलेगा नहीं।’
‘कुछ जानते नहीं हो! अरे भई चूल्हे की आगी से जलाया जाता है। वो तीन तरफ वाला चूल्हा होता है न? जानते हो?’
‘वो चूल्हा!… यहां वो चूल्हा किसके पास होगा, सब गैस या हॉट प्लेट वापरते हैं।’
‘गगनबिहारी को बुलाइए… यही होता है जब किसी बड़े की जरूरत नहीं समझी जाती।’ आचार्यजी ने अपनी सत्ता लगभग कायम कर ली।
गगनबिहारी आए- ‘जी आचार्यजी, उपले आ गए हैं।’
‘चूल्हे की आगी से जलाना होगा, तुम्हारे यहां तो होगा नहीं? चूल्हा किसके यहां होगा?’
‘यहां तो सबके पास गैस…’

‘कोई गरीब गुरबा तो होगा आसपास, आगी उधार ली जा सकती है… विधान है। देखो कोई…’
‘पीछे एक बिल्डिंग बन रही है, उसका चौकीदार वहीं झोपड़ी बना कर रहता है। उसके यहां तीन र्इंट का चूल्हा है।’ पीछे खड़े एक ने पता दिया।
स्कूटर से एक को दौड़या गया। इधर काकजी का प्रवचन आरंभ हुआ, ‘अग्नि पंच तत्वों में से एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। अग्नि को आदर से पैदा किया जाता था और फिर उसे चूल्हे में सहेज कर रखा जाता था। वो अग्नि पवित्र होती थी।’
आग लेने गए लड़के लौट आए, बोले- ‘उसके चूल्हे में आग नहीं है। चा-पानी हो चुका और खाना बनाने में अभी बहुत देर है।’
‘इंदौर इतना बड़ा भी नहीं है कि कहीं चूल्हा नहीं मिले। ढूंढ़िए कहीं या फिर उससे कहिए कि चूल्हा जलाए थोड़ी देर के लिए।’ आदेश जैसा कुछ देकर वे पुन: शुरू हो गए, ‘सही बात तो ये है कि जिस परिवार में मृत्यु हो वो अपने चूल्हे की आग निकाल कर उपलों पर रख देता है। इससे उसका चूल्हा ठंडा हो जाता है तीन दिनों के लिए। ठंडा चूल्हा शोक का प्रतीक है और घर में कुछ भी पकाया नहीं जाता है। रिश्तेदारों और पड़ोसियों के यहां से भोजन इसीलिए आता है। किंतु अब देखिए… चा-पानी, नाश्ता-वाश्ता सब चलता है। वो देखिए ऊपर गैलरी में, … कैसे मजे में झांकते हुए कुछ खा-पी रहे हैं लोग। कोई संस्कार और संवेदना नहीं है महानगरों में।’
गगनबिहारी सकुचाते से आए- ‘आचार्यजी, शव वाहन आ चुका है, अरथी भी लगभग तैयार है… आप कहें तो…’
‘किंतु आगी की व्यवस्था नहीं है। उसके बिना कैसे होगा? परिवार का आदमी आगी ले कर आगे आगे चलता है।’
‘वही आपसे पूछ रहे हैं कि उपले को जला लें क्या, केरोसिन भी आ गया है।’
‘केरोसिन से आगी बनाना है तो यहां क्यों… वहीं सीधे शव पर छिड़क के माचिस क्यों न बता दें!’
‘लोग हमसे पूछ रहे थे, सो हमने आपसे पूछ लिया।’
‘कायदे से तो मृत्यु होते ही उपला जला कर दरवाजे के बाहर रख देना था।’
‘काकाजी अब यहां पांचवी मंजिल पर!… फ्लैट में!… और फिर हमें कुछ पता भी नहीं था।’
विश्वबिहारी बड़ी देर से देख रहे थे। बड़े भाई को एक तरफ ले गए- ‘ये कौन हैं भइया?’
‘कोई मिसिर जी हैं, बिरादरी के मुखिया समझो। इनकी नहीं सुनी तो इंदौरी यूपियनों के कान बज उठेंगे हमारे खिलाफ।’
‘तो क्या होगा? डर है किसी का?… उपले नहीं जलाए, ऐसे नहीं जलेगा, वैसे नहीं जलेगा! क्या मजाक है समझ में नहीं आता!’
‘ठहरो… एक बार और कोशिश करते हैं।’ गगनबिहारी आचार्यजी के पास हाथ जोड़ कर फुसफुसाए- ‘क्यों न गैस पर उपला रख कर जला लें… और फिर गैस बंद कर टंकी हटा लें। इससे घर के चूल्हे की आग भी हो जाएगी और चूल्हा भी ठंडा हो जाएगा?’
‘उचित तो नहीं है, पर असहाय स्थिति में युक्ति भिड़ा लेने की अनुमति है शास्त्रों में।… जला लो।’ आचार्य जी ने दाएं-बाएं, यहां-वहां, पूरब-पश्चिम करके आखिर हरी झंडी बता दी।

अंतिम यात्रा की तैयारी आरंभ हुई। शववाहन के कारण श्मशान पहुंचने में अधिक समय नहीं लगा। लोग अपने अपने वाहन से साथ ही बने हुए थे। पता चला कि श्मशान में लकड़ी नहीं है, विद्युत शवदाहगृह की व्यवस्था है।
अब आचार्य जी के बिफरने का मौका था। उन्होंने अनुमति नहीं दी और दूसरे श्मशान चलने का सुझाव दिया। लेकिन किसी ने बताया कि वहां भी लकड़ी नहीं है, कल ही वे किसी के अंतिम संस्कार में वहां थे और विद्युत शवदाहगृह में ही सब हुआ।
लोगों में उपेक्षा के भाव उतरने लगे, जिसे उन्होंने ताड़ लिया। विद्युत शवदाह की औपचारिकता की जाने लगी। कंडा एक तरफ पड़ा था, मानो कंडा न हो आचार्य जी की सत्ता हो। वे जलते कंडे के साथ धुआं धुआ होने लगे, एक आग-सी उनके अंदर सुलग उठी। उन्हें लगा था कि बिजली-दाह ही सही, लेकिन उनसे पूछ-पूछ कर ही काम किए जाएंगे। लेकिन बात हाथ से निकली जा रही है। शव पर से फूलमाला आदि हटा लिए गए थे। उन्हें लगा कि शव कंडे और उनकी हस्ती को अंगुठा दिखा कर बस रवाना हो रहा है। तभी वे आगे आए- ‘पंच तत्व में बिजली का प्रावधान नहीं है। अग्नि के बिना स्वर्ग के द्वार कैसे खुलेंगे! चलो कंडा शव पर रखो।’ कहते हुए खुद उन्होंने कंडा शव पर रख दिया। विद्युत दाहयंत्र का दरवाजा बंद हो गया। आचार्य जी ने भी आंखें बंद कर मुंह फेर लिया। कुछ क्षणों के बाद उन्हें अपनी सत्ता का ध्यान आया और वे जोर-जोर से मंत्रोच्चारण करने लगे।