बलराम
आलोचक-सर्जक प्रभाकर श्रोत्रिय ने मीडियाकर्मी कथाकार मनोहरश्याम जोशी के असामयिक निधन पर उनके बारे में जो लिखा, एकदम सही लिखा था: ‘वे (मनोहरश्याम जोशी) बोर्खेज (स्पैनिश कथाकार) के किसी पात्र की तरह अदृश्य हो गए। पहले तो यही समझ में न आया कि यह यथार्थ है या वायवी यथार्थ। जब तक समझ में आया, वे गंगा में नहा कर यमुना में बिखर चुके थे। वे सिर से पांव तक मनोहर थे, श्याम की तरह नटखट, चुटीले-चुटकी-ले, जोशी-ले अलग से, हरदम किसी विचार से दमकते। विडंबना और छल-छद्म भरी दुनिया के बीचोबीच अपनी तर्जनी पर सुदर्शन चक्र घुमाते। पता नहीं, उससे कभी कोई मरा भी या यों ही वह उनकी मुद्रा भर थी, लेकिन उनकी उस मुद्रा से चमका हर कोई। मनोहर श्याम- यथा नाम तथा गुण। मनोहर और श्याम। एक साथ। ‘हद है कि धर्म-कर्म, पूजा-पाठ, श्राद्ध-व्रत से गुरेज नहीं, कुछ हद तक आस्थावान कहें तो हर्ज नहीं, क्योंकि हद से ज्यादा इसलिए नहीं कहते बनता कि लेखन में सामिष, किसी हद तक पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ की जात के घामड़ और धाकड़; ‘हमजाद’ और ‘हरिया हरक्यूलीस…’ के सर्जक और इश्क के बिल्कुल पेज थ्री फार्मूले की गांठ खोलने में माहिर; आध्यात्मिक आत्मिक-अदैहिक जैसा कोई फर्जी प्रेम नहीं। दिमाग चकरा देने वाली विविधता। आधुनिक ‘मॉल्स’ की तरह एक छत के नीचे पूरी दुनिया, सारे शौक-सौदे। एक आदमी की कल्पना ‘मॉल’ की तरह की जाए तो लगेगा तो बेतुका, मगर साहब, जोशी जी इतने यथार्थवादी, अति आधुनिक, हिंदी में सोप ऑपेरा से उत्तर आधुनिक रचनाओं तक के जनक, विखंडनवाद के साथ ‘बैठी होली’ जैसा अभिनव विखंडनवाद दिल्ली में आविष्कृत करते ठहरे। किस विधा, किस फन में माहिर नहीं? राष्ट्रपति से लेकर हरिया तक, सब उनकी दूकान में; और हां, हजारीप्रसाद द्विवेदी भी। भाषाओं की इतनी दूकानें कि जो चाहें, जहां से उठा लें।
‘पिछले पचास बरस में हिंदी ने प्रतिभा का ऐसा अजूबा नहीं देखा, अर्से तक लगता रहा कि ‘प्रज्ञा’ की यह ‘प्रतिभा’ वाली पारंपरिक सूक्ति विफल है- ‘प्रज्ञा नवोन्मेषशालिनी प्रतिभा’; यहां तो ऐसा है कि अगर गलती से भी कहीं से कुछ नया आ जाता है तो उसके नवोन्मेष की बात तो छोड़ दें, लोग उसका ही घोट-घोट कर कचूमर बनाते रहते हैं। नए विचार और जमाने भर की लप्प-गप्प तो ठीक है, भीतर कोई चीज रचे, तब तो रचना में बसे। मनोहरश्याम जोशी ऐसे आत्म मग्न नहीं रहते थे। चीजों को पचाते और फिर हिम्मत से उसे रचते थे। शायद इसीलिए तमाम गिरोहबंदियों के बावजूद हिंदी साहित्य में मनोहरश्याम जोशी देर तक बने रहेंगे। ‘हिंदी का जातीय चरित्र है कि जो जिंदा है, उसमें हजार खोट, बल्कि ‘नारकीय’; और जो चल बसा, वह निश्चित ही ‘स्वर्गीय’। लोग कल तक तो हर मान-सम्मान, आलोचना-समालोचना, पुरस्कार-पद में टांग अड़ाते रहे और तिहत्तर साल की उम्र तक साहित्य अकादेमी पुरस्कार को घसीट कर आगे ले जाते रहे। बाद में कहने लगे कि वे महान, अप्रतिम, विलक्षण, घिसे-पिटे यथार्थ को मटियामेट कर हिंदी साहित्य में नई हवा लाने वाले लेखक रहे। विडंबना के लेखक के साथ विडंबना देखिए कि तिहत्तर की उम्र में उन्हें सैंतीस साल का समझ कर साहित्य अकादेमी पुरस्कार दिया गया, लेकिन इसके लायक तो वे न जाने कब के हो चुके थे।
‘बहरहाल, जो है, सो है, जितने नए थे, थे; जितनी तरह के कौतुक और विडंबनाएं लिखते थे, खुद उससे कम खुदा नहीं थे। जितने अच्छे थे; जितने स्वीकार्य थे, थे; जितने अस्वीकार्य थे, थे। जीवित मनोहरश्याम जोशी के साथ जो अव्याप्ति की गई, वह अगर दिवंगत जोशी की अतिव्याप्ति में बदलेगी तो वे खुद खिल्ली उड़ाने के लिए आ धमकेंगे और पूछेंगे, ‘आपकी सेहत तो ठीक है न बौज्यू?’‘मनोहरश्याम जोशी की लैंड लाइन कट गई, मगर मोबाइल चालू रहेगा। वे इलेक्ट्रॉनिक कानों से सुनते रहेंगे और जादुई आंखों से चित्र भी उतारते रहेंगे। अतियों से परे जब उनकी प्रतिभा के अवदान का ईमानदार मूल्यांकन होगा तो शाबासी देते हुए कहेंगे, ‘चलो, अब तो तुम्हें अकल आई? आप मुस्करा रहे हैं न जोशी जी, हमारा प्रणाम लें।’प्रभाकर श्रोत्रिय ने यह प्रणाम साहित्य अकादेमी पुरस्कार घोषित होने के तत्काल बाद गुजर गए मनोहरश्याम जोशी के लिए लिखा था। विडंबना के सर्जक को ऐसी श्रद्धांजलि अर्पित करने वाले प्रभाकर श्रोत्रिय के जीवन की भी विडंबना देखेंगे तो तकलीफ होगी। जोशी जी से भी बड़ी त्रासदी में फंसे वे। जैसे जोशी जी बहुत पहले साहित्य अकादेमी पुरस्कार पाने लायक हो गए थे, वैसे ही प्रभाकर श्रोत्रिय भी, बल्कि उनके लिए तो उनसे भी ज्यादा अवसर बनते थे। उन्हें संगीत नाटक अकादेमी पुरस्कार भी मिल सकता था, मोहन राकेश की तरह। दोनों अकादमियों के पुरस्कारों के लिए उनका नाम बार-बार आया, लेकिन एक भी उन्हें मिला नहीं। जिस वर्ष नासिरा शर्मा के उपन्यास ‘पारिजात’ को साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला, जूरी ने प्रभाकर श्रोत्रिय और रमेशकुंतल मेघ के नामों पर भी विचार किया था। मेघ को तो अगले वर्ष मिल गया, लेकिन प्रभाकर श्रोत्रिय चले गए, बिना पाए। उन्हें वह मिल सकता था, बशर्ते जिंदा रहते और ‘समकालीन भारतीय साहित्य’ का संपादन छोड़ देते। अस्पताल से हुई फोन वार्ता में उन्होंने ऐसा इरादा जाहिर किया भी था।
दिल्ली से जब भी भोपाल पहुंचता हूं तो श्रोत्रिय जी की यादें पीछा करने लगती हैं। ठीक से याद नहीं, लेकिन वह शायद उन्नीस सौ चैरासी का 15 नवंबर था, जब न्यू मार्केट के होटल से प्रभाकर श्रोत्रिय को मिलने के लिए फोन किया। जाने किस प्रेरणा के वशीभूत फोन वार्ता में ही बोल गए, ‘सामान पैक कीजिए। होटल पहुंच रहा हूं।’ समझ में नहीं आया कि सामान पैक करने की बात क्यों कह रहे हैं। आधे घंटे बाद स्कूटर पर होटल आए और सामान समेत अपने घर ‘उठा’ ले गए। अगले दिन जब दिल्ली के लिए चले तो रेलवे स्टेशन पर विदा करते हुए बोले, ‘अब से जब कभी भोपाल आइए तो होटल में ठहरने की बात सोचिएगा भी नहीं।’ ऐसा कहते उनके चेहरे पर मचलती उस मृदुल मुस्कान की स्मृति अब भी दिल में हलचल मचा देती है। वे सचमुच वैष्णव मानुष थे, एकदम देव स्वरूप। ऐसी निश्छल और मृदुल हंसी के साथ रूप-सुरूप के मामले में उनके साथ सिर्फ और सिर्फ अज्ञेय को रख पाते हैं। जब तक श्रोत्रिय जी भोपाल रहे, दसियों बार वहां जाना हुआ और उनका आशियाना हमारा शरण्य होता रहा। अशोक वाजपेयी के ‘संस्कृति पुरुष’ बनने का घनघोर काल था वह, जब हम एक बार सोमदत्त से मिलने मध्यप्रदेश साहित्य परिषद गए। ‘साक्षात्कार’ में उन्होंने ‘कारा’ का एक लंबा अंश छापा और उसी के कारण सागर में हुए उपन्यासकार सम्मेलन में आमंत्रित कर लिया था, जबकि जाने में हमें हिचक हो रही थी, क्योंकि तब तक हमारा एक भी उपन्यास छपा नहीं था, लेकिन उन्होंने साधिकार कहा था कि ‘कारा’ का यह अंश ही तुम्हें उस समारोह में आने के लिए सुपात्र सिद्ध कर रहा है, जो तमाम सिद्ध उपन्यासकारों पर भारी पड़ेगा। सो, सोमदत्त से भी दिल का रिश्ता गंठ गया था। वे भी सच्चे और अच्छे मानुष थे, एकदम खांटी और देसी। बात-व्यवहार में कोई बनावट नहीं, दिखावा भी नहीं। दो-तीन घंटे की बैठकी के बाद जब चलने लगे तो उन्होंने ठहरने की जगह पूछी। मैंने बेहिचक बता दिया, ‘श्रोत्रिय जी का आशियाना भोपाल आने पर मेरा शरण्य होता है।’ उन्हें मालूम था कि कानपुर में कामतानाथ के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़ा रहा था। सो, विस्मय से उठ कर जहां की तहां ठहरी पलकों वाली आंखों से घूरते हुए किंचित संकोच में पड़ गए, पर जल्दी ही खुद को संयत करते हुए बोले, ‘चलो, फिर उनके घर ही चलते हैं।’ हमें लेकर सोमदत्त अपनी जीप में प्रभाकर श्रोत्रिय के घर आए तो बैठक में देर तक गपशप होती रही। चाय-पान के बाद जब सोमदत्त चले गए तो विस्मय में डूबे खुशी का इजहार करते हुए श्रोत्रिय जी बोले, ‘सोमदत्त पहली बार मेरे घर आए। यह तुम्हारा ही प्रताप है साहब, अन्यथा भोपाल के प्रगतिशील लेखक तो मुझसे दूरी बना कर रखते ही हैं, अशोक वाजपेयी के डर से सरकारी लेखक भी सब मेरे घर आने और मुझसे किसी भी रूप में जुड़े होने का खतरा मोल नहीं लेते, लेकिन कमाल है साहब, मान गए आपको।’
इस घटना के बाद प्रभाकर श्रोत्रिय से आत्मीयता और भी गहरा गई, जो ज्यादातर लोगों की समझ में कभी आई नहीं, लेकिन प्रभाकर श्रोत्रिय थे ही ऐसे लेखक-आलोचक, जिन्होंने वाम और दक्षिण, दोनों को अपने दो हाथों की तरह लिया। उनके पास कलावाद और प्रगतिशीलता, दोनों के लिए गुंजाइश थी, पर दल-बल वाले लोग उनकी इस सदाशयता को कभी समझ ही नहीं सके। कोई भी सच्चा और अच्छा सर्जक विचारधारा की बेड़ियों को कभी मंजूर नहीं करता, न सच्चा लेखक इस मुगालते में जीता है कि विचारधारा उसे बड़ा लेखक सिद्ध कर देगी। सर्जक को बड़ा तो उसका सृजन ही बनाता है। हर खरा और खांटी लेखक यह सत्य जानता और मानता है। जो नहीं मानता, जल्दी ही अपनी रचनात्मकता खोकर ‘ज्ञान भाई भंडारी’ हो जाता है। अरविंद वाजपेयी से प्रभाकर श्रोत्रिय की अप्रकाशित किताब की चर्चा हुई तो मेरे साथ ज्योति जी से मिलने के लिए तैयार हो गए, लेकिन श्रोत्रिय जी की लैंड लाइन ही नहीं, उनका तो मोबाइल तक मूक हो गया था। उनकी बीमारी के दौरान बार-बार फोन कर बात करने की कोशिश की तो रिंग बेशक जाती रही, पर फोन नहीं उठा। कभी-कभी हालात ही ऐसे हो जाते हैं कि चाह कर भी आदमी कुछ कर नहीं पाता। जीवन के आखिरी दिनों में उनकी स्थिति कुछ ऐसी हो गई थी कि कब दिल्ली में हैं, कब भोपाल में, कब घर में हैं और कब, कहां और किस अस्पताल में, उनसे मिलने जाते तो कहां जाते। अपना स्वास्थ्य भी उन दिनों कुछ ऐसा ही चल रहा था कि धूप में आना-जाना एकदम मना था। चाहते हुए भी आखिरी दिनों में उनसे मिल नहीं सके। भोपाल में इलाज करवाने की खबर लखनऊ में मुलाकात होने पर ज्ञान चतुर्वेदी ने दी थी, लेकिन उसके बाद ब्लैक आउट। निधन के बाद पता चला कि उनकी इच्छानुसार अंत्येष्टि हरिद्वार में होनी है और उन्हें लेकर परिवार के लोग वहीं चले गए हैं। सो, कमलेश्वर और कामतानाथ की तरह प्रभाकर श्रोत्रिय की अंत्येष्टि में भी हम शरीक नहीं हो सके। हां, साहित्य अकादेमी में हुई शोक सभा में शामिल होने का अवसर जरूर मिल गया। एक दिन अरविंद वाजपेयी अकेले ही श्रोत्रिय जी के घर जाकर ज्योति जी से उनकी अप्रकाशित पांडुलिपि ले आए। ज्योति जी ने ऐसा कर हम कथाकारों पर बड़ा उपकार किया है। श्रोत्रिय जी होते तो शायद अब भी अनुपलब्ध समीक्षाएं मिलने और पांडुलिपि को अपडेट करने के चक्कर में रुके होते। ऐसा होता तो निश्चित रूप से बेहतर होता। कम से कम अब जो है, उससे तो बेहतर ही, लेकिन जो नहीं हो सका, उसका क्या गम!
हिंदी आलोचना के सिरहाने बैठे प्रभाकर श्रोत्रिय का सुरीला पाठ उनकी कृति ‘कथा का सौंदर्य शास्त्र’ में ध्वनित हुआ है। अपने वृहत्तर आलोचना कर्म में उन्होंने कृति केंद्रित काम अपेक्षाकृत कम ही किए। कृति या रचनाकार केंद्रित कथा साहित्य में उनकी आलोचना इस प्रवृत्ति की द्योतक है कि उन्होंने नियमित रूप से कथा आलोचना का काम कभी नहीं किया, जिसे ‘जम कर लिखना’ कहते हैं। वैसे समकालीन साहित्य का प्रस्तुतीकरण उनके समग्र लेखन में कम ही हो सका है, मगर सत्य और तथ्य यह भी है कि समकालीन लेखकों की कृतियों से वे हरदम बाखबर रहते रहे। प्रेमचंद्र, जैनेंद्र, नरेश मेहता, गिरिराज किशोर, गोविंद मिश्र, राजेंद्र यादव, चित्रा मुद्गल और राजी सेठ जैसे सिद्ध सर्जकों पर उनकी समीक्षाएं तो ‘कथा का सौंदर्य शास्त्र’ में हैं ही, लेकिन सूर्यकांत नागर और राजेंद्र मिश्र जैसे लगभग अलक्षित कथाकारों पर भी उन्होंने लिखा है, जिसे आलोचना की ऊष्मा भरी अंतर्यात्रा कह सकते हैं। एक आलोचक की अंतर्दृष्टि और अचूक विश्लेषण क्षमता ने इस कृति को मूल्यवान दृष्टिकोण सौंपा है। हिंदी आलोचना के ढुलमुल रवैए के दलदल से दूर हिंदी कथा साहित्य का यह अध्ययन पारदर्शी मूल्यांकन मूल्यों की पुनसर्थापना जैसा गंभीर काम है। कृति से गुजरते हुए पाठक को अनुभव होगा कि किसी कृति की देह और आत्मा को देखने के लिए किस रंग, आयाम और दृष्टि की जरूरत होती है। यह तभी संभव हो पाता है, जब रचना की आलोचना भी एक सशक्त ‘रचना’ होने लगती है। इस कृति में प्रभाकर श्रोत्रिय की कलम से निकला हर वाक्य कृति और कृतिकारों पर निजी आभा फेंकता है। आलोचकीय आग्रह इतना भर है कि उन स्थितियों को पकड़ा-थामा जा सके, जिनके इर्द-गिर्द रचनाओं का सृजन संभव हुआ और फिर उसके नख-शिख को समाज, राजनीति और अंतत: मानव मन के स्तर पर परखा जा सके। इसी के चलते प्रभाकर श्रोत्रिय अगर कहीं कटु और तुर्श भी हुए तो सिर्फ आलोचक की ईमानदारी को बचाए रखने के लिए। ऐसे समय में जब आलोचना पूर्वाग्रहों का बदशक्ल चेहरा बन गई है, प्रभाकर श्रोत्रिय की आखिरी किताब ‘कथा का सौंदर्य शास्त्र’ ईमानदार छांह की तरह संतोष की सांस लेने का उपक्रम रच रही है।
