रमेश दवे
साहित्य किसी भी समाज की सुरुचि की पहचान होता है। वह सांस्कृतिक प्रबोध रचता है न कि विरोध या अवरोध। आलोचना भी साहित्य है। आलोचना-रहित साहित्य लगभग निर्जीव होता है। आलोचना के अनेक साहित्यिक तर्कों के साथ सांस्कृतिक तर्क भी एक तथ्य है। इस सांस्कृतिक तर्क का अर्थ है ऐसा साहित्य जो विचार-समृद्ध होने के साथ मानवीय हो, जिसमें सार्वभौम सदाशयता और सार्वभौम स्वीकृति के तत्त्व हों। भारत में हिंदी या अन्य भाषाओं में क्या केवल द्वंद्व ही साहित्य है? साहित्य की संस्कृति क्या निर्द्वंद्व नहीं हो सकती?
संस्कृति को उसके स्थूल अर्थ में नहीं देखा जा सकता और न वह एकपक्षीय होती है। अनेक तहजीबों, आस्थाओं, धर्मों, जातियों, समाजों की अनेक धाराएं संस्कृति के सागर में आकर एक हो जाती हैं। संस्कृति की विभिन्नताएं मनुष्यता बन कर एक हो जाती हैं। इस एकत्व की मनुष्यता को रचने का काम साहित्य और कलाएं करती हैं। इसलिए संस्कृति को उसके गहरे अर्थ-संदर्भों में समझना होगा।
कोई भी देश पहचाना जाता है उसकी संस्कृति से। संस्कृति वह मूल आधार है जो सभ्यता का मार्ग रचती और उसे प्रशस्त बनाती है। वस्त्र निर्माण और तरह-तरह की वेशभूषा सभ्यता के साथ परिवर्तित होते हैं, लेकिन वस्त्रों में शील और मर्यादा, उनका सौंदर्य और उन्हें ऋतुओं के अनुरूप धारण करना संस्कृति है। संस्कृति का मूल स्रोत हमारी वह विचार शाक्ति है जो सभ्य और असभ्य में भेद दिखाती है। साहित्य में जब हम भाषा, शैली, शिल्प, शब्द-विन्यास, संरचना आदि को देखते हैं तो वह भाषा का भौतिक रूप होता है, लेकिन एक लेखक, कवि, कथाकार जब उसमें विचार रचता है, अपनी कल्पना से संवेदन, सौंदर्य, प्रकृति और समाज के समस्त लोकाचारों, विश्वासों को अभिव्यक्त करता है तो वह साहित्य-सृजन से संस्कृति-सृजन भी करता है।
भारतीय संस्कृति में साहित्य कोई एक-वचन नहीं है, क्योंकि भारतीय मानस की रचना विविधता में हुई है। वैसे भारतीय मन अतीतवादी अधिक है और अतीत में जो भी साहित्य रचा गया, उसी पर आज तक हम मुग्ध हैं। वेद, उपनिषद, काव्य, बौद्ध, जैन वांग्मय, अवेस्ता, गुरुग्रंथ साहब ये सब साहित्य की परिधि में इसलिए नहीं रखे जाते कि इन्हें धर्म-ग्रंथ की संज्ञा दे दी गई है। यहां तक कि रामायण, महाभारत भले उत्कृष्ट काव्य रचनाएं ही क्यों न हों। इसलिए साहित्य को केवल अतीत के सहारे पहचानने के बजाय हमें अपने ऐतिहासिक और आधुनिक क्रम में भी देखना-परखना होगा।
कोई भी देश अपनी भाषा में जब साहित्य सृजन करता है तो वह केवल कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक आदि नहीं रचता, बल्कि उसका सृजन लोकोन्मुखी होता है, लोकोन्मुखी से संस्कृति-उन्मुखी होता है और संस्कृति से अपनी अस्मिता-उन्मुखी होता है। जब साहित्य में किसी बड़े विचार का प्रवेश होता है या एक रचनाकार में जब चेतनात्मक स्पंदन होता है, तो वह साहित्य सार्वभौम हो जाता है और अपने लोक-संवेदन या मानवीय-मर्म के साथ सारी दुनिया को प्रभावित करता है। साहित्य का सांस्कृतिक-पक्ष एक प्रकार से जन, जमीन और उनकी कर्म और चिंतन प्रणाली से जुड़ा रहता है। संस्कृति एक प्रकार का जीवन-व्यापार या जीवन-व्यवहार भी है। हम जब भी नया रचते हैं और उसे लोक-स्वीकृति मिल जाती है तो वह लोक-स्मृति में स्थापित हो जाता है। लोक-स्मृति में स्थापित होना ही संस्कृति के निर्माण की प्रक्रिया है। सभ्यता के तमाम त्वरित बदलाव संस्कृति तब तक नहीं बनते, जब तक वे स्थायी रूप ग्रहण न कर लें।
संस्कृति का पक्ष वह सब कुछ समाहित कर लेता है, जो अतीत या परंपरा में श्रेष्ठ था और वर्तमान में श्रेष्ठ हो रहा है- उसमें साहित्य भी शामिल है। अगर हमारे पूर्वजों ने महान ग्रंथों की रचना की, प्रस्तर-युग से निकल कर प्रस्तर से शिकार के बजाय प्रस्तरों का स्थापत्य, प्रस्तरों का शिल्प, प्रस्तरों में कला, प्रस्तरों में सौंदर्य की रचना की तो प्रस्तर-युग से आगे आना सभ्यता है, मगर प्रस्तर-युग को कलात्मक रूप दे देना संस्कृति है। यही कारण है कि हम अपने मंदिरों का स्थापत्य और मूर्तिकला, ऐलोरा का गुफा-शिल्प, अजंता, बाघ के चित्र, भीमबैठका से लेकर महाबलीपुरम तक के शैलचित्र और शैलशिल्प, मुगल-काल का स्थापत्य आदि अपनी सांस्कृतिक धरोहर मानते हैं तो हिंदी में अमीर खुसरो से लेकर कबीर, तुलसी, जायसी, मीर, गालिब, दक्षिण और पूर्वोत्तर के रचनाकारों को भी अपनी सांस्कृतिक अस्मिता मानते हैं। भारत अन्य देशों की तुलना में बौद्धिक और सर्जनात्मक रूप से इसलिए अधिक सांस्कृतिक है कि यहां की अरण्य-संस्कृति ने भी साहित्य का श्रेष्ठतम सबसे पहले रचा।
संस्कृतियों की दृष्टि से ग्रीस (यूनान) मिस्त्र, अरब, चीन, रोम को भी महत्त्वपूर्ण माना गया है। लेकिन सभ्यता की हिंसक दौड़ ने जहां यूरोप को युद्धवादी बना दिया और वहां शस्त्र-निर्माण की पशुबल-सभ्यता का निर्माण हुआ, वहीं भारत में शास्त्र-संस्कृति का अहिंसक स्वरूप प्रकट हुआ। कुछ विचारक कहते हैं कि रामायण, महाभारत, गीता आदि तो युद्ध-रचनाएं हैं, जिनमें हिंसा है फिर हम होमर के काव्य या ट्रोजन-वार को ही दोष क्यों दें, केवल रोम-ग्रीस, जर्मनी, फ्रांस-इंग्लैंड के बीच के युद्धों को ही क्यों कोसते रहें? यहां युद्धकाव्य और युद्धवादी होने में अंतर है। रामायण, महाभारत, गीता में युद्ध है, वह मनुष्य की प्रवृत्तियों का युद्ध है। वह कोई उपनिवेशवादी युद्ध नहीं है। हम अपने अंदर भी प्रतिदिन अच्छे-बुरे का युद्ध करते रहते हैं। युद्ध हमें योद्धा बनाता है ऐसा योद्धा जो अपने अहंकार अपनी बुराइयों अपनी लोभवादी महत्त्वाकांक्षाओं पर विजय प्राप्त कर सके। इसलिए हमारी कवि-प्रज्ञा में युद्ध आत्म-परिष्कार का माध्यम है, न कि अन्य देशों पर आक्रमण कर उपनिवेश बनाने का।
भारत में अनेक भाषाएं होने के बावजूद, उपनिवेशवाद ने सबसे बड़ा नुकसान यह किया कि हम अंग्रेजी भाषा के पढ़े-लिखे बौद्धिक हो गए। जहां भी अंग्रेजी उपनिवेश कायम हुआ, वहां अंग्रेजी ने इस कदर आधिपत्य कर लिया कि न केवल भारत, बल्कि विभाजन के बाद पाकिस्तान, बांग्लादेश में कई साहित्यकार अंग्रेजी साहित्य के रचनाकार हो गए। अपनी भाषा के प्रति इस प्रकार की आत्मग्लानि ने हमसे अपना सांस्कृतिक-स्वाभिमान छीन लिया और पश्चिमी पंजों ने हमें जकड़ लिया। अगर लैटिन अमेरिकी, फ्रेंच, जर्मन, इटेलियन, इरानी, चीनी-मंदारिन आदि अपनी मूल भाषा में ही नोबेल पुरस्कार हासिल कर सकती हैं तो भारत जो भाषाओं का देश है वह ऐसा क्यों न कर सका या कर सकता है?
अब प्रश्न यह है कि साहित्य का सांस्कृतिक-पक्ष क्या है। जो साहित्य अपनी स्मृति का संरक्षण करे, अपने लोक-जीवन से आस्थाबद्ध रहे, अपने समस्त लोकधर्मी संस्कारों से परिचालित हो और मानवीय गुणों को प्रोत्साहित करे, वह उसका सांस्कृतिक पक्ष है, लेकिन संस्कृति का अर्थ केवल पुरातनता या प्राचीन स्मृति नहीं है। हम अपने समय के लोक-व्यवहार के प्रति चेतनाशील रहें, लोक-जीवन को समृद्ध करें, भाषा को सृजन से संपन्न करें और समाज को शीलवान बनाने, अहिंसक बनाने के साथ कृत्रिम या छद्म-वैचारिक द्वंद्वों से मुक्त कर हर प्रकार के अन्याय, उत्पीड़न, शोषण के प्रति संवेदनवान बनाएं तो अपने समय में विचार की संस्कृति, व्यवहार की संस्कृति का निवेश या नवाचार करते हैं। इसलिए संस्कृति को आधुनिकता, वैज्ञानिकता, तकनीक और सामाजिक जीवन की गति, प्रगति यहां तक कि दुर्गति के प्रति भी संवेदित बनाना होगा। संस्कृति मानवीय आस्था है। इसलिए साहित्य का सर्वाधिक दायित्व है कि वह मनुष्य को सतत उसके मनुष्य होने की याद दिलाता रहे, उसके सृजनशील मन में उदारता, संवेदनशीलता, सौंदर्य, परिवेश-पर्यावरण के प्रति दायित्व आदि गुण विकसित करता रहे।
यह ठीक है कि हमारी भारतीयता में संस्कृति के नाम पर धर्म और धर्मग्रंथों का महत्त्वपूर्ण स्थान है, लेकिन धर्मग्रंथ केवल आस्था-बद्ध साहित्य है, वह हमें अपनी आस्थाओं की सीमाओं में मर्यादित रहने का संस्कार देता है। पर मानवीय चेतना का फलक बहुत व्यापक है। इसलिए हमें अपने सांस्कृतिक पक्ष में जन, जमीन और राजनीति को ही नहीं रखना चाहिए। हमें अपने इतिहास से साक्षात्कार करना होगा, अपने भूगोल में सांस्कृतिक-सीमाओं की सही पहचान कर वहां के लोक-जीवन के प्रति संवेदित होना होगा, हमें अपना समाजशास्त्र अपनी भूमि के जन-जीवन से रचना होगा, अपनी भाषाओं को जीवित रखने के लिए उत्कृष्ट साहित्य रचना होगा। अपने और अन्य के विचारों की रक्षा और सम्मान करना होगा और एक देशज न्यायभूमि या मनुष्यता-युक्त जीवन शैली का निर्माण करना होगा। अगर भाषा, भूषा, भोजन, भवन और भजन संस्कृति के लोकपक्ष से जुड़े हैं और वे हमारी भौतिक जीवन-प्रणाली के तत्त्व हैं तो साहित्य में चिंतन, विचार, संवेदन, सौंदर्य, मानवीय-आस्था, समाज और सृष्टि के प्रति हर समय के साथ नए-नए स्पंदन की रचना करनी होगी।

