राजेंद्र प्रसाद भारत के प्रथम राष्ट्रपति थे। वे भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के प्रमुख नेताओं में से थे, जिन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में प्रमुख भूमिका निभाई। उन्होंने भारतीय संविधान के निर्माण में भी अपना योगदान दिया था। पूरे देश में अत्यन्त लोकप्रिय होने के कारण उन्हें राजेन्द्र बाबू या देशरत्न कहकर पुकारा जाता था।

प्रारंभिक जीवन
राजेंद्र प्रसाद का जन्म बिहार के सीवान जिले के जीरादेई गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम महादेव सहाय और माता का नाम कमलेश्वरी देवी था। उनके पिता संस्कृत और फारसी दोनों भाषाओं के विद्वान थे। राजेंद्र प्रसाद अपने भाई-बहनों में सबसे छोटे थे। पांच वर्ष की आयु में उन्होंने एक मौलवी से फारसी सीखी। फिर हिंदी और अंकगणित। प्रारंभिक शिक्षा के पूरा होते ही उनका दाखिला छपरा जिला स्कूल में करवा दिया गया। 1896 में उनका विवाह राजवंशी देवी से हो गया, उस समय वे मात्र बारह वर्ष के थे। उन्होंने पटना के टीके घोष अकादमी से भी पढ़ाई की। कलकत्ता विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा में उन्होंने प्रथम स्थान प्राप्त किया और उन्हें तीस रुपए मासिक छात्रवृत्ति मिलने लगी।

1902 में उन्होंने कलकत्ता प्रेसीडेंसी कॉलेज में प्रवेश लिया और 1905 में उन्होंने प्रथम श्रेणी में स्नातक की डिग्री हासिल की। बाद में उन्होंने कला विषय में पढ़ने का निर्णय किया और 1907 में कलकत्ता विश्वविद्यालय से प्रथम श्रेणी के साथ अर्थशास्त्र में एम.ए. की डिग्री ली। उनकी प्रतिभा ने गोपाल कृष्ण गोखले तथा बिहार-विभूति अनुग्रह नारायण सिन्हा जैसे विद्वानों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया।

शिक्षक के रूप में
राजेंद्र प्रसाद ने एक शिक्षक के रूप में विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों में सेवा दी। अर्थशास्त्र में एमए करने के बाद, वे बिहार के मुजफ्फरपुर के लंगट सिंह कॉलेज में अंग्रेजी के प्रोफेसर और प्राचार्य भी बने। बाद में कानून की पढ़ाई के लिए उन्होंने कॉलेज छोड़ दिया और रिपन कॉलेज, कलकत्ता (अब सुरेंद्रनाथ लॉ कॉलेज) में प्रवेश लिया। 1909 में, कोलकाता में अपनी कानून की पढ़ाई के दौरान उन्होंने कलकत्ता सिटी कॉलेज में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर के रूप में भी काम किया। 1915 में, उन्होंने मास्टर्स इन लॉ की परीक्षा दी, परीक्षा उत्तीर्ण की और स्वर्ण पदक जीता। 1937 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट की। 1916 में वे हाई कोर्ट में शामिल हुए।

स्वतंत्रता आंदोलन
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में उनका पदार्पण वकील के रूप में अपने करिअर की शुरुआत करते ही हो गया था। 1921 में उन्होंने कोलकाता विश्वविद्यालय के सीनेटर का पद छोड़ दिया था। महात्मा गांधी ने जब विदेशी संस्थाओं के बहिष्कार की अपील की थी तो उन्होंने अपने पुत्र को कोलकाता विश्वविद्यालय से हटा कर बिहार विद्यापीठ में दाखिल करवाया था। उन्होंने सर्चलाईट और देश जैसी पत्रिकाओं में इस विषय पर बहुत से लेख लिखे। 1914 में बिहार और बंगाल मे आई बाढ़ में उन्होंने काफी बढ-चढ कर सेवा-कार्य किया था। 1934 में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के मुंबई अधिवेशन में अध्यक्ष चुने गए। 1939 में भी उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष का पदभार संभाला था। देश की आजादी के बाद उन्होंने देश के पहले राष्ट्रपति का पदभार संभाला। बारह वर्षों तक राष्ट्रपति के रूप में कार्य करने के बाद उन्होंने 1962 में अपने अवकाश की घोषणा की।

भारत रत्न
राजनीति से अवकाश लेने के बाद उन्हें भारत सरकार द्वारा सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया।
निधन : अपने जीवन के आखिरी दिनों में पटना के निकट सदाकत आश्रम चले गए। वहीं 28 फरवरी, 1963 को उनका निधन हो गया।