तेजाब पीड़िता लक्ष्मी की कहानी पर आधारित फिल्म ‘छपाक’ सिनेमाघरों में आने के बाद एडवोकेट अनुजा कपूर का मानना है कि ‘छपाक’ से पहले भी कई सेमिनार, अंतरराष्ट्रीय बैठकें और मीडिया में मामला आता रहा है, लेकिन कुछ खास फर्क नहीं पड़ा। छपाक जैसी फिल्में ‘विक्टिमाइजेशन’ को ‘ग्लोरीफाई’ करती हैं। ये एक विफलता है। एडवोटकेट और सामाजिक कार्यकर्ता अनुजा ने 2018 में एक याचिका डाली, जिसमें उन्होंने मांग की कि दुकानों पर अवैध रूप से तेजाब बिक्री पर रोक लगनी चाहिए। वे कहती हैं कि तेजाब ‘हेट क्राइम’ है। यह पितृसत्तात्मक नजरिया है। अनुजा सवाल करती हैं कि प्रशासन द्वारा दुकानदारों के तेजाब बेचने पर कोई पहचान या लाइसेंस की पुष्टि नहीं की जाती। कोई आॅडिट नहीं होता। इस वजह से खुले तौर पर तेजाब बिक रहा है। केंद्र सरकार ने डिपार्टमेंट आॅफ पर्सनल एंड ट्रेनिंग (डीओपीटी) के तहत तय किया है कि तेजाब अटैक पीड़िता को सरकारी नौकरी दी जाए। मगर किसी को नौकरी नहीं मिली। सरकार के पास इसका कोई आंकड़ा नहीं है।
दिल्ली विश्वविद्यालय में राइट आफ परसन विथ डिसएबिलिटी एक्ट 2016 है, जिसमें दिल्ली विश्वविद्यालय में भी तेजाब से पीड़ित बच्चों के लिए सीट आरक्षित रहेंगी, लेकिन यहां पर भी कुछ नहीं हुआ। प्रशासन के लचर रवैए की ही शिकार हुर्इं असम की रुपमा बताती हैं कि 6 नवंबर, 2013 को मेरे ऊपर तेजाब फेंका गया। उस समय मैं अठारह साल की थी और कॉलेज में दाखिला लिया था। रुपमा पर हमला करने वाला और कोई नहीं, बल्कि होम ट्यूटर था, जिसने उसे दसवीं तक पढ़ाया था। रुपमा बताती हैं कि वो मुझे पसंद करता था और मुझसे शादी करना चाहता था। वह पहले से शादीशुदा था और उसका एक बच्चा भी था। फिर मेरे परिवार ने उसको हटा दिया था। उसने दो साल तक मेरा पीछा किया। और जब उसे पता चला कि कॉलेज में मेरा बॉयफ्रेंड है तो उससे यह सहन नहीं हुआ कि मैं उसे छोड़ कर किसी और से प्यार करती हूं। और एक दिन असम में रात की पूजा से पूरे परिवार के साथ घर वापस आ रही थी तब उसने मेरे दरवाजे के सामने मेरे चेहरे पर तेजाब फेंक दिया।
कुछ देर बाद स्थानीय सरकारी अस्पताल में पहुंची तो डॉक्टरों ने बोला कि हमें नहीं पता कि इसका क्या इलाज होगा। फिर सिविल अस्पताल में लेकर पहुंचे, लेकिन वहां भी कोई नहीं सुन रहा था। जितनी देर होती जा रही थी उतना मेरा चेहरा काला पड़ता जा रहा था। फिर मेरे घर वाले मुझे उसी रात गुवाहाटी मेडिकल कॉलेज अस्पताल लेकर आए थे। वहां 13 जनवरी तक मैं आइसीयू में थी। वहां से फिर मैं मामा के घर गई। अपने घर नहीं गई, क्योंकि घर वापस जाकर मुझे ही समाज के सभी सवालों के जवाब देने पड़ते। कोई उस आरोपी से सवाल नहीं करता, जिसने मेरे साथ यह सब किया। मेरी नाक से उस तेजाब की बदबू नहीं जा रही थी। मेरा चेहरा पूरा काला हो गया था। मैं बस बिस्तर पर पड़ी हुई थी। उसी हालत में पुलिस मेरा बयान लेने आई थी। उस हालत में मामा ने बताया था कि मेरे ऊपर नाइट्रिक तेजाब डाला गया था। क्योंकि मेरे मामा ने मेरे जिस स्वेटर पर तेजाब डाला गया था उसकी जांच कराई तो पता चला कि नाइट्रिक तेजाब है। तो मुझे पता चला कि नाइट्रिक तेजाब है।
जब पुलिस आई तो मैंने बताया कि नाइट्रिक तेजाब डाला गया है। तो पुलिस बोलती है कि आपको ये पक्का मालूम है कि ये तेजाब है। ये गर्म पानी भी तो हो सकता है। मैं खुद परेशान थी। ऊपर से पुलिस के सवाल और परेशान कर रहे थे। अभी तक मेरा मामला अदालत में ही है। जिसने हमला किया था उसको बस तीन महीने की सजा हुई। उसे राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है। वह बाहर आ गया। और बाहर आने के बाद 2017 में उसने फिर से दूसरे जिले में जाकर पढ़ाना शुरू किया और वहां पर उसने फिर से दूसरी शादी की। वहां भी उसने अपने साले की हत्या की। केस की तारीख पर वह आता नहीं है।
रुपमा के साथ इतना सब कुछ होने के बाद भी उन्होंने जीवन जीने की चाह नहीं छोड़ी। और 2017 में स्नातक किया। फिर शॉर्टहैंड में डिप्लोमा। कंप्यूटर कोर्स, अभी ग्राफिटी डिजाइनिंग का कोर्स कर रही हैं। रुपमा बताती हैं कि हम लड़कियां तो पहले ही सताई होती हैं। ऊपर से सरकारी तंत्र और परेशान करता है। मुआवजा लेने के लिए कई एड़ियां घिसनी पड़ती हैं। वे कहती हैं कि सरकारी वकील भी कहता है कि इंसाफ मिलने में दस साल लग जाते हैं। आप इतना जल्दी मत करो। मतलब, न तो पुलिस हमारी सुनती है और न ही वकील।
रुपमा कहती हैं कि ऐसा नहीं है कि मैं असम में पहली लड़की थी जिस पर ये तेजाब डाला गया हो। मुझसे पहले भी कई लड़कियों पर तेजाब डाला गया लेकिन किसी की खबर अखबार में नहीं आई। हमारा समाज ऐसा है कि जिसके साथ गलत हुआ है उसी को दबा कर रखता है। तेजाब के लिए जो कानून है वह सिर्फ कागज तक ही है, जमीनी स्तर पर कुछ नहीं दिखता। आरोपियों को बहुत आराम से रिहाई मिल जाती है। लोगों की मानसिकता है कि लड़कियों का चेहरा ही उसकी पहचान है। अगर चेहरा ही खराब कर देंगे, तो लड़की कहां जाएगी। उसका आत्मविश्वास टूट जाएगा। तो ऐसी मानसिकता जब तक लोगों के मन में रहेगी तब तक कुछ नहीं बदल सकता। बच्चों को बचपन से यह सिखाना चाहिए की चेहरे की सुंदरता ही सुंदरता नहीं है। मन की सुंदरता होनी चाहिए।

