आरके लक्ष्मण देश के जाने-माने कार्टूनिस्ट और चित्रकार थे। मैसूर में जन्मे आरके लक्ष्मण का पूरा नाम रासीपुरम कृष्णस्वामी लक्ष्मण था। उनकी रुचि बचपन से ही चित्रकारी में थी। वे घर की दीवारों, दरवाजों और फर्श पर आड़े-टेढे चित्र बनाया करते थे। यही नहीं वे स्कूल में भी शिक्षकों के व्यंग्य चित्र बनाया करते थे। उन्होंने दसवीं के बाद कला क्षेत्र में जाने का निश्चय कर जेजे स्कूल ऑफ आर्ट, बांबे में आवेदन किया। लेकिन वहां के डीन ने उनकी चित्रकारी की खामियां गिनाते हुए उनके आवेदन को खारिज कर दिया। इसके बाद लक्ष्मण ने मैसूर विश्वविद्यालय में दाखिला लिया और वहीं से कला विषय में स्नातक की उपाधि प्राप्त की। इस बीच उन्होंने अपनी स्वतंत्र कलात्मक गतिविधियों को जारी रखा और पौराणिक चरित्र नारद पर आधारित कार्टून बनाते रहे।
शुरुआती दिन
लक्ष्मण ने 1940 के दशक में एक कार्टूनिस्ट के रूप में काम करना शुरू किया। उन्होंने अपने करिअर की शुरुआत अंशकालिक कार्टूनिस्ट के तौर पर की। शुरुआती दिनों में वे स्थानीय अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं में काम किया करते थे। कॉलेज के दिनों में उन्होंने अपने बड़े भाई आरके नारायण की कहानियों का इलस्ट्रेशन बनाया था। लक्ष्मण ने कन्नड़ हास्य पत्रिका ‘कोरवंजी’ में भी कार्टून बनाने का कार्य किया। इस पत्रिका की शुरुआत 1942 में एम शिवरम ने की थी। शिवरम प्रख्यात कन्नड हास्य-व्यंग्य लेखक थे। उन्होंने यह मासिक पत्रिका विनोदी, व्यंग्य लेख और कार्टून के लिए शुरू की। उन्होंने लक्ष्मण को भी ऐसी चित्रकारी के लिए प्रोत्साहित किया।
प्रसिद्ध रचना
उनकी पहली पूर्णकालिक नौकरी मुंबई में द फ्री प्रेस जर्नल के लिए एक राजनीतिक कार्टूनिस्ट के रूप में थी। 1947 में उन्होंने द टाइम्स आॅफ इंडिया के साथ काम करना शुरू किया, जहां उन्होंने ‘द कॉमन मैन’ नामक चरित्र की रचना की। उन्होंने इस अखबार में लगभग पचास वर्षों तक काम किया। ‘द कॉमन मैन’ चरित्र से प्रसिद्धि मिलने से पूर्व वे द स्ट्रैंड, पंच, बायस्टैंडर, वाइड वर्ल्ड और टिट-बिट्स जैसी पत्रिकाओं में चित्रकारी कर चुके थे।
अन्य कृतियां
‘द कॉमन मैन’ के अलावा 1954 में लक्ष्मण ने एशियन पेंट्स लिमिटेड समूह के लिए ‘गट्टू’ नामक एक लोकप्रिय मस्केट भी बनाया। उन्होंने कुछ उपन्यास भी लिखे, जिनमें से एक था ‘द होटल रिविरा’। इतना ही नहीं, उनके कार्टून को सिनेमा जगत में भी स्थान मिला। हिंदी फिल्म ‘मिस्टर एंड मिसेज 55’ और तमिल फिल्म ‘कामराज’ में उनके कार्टूनों को दिखाया गया। उनकी रचनाओं में ‘मालगुडी डेज’ के टेलीविजन रूपांतरण के लिए तैयार किए गए रेखाचित्र भी शामिल हैं।
सम्मान और पुरस्कार
आरके लक्ष्मण को 2004 में मैसूर विश्वविद्यालय से मानद डॉक्टरेट की उपाधि मिली थी। उन्हें पत्रकारिता जगत के कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया था। उन्हें बीडी गोयन और दुर्गा रतन स्वर्ण पदक पुरस्कार प्राप्त था। भारत सरकार ने उन्हें साल 1973 में पद्म भूषण, 2005 में पद्म विभूषण से नवाजा था। उन्हें रमन मैग्सेस पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था। सीएनएन आईबीएन टीवी 18 ने उन्हें 2008 में पत्रकारिता के लिए लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार भी दिया।
2003 के सितंबर में उनके बाएं भाग को लकवा मार गया। हालांकि उन्होंने आंशिक रूप से इसके प्रभावों से मुक्ति पा ली थी। 2010 के बाद से आरके लक्ष्मण की तबीयत खराब रहने लगी।
निधन : पुणे में चौरानवे साल की उम्र में उनका निधन हो गया।
