चंद्र त्रिखा
पाकिस्तान इस समय पूरी तरह दिशाहीन है। कश्मीर पर भारतीय फैसले उसके ख्वाबों में भी नहीं थे। विश्वपटल पर फिलहाल दुख बांटने के लिए कोई देश अपना कंधा भी देने को तैयार नहीं। बहरहाल, हमें ऐसी बातों से ज्यादा खुश भी नहीं होना चाहिए। पड़ोसी की ऐसी बेचारगी से हमें तकलीफ होनी चाहिए। ज्यादा तकलीफदेह यह है कि अब पाकिस्तान के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने ‘से नो टू इंडिया’ यानी ‘भारत को ना कहें’ के नाम से एक नया अभियान चलाया है, जो संस्कृति, सभ्यता और साझी विरासत के किसी भी मानदंड पर उचित नहीं लगता। पाक अपने राजनीतिक, कूटनीतिक और सैनिक फैसले अपने स्तर पर ले, यह उसका हक है। मगर सांस्कृतिक और साभ्यतिक स्तर पर ‘भारत को ना कहने’ का कोई हक आपके पास नहीं है। कारण स्पष्ट है। संस्कृति में साझेदारी की जड़ें इतनी गहरी हैं कि उनसे छेड़छाड़ मुमकिन नहीं है। बाबा फरीद, गुरु नानक देव, मियां मीर, वारिस शाह, बुल्लेशाह और बाद में फैज, मंटो, कासमी, कतील शिफाई, हबीब जालिब, अहमद फराज और उसके बाद आबिदा, मेहदी हसन, गुलाम अली किस-किस की खुशबू को कैद कर पाएंगे वहां के हुक्मरान!
इमरान खान और उनके सभी साथियों और फौजी जुंडली को शायद इस बात का एहसास भी नहीं है कि सांस्कृतिक विरासत न तो विदेश नीति या कूटनीति का हिस्सा है और न ही चुनावी राजनीति से उसका कोई सरोकार होता है। यह खिड़की बंद नहीं हो सकती। कल क्या करवट लेता है, मालूम नहीं। लेकिन बाबा फरीद का दर्शन, उनका कलाम, उनका काव्य किसी भी सीमित भौगोलिक इकाई की बौद्धिक संपदा नहीं बन सकता। बाबा की दरगाह पर आतंकी हमलों के बावजूद कहीं भी उस फकीर की वाणी पर कोई खरोंच नहीं आई।
अगर गुरुनानक वहां अब भी एक बड़े तबके के लिए ‘नानक शाह फकीर’ हैं या अब भी ननकाना साहब या करतारपुर में नित्य ‘वॉक’ निकालने की रस्म बदस्तूर जारी है, तो सिर्फ अंतरराष्ट्रीय सिख समुदाय की तुष्टि के लिए नहीं है। वहां अब भी हजारों की संख्या में मुसलिम जनसमुदाय की भी श्रद्धा है। मियां मीर की दरगाह पर भी आतंकी हमले हुए हैं। मगर मियां के किस्से, किंवदंतियां और स्वर्ण मंदिर की नींव का पत्थर रखने वाली बातें आज भी याद की जाती हैं, दोहराई जाती हैं। यह वह शख्सियत थी, जिसकी एक निगाहे-करम के लिए उस समय के दिल्ली के शहंशाह भी तरसते थे। जामा मस्जिद मजहब का केंद्र हो सकती है, मगर मियां मीर की दरगाह सभी इमामबाड़ों से भी बढ़ कर मुसलिम समाज के एक बड़े तबके के लिए अकीदत का केंद्र है।
वारिस शाह पर जितने शोध प्रबंध भारतीय विश्वविद्यालयों में लिखे गए, उतने शायद वर्तमान पाकिस्तान के विश्वविद्यालयों में भी नहीं लिखे गए। बुल्लेशाह अब भी भारतीय गायकों, शोधार्थियों और बुद्धिजीवी समाज में प्रासंगिक भी हैं और पसंदीदा भी। फैज की पूरी जिंदगी और उनका पूरा कलाम पूरे उपमहाद्वीप में अब भी पढ़ा, सुना और जिया जाता है। उनकी एक तिहाई उम्र अपने मुल्क की जेलों में कटी और एक तिहाई भारत में। मंटो, हबीब जालिब, उस्ताग चिरागदीन दामन, अहमद फराज, कतील शिफाई अब भी लाखों भारतीयों के लिए महत्त्वपूर्ण हैं।
वर्तमान पाक शासकों को इस बात का भी शायद एहसास नहीं कि अजमेर के गरीब नवाज ख्वाजा और दिल्ली के हजरत निजामुद्दीन से लाखों पाकिस्तानियों के दिलों की धडकनें जुड़ी हैं। उन्हें शायद इस बात का भी इल्म नहीं है कि भारत का एक बड़ा बुद्धिजीवी वर्ग जिसमें ‘सिविल सोसायटी’ के अलावा अनेक ऐसी संस्थाएं हैं, जो इस पड़ोसी देश के लिए दुआ करती रही हैं कि यह पड़ोसी अपनी भीतरी विसंगतियों और अंतर्विरोधों से बाहर आए। भारत के लाखों लोग कटासराज, शादानी दरबार हिंगलाज मंदिर, बाबा लालू-जसराय मंदिर-दीपालपुर आदि स्थलों में अपनी आस्था रखते हंै।
बहावलपुर और मुल्तान, डेरागाजी खान आदि पाकिस्तान की ‘सरायकी’ भाषा के मुख्य केंद्र हैं। वही सरायकी भारत में लगभग डेढ़ करोड़ लोगों की मातृभाषा है। भारत में अब भी सरायकी भाषा में साहित्य रचा, पढ़ा और सुना जाता है। जब सीमा पार जाने के रास्ते बंद हुए, तो यहां भारत में ‘सरायकी’ का भाषागत स्वरूप निखरना शुरू हो गया। डॉ. राणा गन्नौरी सरीखे भारतीय अदीबों ने न केवल जम कर सरायकी में लिखा, बल्कि ‘हिंदी-मुल्तानी विश्वकोष’ का भी संकलन और प्रकाशन कर डाला, जो कि अब पाकिस्तान में भी मकबूल है और विश्व के कई अन्य देशों में भी प्रचलित है। जहां-जहां मुल्तानी, बहावलपुरी भाषा और बोली से जुड़े लोग हैं, वहां-वहां यही शब्दकोष पहुंचा है।
संगीत की दुनिया में अब भी राग भैरवी, राग जयजयवंती, राग मल्हार, राग यमन कल्याण आदि समान रूप से पाकिस्तानी संगीत की जान हैं। सरगम के सातों स्वर और सुर एक जैसे हैं। यही सिलसिला कला और स्थापत्य के क्षेत्र में है। अब इन सांस्कृतिक रिश्तों पर न तो भारत ‘नो टु पाकिस्तान’ कह सकता है, न ही पाकिस्तान ‘नो टु इंडिया’ कह सकता है। आप किन्हीं अधिसूचनाओं के जरिए ऐसे ऐलान करेंगे, तो भी उन पर अमल मुमकिन नहीं है।
थोड़ा ध्यान मुअनजोदड़ो, तक्षशिला और हड़प्पा पर ही दे लेते। वर्ष 1981 में तक्षशिला को यूनेस्को ने विश्व धरोहर का दर्जा दिया था। अब भी वहां हर वर्ष दस लाख पर्यटक आते हैं। इसके खंडहरों की ‘डेटिंग’ बताती है कि इसकी स्थापना ईसा के लगभग एक हजार वर्ष पूर्व हुई थी। यहां चाणक्य के नीति उपदेशों की मौर्य कालीन गूंज अब भी जेहन से टकराती है, बशर्ते कि जेहन को खुला रखें। एक समय में यहां बौद्धों का भी प्रभामंडल दमकता था। कभी यह गांधार नरेशों का भी प्रमुख स्थान था। थोड़ा यह भी बता दूं कि यह स्थल जिला रावलपिंडी में है और इस्लामाबाद से इसकी दूरी लगभग बत्तीस किलोमीटर ही है। अब इन रिश्तों को आप कौन-से पुराने संदूकों में कैद करेंगे?

