अंग्रेजी हुकूमत के विरोध में शुरू हुए देश के पहले जन विद्रोह के गवाह बने स्थल और ऐतिहासिक इमारतें तो लगभग हर उस शहर में मिल जाएंगी, जहां आजादी के दीवानों ने अंग्रेजों से मोर्चा लिया, लेकिन उन सभी जगहों पर पहुंचना मुश्किल है। कुछ जगहों को पर्यटन विभाग ने सहेजा और कुछ को सुधारने का काम किया। बावजूद इसके कई ऐसे निशान सहेजने से छूट गए, जो आजादी की पहली लड़ाई की याद दिलाते हैं। चाहे वह किसी क्रांतिकारी की समाधि हो या फिर वह स्थल जहां क्रांतिकारी इकट्ठा होकर रणनीति बनाया करते थे। इसके अलावा उन जगहों को संजोना जरूरी है जहां किसानों और मजदूरों ने अपने-अपने इलाके और गांवों में विद्रोह की ज्वाला जलाई थी। इस गदर के गवाह रहे देश भर के स्थलों को एक गदर पर्यटन के नक्शे पर लाया जा सकता है। पेश है गदर के सफर पर गजेंद्र सिंह की रिपोर्ट।

मेरठ

क्रांतिकारी और अंग्रेजी शासन में सिपाही रहे मंगल पांडे को बगावत के जुर्म में 8 अप्रैल, 1857 को पश्चिम बंगाल की बैरकपुर छावनी में फांसी दी गई। इसके बाद देश भर में लोगों के अंदर गुस्सा उबलता रहा। उसके ठीक एक माह बाद 10 मई, 1857 को कारतूस को लेकर मेरठ में बगावत की शुरुआत हुई। मुल्तानीमल मोदी कॉलेज मोदीनगर में इतिहास विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. केके शर्मा बताते हैं कि अंग्रेजी शासन की तीसरी अश्वारोही सेना की टुकड़ी ने, जिसमें भारतीय शामिल थे, कारतूस को लेकर आपत्ति जताई। नब्बे सैनिक इस टुकड़ी में शामिल थे, जिसमें से पचासी ने अंग्रेजों की बात मानने से इनकार कर दिया। इनका कोर्ट मार्शल हुआ और मेरठ की उस समय की जेल ‘सूरजकुंड’ में नौ मई को बंद कर दिया गया। यह बात जब आग की तरह फैली तो विरोध शुरू हो गया। प्रोफेसर शर्मा बताते हैं कि इनको छुड़ाने के लिए कई भारतीय जेल तक पहुंच गए। वहां लड़ाई हुई और जेल को तोड़ दिया गया। मोटी-मोटी लोहे की बेड़ियों में जकड़े पचासी सैनिकों को लोगों ने आजाद कराया, जो असल मायने में आजादी थी। यह सूरजकुंड जेल 1857 की उस लड़ाई की शुरुआत की गवाह है, जो अब मेरठ विश्वविद्यालय के अधीन है और विक्टोरिया पार्क के नाम से जाना जाता है। यहां स्मारक बनाया गया है, लेकिन पर्यटन विभाग ने इसे नहीं संजोया है। शर्मा बताते हैं कि यह स्मारक केवल 1857 की क्रांति से नहीं, बल्कि स्वाधीनता आंदोलन के दौरान 1947 में कांग्रेस के अंतिम अधिवेशन का भी गवाह बना। जहां आजाद भारत का एजंडा पास किया गया। मौजूदा समय में यह एक बड़ा मैदान है, जहां खेलकूद होता है। मगर इसमें याद के तौर पर सिर्फ एक स्मारक दिखाई पड़ता है। दो पत्थर लगे हैं, जिन पर जेल संग्राम में मारे गए पचासी सैनिकों के नाम लिखे हैं। प्रोफेसर शर्मा बताते हैं कि उन पचासी लोगों में आधे हिंदू और आधे मुसलिम क्रांतिकारी थे।

इसी तरह मेरठ कैंट में स्थित सेंट जॉन चर्च उत्तर भारतीयों का पहला चर्च माना जाता है, जो 1819 में बना था। यहां रविवार को प्रार्थना सभा होती थी और उसी दिन क्रांतिकारियों ने हमला किया था। कई अंग्रेज मारे गए थे। प्रोफेसर शर्मा बताते हैं कि पहले चर्च में हथियार ले जाने का कोई आदेश नहीं था, लेकिन इस कांड के बाद चर्च में अंग्रेज अपने साथ बंदूक ले जाने लगे और वहां मेज में बंदूक रखने के लिए एक विशेष जगह भी बनाई गई गई। यह आज भी उस चर्च में मौजूद है।

बागपत
मेरठ से बागपत में भी आजादी की चिंगारी पहुंची और यहां के किसानों ने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह कर दिया। उस समय किसानों के नेता शाहमल ने इस लड़ाई का नेतृत्व किया। प्रोफेसर केके शर्मा बताते हैं कि अंग्रेजों के दस्तावेजों से इस गांव का पता चलता है। बागपत के बसोद गांव में मुसलिम बहुल आबादी थी। यहां अंग्रेजों ने खाकी रिसाला फौज बनाई थी। गांव और अंग्रेजों के बीच हुई लड़ाई में एक सौ अस्सी गांव वाले मारे गए। इस गांव के इतिहास को समेटने में नाकाम रहे पर्यटन विभाग को 2008 में इसकी याद दिलाई गई। प्रोफेसर शर्मा बताते हैं कि लोगों के सहयोग से इस गांव को क्रांति ग्राम का नाम दिया गया और बड़ी लड़ाई के बाद शाहमल का पाठ एनसीईआरटी की किताब में शामिल कराया गया। उस समय के तत्कालीन पर्यटन मंत्री ने दिलचस्पी दिखाते हुए गांव में द्वार भी बनवाया। शर्मा बताते हैं कि शाहमल और अंग्रेजी सेना के बीच लड़ाई बड़का गांव में हुई। यहां शाहमल शहीद हुए। उस स्थल को खोज कर लोगों की मदद से यहां पत्थर लगाया गया।

दिल्ली
12 मई, 1857 को दिल्ली में शुरू हुई लड़ाई 20 सितंबर को हुमायूं के किले में बहादुर शाह जफर के गिरफ्तार होने तक चली। इस दौरान दिल्ली में जगह-जगह सैकड़ों लोग मारे गए और खून ही खून दिखा। दिल्ली में वैसे तो लाल किला से लेकर जंतर मंतर और अन्य स्थल पर्यटन विभाग ने काफी संभाल कर रखे हैं लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जिनको संवारने की बात कही गई है। दिल्ली में ही कश्मीरी गेट और हिंदू राव अस्पताल 1857 की लड़ाई के प्रमुख स्थल हैं। कश्मीरी गेट की हालत सही नहीं है और हिंदू राव अस्पताल को उत्तरी नगर निगम प्रशासन ने संभाल रहा है जो काफी बड़ा है। यहां कई ऐतिहासिक चीजें देखने को मिलती हैं लेकिन इनका रखरखाव सही नहीं है। दिल्ली विश्वविद्यालय में रग्बी स्टेडियम के पास ही खूनी खान झील नाम से एक स्थल है। यहां कई अंग्रेज सैनिकों के अलावा भारतीय महिलाएं और बच्चे मारे गए थे। इसे खूनी झील के नाम से जानते हैं, लेकिन दिल्ली के बाहर से आने वालों को इसके बारे में कम जानकारी है। दिल्ली सरकार ने काफी पहले इसे संवारने का काम शुरू किया था, लेकिन फिर भी चर्चित नहीं है। इसी तरह तीन राज्याभिषेक के गवाह रहे कॉरनेशन पार्क, म्यूटिनी मेमोरियल, बारादरी, भूली भटियारिन का महल और शालीमार बाग कुछ ऐसी विरासतें हैं, जिनके बारे में लोगों को कम पता है। लेकिन ये भी किसी न किसी रूप में 1857 की लड़ाई से जुड़े हुए हैं।

लखनऊ
ब्रिटिश राज में जो दुर्दांत सेनानायक माने जाते हैं उनमें जनरल नील, मेजर हडसन, हेनरी लारन्स और कोलिन कैंपवेल में से तीन लखनऊ में ही मार दिए गए थे। इनको मारा था लखनऊ की जनता ने। लखनऊ में स्वतंत्रता संग्राम की पहली लड़ाई के साक्षी रेजीडेंसी (जिसे बेली गारद भी कहते हैं) से सभी वाकिफ हैं। वहां क्रांतिकारियों का पूरा कब्जा 30 जून, 1857 से 25 सितंबर, 1857 तक लगभग तीन महीने (86 दिनों) तक रहा। इसमें यूरोपीय परिवार एक पिंजरे की तरह बंद हो गए थे। ‘आपका लखनऊ’ किताब लिखने वाले इतिहासकार योगेश प्रवीण बताते हैं कि कोलिन कैंपिबेल की मददगार सेना ने कानपुर से लखनऊ आकर उन्हें कारागार से मुक्त कराया था। इस बीच बेली गारद में 20 जुलाई, 10 अगस्त, 8 सितंबर और 20 सितंबर 1857 को घमासान लड़ाइयां लड़ी गर्इं। रेजीडेंसी की आखिरी जंग 17 नवंबर को लड़ी गई। योगेश प्रवीण बताते हैं कि रेजीडेंसी को सरकार देखती है, लेकिन जितना उसका हक है उतना रखरखाव नहीं किया जाता। कामचलाऊ काम हो रहा है, जबकि यहां विदेशी पर्यटक आते हैं। इतिहासकार रवि भट्ट बताते हैं कि यह सभी को पता है कि रेजीडेंसी अंग्रेजों की अपनी टाउनशिप थी। वहां पड़े गोला बारूद के निशान ही उसे जीवंत बनाते हैं। इसके अलावा लखनऊ में ऐसी कई जगहें हैं जहां 1857 के सबूत मिलते हैं और यादें जुड़ी हुई हैं। रवि भट्ट बताते हैं कि भारतीय स्टेट बैंक की मुख्य शाखा, जो महात्मा गांधी मार्ग हजरतगंज में स्थित है, उसे तारे वाली कोठी के नाम से जाना जाता था। यहां फैजाबाद के मौलवी और तमाम लोग मोर्चे से जुड़ी रणनीति बनाते थे। हालांकि इस जगह को बैंक प्रशासन द्वारा रखरखाव किया जाता है, यहां इस याद में पत्थर भी लगा है। लखनऊ का लामाटिनियर गर्ल्स कॉलेज अंग्रेजों का अधिकारी मेस हुआ करता था। आज यह एक कॉलेज प्रशासन के अंतर्गत है, यहां फिल्मों की शूटिंग होती रहती है।

इसी तरह हजरतगंज का जनपथ मार्केट बेगमों की कोठी थी। 1977 में विलियम हडसन द्वारा गिरा कर इसे बाजार बनाया गया। यह वही हडसन था, जिसने बहादुर शाह जफर के लड़कों को मारा था। इतिहासकार योगेश प्रवीण बताते हैं कि लखनऊ के तमाम इलाके जैसे कोठी आलमबाग, चक्कर वाली कोठी, मारकीन कोठी, खुर्शीद मंजिल, मोती महल, दिलकुशा बाग, सिकंदर बाग और अन्य उस दौर में जैसे पानीपत बन गए थे। इन जगहों पर कब्र बनाई गई है। यह आज भी दर्शनीय स्थल है। योगेश बताते हैं कि 30 जून, 1857 में लखनऊ के चिनहट में इस्माइलगंज मस्जिद से युद्ध शुरू हुआ था, जिसमें अंग्रेजों को क्रांतिकारियों ने मात दी थी। हालांकि इसका कोई निशान अब इस्मालगंज में नहीं दिखता सिवाय कब्र के। बेगम हजरत महल के प्रमुख सेनापति राज जयलाल सिंह, नसरत जंग को कैप्टन आर. साहब की हत्या के जुर्म में फांसी दे दी गई थी। उनका शव सुपुर्द-ए-आतिश न करके अंग्रेजों ने वहीं जमीन में दबा दिया था, आज वहां स्मारक बनाया गया है और पार्क है।

कानपुर में जनरल नील ने निर्दोष जनता का कत्लेआम किया था। उसे 25 सितंबर 1857 में लखनऊ की जनता ने शेर दरवाजे के करीब मार गिराया। अंग्रेजों ने इसे नील गेट का नाम दिया, जबकि लखनऊ वाले इसे शेर दरवाजा कहते हैं। नील की कब्र रेजीडेंसी में है। मेजर हडसन को लखनऊ वालों ने 11 मार्च, 1858 को बेगम कोठी में जख्मी कर दिया और कोठी हयात बख्श, जो आज का राजभवन है, में उसे रखा गया था और वहीं उसने दम तोड़ा था। उसकी कब्र भी बेरी गारद में है। लखनऊ में स्वतंत्रता सेनानियों के नाम से ही मौलवीगंज और दुर्गविजयगंज सरीखे मोहल्ले हैं।

बरेली
बरेली और इसके आसपास का क्षेत्र क्रांति की इस पहली लड़ाई में बराबर का हिस्सेदार रहा। यहां खान बहादुर खान ने अंग्रेजों की नाक में दम कर रखा था। एक बारगी तो उन्होंने बरेली में सत्ता भी संभाल ली थी, लेकिन कुछ समय बाद ही गिरफ्तार कर लिए गए। खान साहब को बरेली कैंट में रखा गया था। कैंट से पैदल कोतवाली लाया गया और यहां फांसी दे दी गई। जिस जगह खान साहब को फांसी दी गई, वहां आज सबूत के नाम पर कुछ नहीं है। एक बाजार है और वहां बीच में एक पार्क बना दिया गया है, जिसमें बाबा साहेब आंबेडकर की प्रतिमा लगी है और लोग इसे आंबेडकर के नाम से ही जानते हैं। बेहद छोटे पार्क में कभी-कभी कोई सभा या सांस्कृतिक आयोजन हो जाता है। बरेली के इतिहास पर किताब लिखने वाले सुधीर विद्यार्थी बताते हैं कि यहां कमिश्नरी में बरगद के पेड़ पर ढाई सौ क्रांतिकारियों को एक साथ फांसी की सजा दी गई थी। इसके बावजूद न तो इसे विरासत घोषित किया गया और न ही संरक्षित किया गया। अब वह पेड़ भी नहीं रहा इसलिए नया पेड़ लगाया गया है। यहां एक कीर्ति स्तंभ जरूर क्रांति के दीवानों की याद दिलाता है। जिस जिला जेल में खान बहादुर खान की कब्र है उसे सुधीर विद्यार्थी और इनसे जुड़े लोगों के प्रयास से जेल के बाहर किया गया, ताकि लोग देख सकें। मगर सुधीर बताते हैं कि उस कब्र को लोगों ने मजार की शक्ल दे दी है, जो गलत है। खान बहादुर खान मेमोरियल सोसाइटी ने इसे हरा रंग कर दिया था, जिससे लोगों के जेहन में कब्र खान बहादुर खान की न होकर किसी आम की कब्र हो गई।

शाहजहांपुर
बरेली से जुड़े जिले शाहजहांपुर में भी 1857 के कई साक्ष्य मौजूद हैं। सुधीर विद्यार्थी बताते हैं कि यहां सीतापुर अस्पताल के पास जली कोठी थी, जिसमें नाना साहेब आकर ठहरे थे। इसकी सूचना हामिद हुसैन और शाहिद कासिम हुसैन ने अंग्रेजों को दी। नाना साहेब ने इस पर आपत्ति जताई और पूरी कोठी को आग लगा दी थी। बताया जाता है कि ये लोग काफी रईस थे और दोनों की पीढ़ी आज भी यहां रहती है। इस कोठी को संरक्षित नहीं किया गया। यह एक निजी संपत्ति है। यहां स्कूल और बैंक खोला गया है। इसी शहर में गांधी फैजान कॉलेज के सामने सेंट मेरी चर्च में क्रांतिकारियों ने 31 मई, 1857 को कई बड़े ब्रिटिश अधिकारियों को मारा था। चर्च में अब भी पत्थर लगे हैं और कब्र है अंग्रेजों की। श्याम बेनेगल की फिल्म ‘जुनून’, जो शशि कपूर द्वारा अभिनीत थी, में इस ऐतिहासिकता का जिक्र है, जो रस्किन बांड के बाद को हिंदी में अनूदित उपन्यास परवाज पर आधारित थी।

फतेहपुर
फतेहपुर में 28 अप्रैल, 1858 को ब्रिटिश सेना द्वारा बावन स्वतंत्रता सेनानियों को एक इमली के पेड़ पर फांसी दे दी गई थी। यह इमली का पेड़ अब भी मौजूद है। यह जगह बिंदकी उपखंड में खजुहा कस्बे के निकट है। रसूलपुर गांव के निवासी जोधा सिंह अटैया को उनके इक्यावन क्रांतिकारियों के साथ फांसी पर लटका दिया गया था। 1857 की क्रांति की याद संजोए इस स्थल को केवल स्थानीय लोगों की कोशिश और कुछ जनप्रतिनिधियों के सहयोग से यहां यादों से जुड़े प्रतीक नजर आ जाते हैं। कुछ राशि भी खर्च की गई है, लेकिन वह नाकाफी है। इतिहासकारों के मुताबिक 4 फरवरी, 1858 को जोधा सिंह अटैया पर ब्रिगेडियर कार्थयु ने विफल आक्रमण किया। साहसी जोधा सिंह अटैया को सरकारी कार्यालय लूटने और जलाए जाने के कारण अंग्रेजों ने डकैत घोषित कर दिया था। जोधा सिंह ने 27 अक्तूबर, 1857 को महमूदपुर गांव में एक दरोगा और एक अंग्रेज सिपाही को मार डाला था। जोधा सिंह को 28 अप्रैल, 1858 को अपने साथियों के साथ लौटने की सूचना एक मुखबिर द्वारा कर्नल को मिली थी, जिसके आधार पर उन्हें पकड़ कर बंदी बना लिया और सभी को उस इमली के पेड़ पर फांसी दे दी थी। अंग्रेजों की दहशत इतनी थी कि इनके शव तक नहीं उतारे गए थे। चार जून की रात रामपुर निवासी ठाकुर महराज सिंह अपने सशस्त्र साथियों के साथ वहां आए और उन्होंने सभी को उतार कर शिवराजपुर गंगा घाट में अंतिम संस्कार किया।