महानगरों के रिहाइशी इलाकों में बड़े पैमाने पर अवैध कारखाने चलाए जाते हैं। खासकर दिल्ली में यह समस्या दिन पर दिन जटिल होती जा रही है। कई बार अदालतों के निर्देश पर रिहाइशी इलाकों में अवैध रूप से चलाए जा रहे कारखानों को बंद कराने की मुहिम चलाई गई, पर अब भी पचास हजार से ऊपर ऐसे कारखाने मौजूद हैं। इन कारखानों में नियम-कायदों का ध्यान नहीं रखा जाता, जिसकी वजह से आग लगने जैसी घटनाओं में बड़ी संख्या में लोग मारे जाते या फिर घायल हो जाते हैं। दिल्ली के अनाजमंडी इलाके की घटना इसका ताजा उदाहरण है। इस पर पेश है अमलेश राजू और निर्भय कुमार पांडेय की रिपोर्ट।

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में एक बार फिर आग की लपटों ने रानी झांसी रोड स्थित अनाज मंडी के कारखाने में तैंतालीस मजदूरों की जान ले ली। एक बार फिर शासन-प्रशासन की नीतियों और अभी तक के मामलों में की गई प्रशासनिक कार्रवाई पर सवाल उठे हैं। साथ ही सिविक एजंसियां, दिल्ली सरकार, दिल्ली पुलिस और दिल्ली दमकल के अलावा उन सभी संबंधित विभागों की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न लगे हैं, जो कारखानों के संचालन के लिए लाइसेंस और अनापत्ति प्रमाणपत्र देती हैं।

अनाज मंडी की घटना से साफ हो गया है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की भी जम कर धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। सरकार और जांच एजंसियां इन हादसों से कोई सबक नहीं लेतीं और न ही कोई ठोस कार्रवाई करती हैं, जिससे दोषियों के बीच खौफ पैदा हो सके। उपहार सिनेमा हादसे में उनसठ लोगों की मौत के बाद तत्कालीन आइपीएस अधिकारी आमोद कंठ को सालों अदालत और सीबीआइ दफ्तर के चक्कर लगाने पड़े थे। रानी झांसी रोड अनाजमंडी हादसे ने दोबारा उस जख्म को हरा और उन जांच एजंसियों को भी खुली आंखों से फैसले करने को बाध्य कर दिया है।

इस तरह की घटनाओं में हर बार रिहायशी इलाकों में अवैध कारखाने, रेस्तरां, होटल, सिनेमा घर और बिना नक्शा पास कराए बहुमंजिली इमारतों में आग से सुरक्षा के इंतजाम के अभाव की बातें सामने आती हैं। दमकल से सुरक्षा यंत्र लगाने की अनुमति और अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) लेने-देने पर कीचड़ उछलना शुरू हो जाता है। दिल्ली सरकार, नगर निगम और संबंधित अधिकारियों पर दोष मढ़ा जाता है, पर आग ठंडी पड़ते ही मुद्दा और जांच भी ठंडे पड़ जाते हैं।

इसी साल बारह फरवरी को करोलबाग के होटल अर्पित में आग ने सत्रह लोगों की जान ले ली। सुबह एक छोटी-सी चिंगारी ने भयानक आग का रूप ले लिया और होटल के कमरों में सोए लोगों की सुबह तीन बजे नींद खुली तो खुद को आग की चपेट में घिरा पाया। किसी की छत से कूदने से मौत हो गई, तो किसी की दम घुटने से मौत हो गई।

दिल्ली सरकार के मंत्री सत्येंद्र जैन ने कहा था कि होटलों का कवरेज एरिया बढ़ा लिया जाता है और छत पर रेस्तरां बना कर कमाई की जाती है। अर्पित होटल में भी चार मंजिल से ज्यादा नहीं बनाई जा सकती थी, लेकिन होटल प्रबंधन ने पांच मंजिल के ऊपर एक अस्थायी फाइबर शेड बना कर उसमें रेस्तरां बना लिया गया था। दिल्ली दमकल ने सख्त कार्रवाई करते हुए पैंतालीस होटलों की जांच की और तीस होटलों को सुरक्षा नियमों में विफल पाया। तब दिल्ली सरकार ने सख्ती दिखाते हुए तीस होटलों का दमकल का अनापत्ति प्रमाण पत्र रद्द कर दिया। पर अब बहुत मुमकिन है कि दोबारा उस रद्द होटलों में अतिथियों का आगमन-प्रस्थान आसानी से हो रहा होगा। इससे तो यही पता चलता है कि कार्रवाई के नाम पर खानापूर्ति की जाती है।

निगम की अकर्मण्यता
दिल्ली के आवासीय इलाकों में इक्यावन हजार से अधिक कारखाने चल रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इन्हें सील करने का निर्देश दिया है। कोर्ट के निर्देश पर दिल्ली राज्य औद्योगिक विकास निगम (डीएसआइडीसी) ने पंद्रह हजार संपत्तियों की सूची निगम को भेजी थी। तीन चरणों में निगम सर्वे कर कुछ कारखानों को सील किया। निगम को 11 हजार, 972 कारखाने दिसंबर तक सील करने थे, लेकिन छह सौ कारखाने ही सील किए जा सके। बाकी को जनवरी तक का समय दे दिया गया है। निगम ने तीसरे चरण में एक सप्ताह पहले ही अनाज मंडी इलाके में चल रहे कारखानों का सर्वे किया था। तब निगम ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि यहां कारखाने बंद हैं। अब तैंतालीस लोगों की मौत के बाद निगम के पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि अगर कारखाने बंद थे, तो फिर इस मौत के लिए कौन जिम्मेदार है? अकेले अनाज मंडी इलाके में ही बीते दस सालों से चार हजार से ज्यादा ऐसे कारखाने चल रहे हैं, जिन्हें निगम को सील करना है।

हर घटना के बाद आरोप-प्रत्यारोप
कारखाना चलाने के लिए दिल्ली अग्निशमन विभाग, दिल्ली नगर निगम, दिल्ली जल बोर्ड, बिजली विभाग, दिल्ली लाइसेंसी विभाग, दिल्ली श्रम विभाग के अलावा कई अन्य विभागों से लाइसेंस लेने की जरूरत पड़ती है। दिल्ली अग्निशमन विभाग अक्सर ऐसी घटनाओं के बाद यह कह कर अपना पल्ला झाड़ लेता है कि उसे इस बात की जानकारी ही नहीं थी कि कारखाना चल रहा था। अधिकारी कहते हैं कि अग्निशमन विभाग को कारखाने की जानकारी ही नहीं होती, तो अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) देने का सवाल कहां से पैदा होता है। वहीं, पुलिस का कहना है कि कारखाने के बाहर की गतिविधियों पर नजर रखने का काम उनका है। यह तो श्रम विभाग और लाइसेंसी विभाग के अधिकारी तय करेंगे कि कारखाने में क्या काम किया जा रहा है। यही कारण है कि हर बार आरोप-प्रत्यारोप का खेल शुरू हो जाता है।