भारत में बहुत तेजी से शहरों का विकास और विस्तार हो रहा है। महानगर आसपास के गांवों को अपनी जद में लेते जा रहे हैं। खेती-किसानी, पशुपालन का दायरा सिकुड़ रहा है। पश्चिमी देशों की नकल पर शहरों के विकास पर जोर है। पर पश्चिम ने शहरीकरण से उपजी समस्याओं से पार पाने के जो उपाय किए हैं, उसमें हम काफी पीछे हैं। इसके चलते पर्यावरण प्रदूषण और सड़कों पर भीड़भाड़ त्रासद रूप लेते गए हैं। शहरीकरण से पैदा हुई चुनौतियों का विश्लेषण कर रहे हैं राजेंद्र रवि।
आजकल दिल्ली की जनता धुंध और धुएं की दहशत से बेहाल और परेशान है। सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट, हरित न्यायाधिकरण सरकारों को तरह-तरह के निर्देश देते हैं और सरकारें फौरी तौर पर घोषणाएं करती हैं। पिछले तीन दशक से साल-दर-साल ऐसे दिन आते हैं और सारे किरदार अपनी इसी भूमिका को पूरा करने के बाद अगला साल आने तक इसे ठंडे बस्ते में डाल देते हैं। मूल प्रश्न यह है कि हम किस हालत तक पहुंच गए हैं! हम विकास की जिस दिशा में बढ़ रहे हैं क्या उससे समाधान का रास्ता निकलेगा या हम इसी अंधी गली में फंसते ही चले जाने वाले हैं। हमने विकास के मॉडल को पश्चिम के विकसित कहे जाने वाले मुल्कों से लिया है और वे सब मुल्क ‘आज की हमारी हालत’ से निकलने की कोशिश करते-करते फंसते ही जा रहे हैं और हम हैं कि उन्हीं के पद-चिह्नों पर चलते हुए निदान खोजने में लगे हैं। अभी तक इस रास्ते पर चलते हुए कोई धुंध-धुएं की दहशत से बाहर निकल पाया है, इसका उदाहरण नहीं मिलता।
दरअसल, आज हमारे शहरों की हालत, 1952 के लंदन के हालात की तरह है। तब सारा लंदन धुएं और धुंध की गिरफ्त में आ गया था, जिसे ‘ग्रेट स्मॉग आॅफ लंदन’ के नाम से पुकारा गया। इस वजह से हजारों लोगों की जिंदगी चली गई और बड़ी संख्या में लोग लंबी बीमारी के शिकार हुए। वहां की तत्कालीन सरकार ने इसके बचाव में एक कानून बनाया, जिसे ‘क्लीन एयर एक्ट’ के नाम से जाना गया। पर धीरे-धीरे कारों और दूसरे मोटरवाहनों की बढ़ती संख्या वहां फिर वही हालत पैदा करने लगी। उससे बचने के लिए सरकार ने बड़े-बड़े फ्लाईओवर तथा बहुमंजिली कार पार्किंग के माध्यम से ढंकने के उपाय किए गए। लेकिन यह भी तत्कालीन आघात पर ‘परत’ डालने जैसा ही था और आज भी विकसित मुल्कों के शहर इस तरह की दुश्वारियां झेलने को अभिशप्त हैं। जब पश्चिम के देशों ने आधुनिक विकास के रास्ते पर चलते हुए शहरों को गढ़ना शुरू किया, तो उन्होंने शहरों की परिकल्पना से कृषि, पशुपालन और उससे जुड़ी हुई गतिविधियों को निकाला ही नहीं, बल्कि उस पर बंदिशें भी लगा दीं। इस वजह से पर्यावरण संतुलन की प्रक्रिया तहस-नहस हो गई और आज हम प्रकृति की विनाश-लीला झेलने को अभिशप्त हैं। इसकी जद में हमारा शहरी समाज ही नहीं, ग्रामीण समाज भी आ चुका है।
हम भी पश्चिम की बयार में बह गए। हमने भी अपने शहरों के निर्माण में कृषि, पशुपालन, उद्योग और उससे जुड़े जीविकोपार्जन के सभी साधनों को समाप्त कर नया मास्टर प्लान बनाया, जिसने हमारे समाज की गतिविधियों को खंड-खंड में बांट दिया और हमारा तानाबाना पूरी तरह से खत्म हो गया। हमने शहरी मास्टर प्लान के तहत मनुष्य, पशु-पक्षी और प्रकृति के रिश्ते को समाप्त कर दिया। इससे भोजन और मल-उत्सर्जन के साथ प्राकृतिक रिश्ते समाप्त हो गए। इस कारण थल और जल प्रदूषण और गंदगी के भंडार में परिवर्तित होते गए। यह सरकार के सफाई और स्वच्छता अभियानों से भी नहीं संभल पा रहा है, जबकि समाज के अरबों रुपए इस मद में खर्च हो रहे हैं। हम अपनी जरूरतें प्रकृति के दूसरे प्राणियों से पूरा करते हैं और दूसरे प्राणी अपनी आवश्यकताएं हमसे पूरा करते हैं। मसलन, हम प्रकृति और दूसरे प्राणियों से भोजन प्राप्त करते हैं और हमारा कचरा दूसरे प्राणियों के लिए भोजन है। इस कारण इस धरा पर कचरा के भंडारण की न कोई व्यवस्था थी और न जरूरत। लेकिन हमने इस विचार को खंड-खंड कर दिया और अपने आसपास गंदगी और बदहाली का पहाड़ खड़ा कर दिया और आज हम सब इसके शिकार हैं। आज इस स्थिति से निपटने के लिए विकसित दुनिया के शहर वापस लौटने की कोशिश में हैं और खेती-किसानी का बदला हुआ स्वरूप आजमाया जाने लगा है।
